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कारवां गुज़रने के बाद क्या
हॉकी विश्व कप गुजर चुका है और राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी पूरे जोर पर है। कुल मिलाकर खेलों के नाम पर अंधाधुंध विकास जारी है। लेकिन जब खेल हो जाएंगे खत्म तब क्या होगा आलम? चर्चा कर रही हैं
सुपर्णा भल्ला /  April 05, 2010

शहर के बीचोबीच बेहद महंगी जमीन पर निर्माण कार्य पूरी रफ्तार से आगे बढ़ रहा है।

राष्टमंडल खेलों के लिए तैयारियां चल रही हैं और धरती के बड़े हिस्से पर मौजूद कई देशों की निगाहें इन दिनों भारत पर लगी हुई हैं कि अक्टूबर में होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन इस देश में किस तरह हो पाएगा।

वैसे तो स्टेडियम खेल आयोजनों के लिए ही बनाए जाते हैं लेकिन उनकी अहमियत इससे भी कहीं आगे है। ये स्टेडियम शहर की वास्तुकला, लोगों और संस्कृति की भी पहचान बन जाते हैं। मौजूदा दौर के स्टेडियम तकनीकी उत्कृष्टता के बेजोड़ नमूने हैं।

देश की राजधानी दिल्ली में अक्टूबर में 19वें राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन होना है। इस हिसाब से इन खेलों की उल्टी गिनती शुरू हो गई है। ऐसे में शहर और देश दोनों के लिहाज से इन स्टेडियमों की भूमिका की पड़ताल करना बेहद जरूरी हो जाता है। शुरुआत वहीं से करते हैं जहां काम को सबसे पहले अंजाम दिया गया है।

सबसे अव्वल

मेजर ध्यानचंद नैशनल स्टेडियम का पूरी तरह से कायाकल्प हो चुका है जिसकी बानगी आप विश्व कप में देख चुके होंगे। अगर कुछ पैमानों पर बात करें तो यह अपनी तरह का दुनिया का सबसे अनूठा स्टेडियम है।

यह दुनिया का अकेला ऐसा हॉकी स्टेडियम है जिसमें 17,000 दर्शक मैच देख सकते हैं। यहां तीन पिचें हैं जिनमें से दो सिंथेटिक हैं। इसमें खिलाड़ियों और अधिकारियों के लिए विश्वस्तरीय सुविधाएं मौजूद हैं। भले ही दिल्ली को बिजली की किल्लत से जूझना पड़ रहा हो लेकिन इस स्टेडियम में बिजली की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित की गई है।

बदलाव के बावजूद स्टेडियम अपना धरोहर का दर्जा बरकरार रखने में कामयाब रहा है। आपको बता दें कि नैशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट और इंडिया गेट के करीब मौजूद यह मैदान पहले नैशनल स्टेडियम के नाम से जाना जाता था। अपनी धरोहरों के साथ अपेक्षित व्यवहार न करने वाले इस शहर में इस मैदान की कायापलट ने एक उम्मीद सी जगाई है।

दूसरे शब्दों में कहें तो 37 एकड़ जमीन के टुकड़े पर मौजूद यह मैदान खेलों के लिए चमकते कोहिनूर की तरह है। इसका काम भी डेढ़ साल की रिकॉर्ड अवधि में निपटाया गया है। वह भी एक गुमनाम सी कंपनी ने। इस काम के लिए एलऐंडटी जैसी महारथी कंपनी को पछाड़कर ठेका हासिल करने वाली मुंबई की यूनिटी इन्फ्राप्रोजेक्ट्स लिमिटेड ने बेहद सराहनीय काम किया है।

यूनिटी के उपाध्यक्ष और प्रबंध निदेशक अभिजीत अवारशेखर कहते हैं, 'अपनी उन्नत तकनीकी क्षमताओं, शानदार लेबर फोर्स और संसाधनों के उचित इस्तेमाल से ही हम इसे रिकॉर्ड समय पर पूरा कर पाने में कामयाब हुए हैं। हमारे आदमी और मशीनों ने चौबीसों घंटे काम किया और इसका ही नतीजा है कि यह बेहद कम समय में पूरा हो पाया। आप इसे पेशेवर अंदाज की शानदार मिसाल कह सकते हैं।'

नया स्टैंड, सीटें, बड़ा इलेक्टॉनिक बोर्ड, शानदार ऑडियो सिस्टम के अलावा काफी कुछ ऐसा है जिसके बारे में तारीफ करने के लिए लफ्ज कम पड़ जाते हैं। इस कायापलट में मैदान में पहले से मौजूद पेड़ों की बलि भी नहीं ली गई है और मैदान में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम भी है।

डिजाइन की तारीफ किए बिना बात अधूरी रह जाएगी। रिकॉर्ड समय में पूरा होने से भी बड़ी बात है कि कई एजेंसियों से अनापत्ति प्रमाण पत्र हासिल करने में बेहद कम वक्त में कामयाबी हासिल कर ली गई।

जैसे कि एएसआई, डीयूएसी, फायर कोड जैसी संस्थाओं से महीने भर में ही अनापत्ति हासिल कर ली गई। यह इतनी बड़ी कामयाबी है कि इससे सटे नैशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट को अपने पुनरुद्धार के लिए हर मोर्चे पर हरी झंडी हासिल करने में 25 साल का वक्त लगा।

बेखबर हैं बाशिंदे

अगर आप दिल्ली वालों से इस स्टेडियम का पता पूछ लें तो हो सकता है वे आपको बड़ी अचरज भरी निगाहों से देखें। दरअसल यहां रहने वालों में से कई लोगों को इस स्टेडियम की जानकारी भी नहीं है।

उन्हें यह नहीं पता होगा कि ध्यानचंद नैशनल स्टेडियम मूलरूप से नैशनल स्टेडियम है जहां पर 1951 और 1984 में एशियाई खेल आयोजित किए गए थे। इतनी अधिक आबादी वाले शहर में भी लोगों को इतनी अहम बातों के बारे में क्यों पता नहीं रहता है इसे जानकर हैरानी होती है।

राष्ट्रमंडल खेलों को शुरू होने में 200 दिन से भी कम रह गए हैं और यह आश्चर्य की बात है कि शहर के बाशिंदे खुद बेखबर हैं कि दुनिया दिल्ली की कौनसी खासियत देखने जा रही है।

अनसुलझे सवाल

इन खेलों की तैयारी को लेकर कई सवाल जेहन में आते भी हैं। मतलब कि क्या वक्त पर पूरी तैयारी हो पाएगी। वगैरह-वगैरह। हॉकी स्टेडियम का काम रिकॉर्ड वक्त में पूरा हो जाना सुकून देने वाली खबर है लेकिन दूसरी तैयारियों में क्या चल रहा है। इसको लेकर सवाल उठना लाजिमी भी है।

राष्ट्रमंडल खेलों की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक इन खेलों के लिए शहर भर में 10 आधिकारिक प्रतियोगिता स्थल हैं। इनमें से ही एक जवाहरलाल नेहरू कॉम्पलेक्स (प्रगति मैदान के पास) की क्षमता 60,000 सीटों की है जो एक सेंट्रल हब के तौर पर इस्तेमाल किया जाएगा।

खेलों के उद्धाटन और समापन समारोह यहीं आयोजित किए जाएंगे। जबकि दूसरे मैदानों की क्षमता 3,500 से 20,000 दर्शकों की है। यह जानकर हैरानी होगी कि इस आयोजन के लिए दिल्ली में एक भी नया स्टेडियम नहीं बनाया गया है। पुराने स्टेडियमों का ही पुनरुद्धार कर उनका इस्तेमाल किया जाना है।

जब खेलों की तैयारी को लेकर मेट्रो रेल सेवाओं का विस्तार किया जा रहा है और मौजूदा सेवाओं को बेहतर बनाया जा रहा है, नया एयर टर्मिनस का विकास किया जा रहा है, 12 नए फ्लाईओवर बनाए जा रहे हैं और एक चौतरफा एक्सप्रेसवे की तैयारी की जा रही है तो फिर जहां खेलों का आयोजन किया जाना है यानी कि स्टेडियम, उनके साथ इतनी बेरुखी क्यों बरती गई।

स्थानीय शहरी डिजाइनर आशीष चौधरी का कहना है, 'खेलों के बाद शहर और यहां के लोगों के लिए इसकी क्या जरूरत रह जाएगी। एक्सप्रेसवे कम घनत्व वाले इलाकों को जोड़ने का काम करते हैं और शहर के नेटवर्क से इनका जुड़ाव नहीं होता है। हम इतनी लागत वाली संरचना का डिजाइन कैसे तैयार कर सकते हैं। तो हम पूरी दुनिया को अपनी कौन सी तस्वीर दिखाने जा रहे हैं।

यहां तक कि पेइचिंग ने भी ओलपिंक खेलों के बाद ओलंपिक ग्रीन को फिर से डिजाइन किया था ताकि वहां के लोग इसका इस्तेमाल कर सकें। शहर ने आयोजन के बाद सभी संरचनाओं का दोबारा से कुछ इस तरीके से पुनर्विकास कराया कि वह आम लोगों के द्वारा इस्तेमाल किया जा सके। उसने एक आदर्श पेश किया जिससे दूसरे आयोजनों को सबक मिल सकता है।

फायदा होगा कितना!

रियल एस्टेट कंपनी एम्मार एमजीएफ जिस कॉमनवेल्थ विलेज का विकास कर रही है उसे बाद में हाउसिंग के लिए इस्तेमाल किया जाएगा और इसकी घोषणा पहले ही की जा चुकी है।

मगर इसे छोड़कर बाकी किसी भी दूसरे निर्माणों के बारे में ऐसी घोषणा नहीं की गई है कि खेलों के बाद उन्हें लोगों के इस्तेमाल के लिए तैयार किया जाएगा। भले ही यह सारा निर्माण कार्य करदाताओं के खर्चे पर ही किया जा रहा हो मगर खेलों के बाद उन्हें इससे फायदा मिले इसकी सुध अब तक तो नहीं ली गई है।

सेंट्रल दिल्ली में फुटपाथों के पुराने लाल रंग के पत्थरों को बदलकर उनकी जगह नए पत्थर लगाए जा रहे हैं, सड़कों को चौड़ा किया जा रहा है, स्मारकों की सफाई की जा रही है तो ऐसे में किसी को भी यह सोचकर हैरानी होगी कि इन खेल आयोजन स्थलों का बाद में क्या होगा। क्या इन्हें इसी तरह धूल फांकने के लिए छोड़ दिया जाएगा।

इस आस में कि शायद कुछ दशकों के बाद फिर किसी खेल आयोजन में इनका इस्तेमाल किया जा सके। एक के बाद एक समितियां इनकी समीक्षा करेंगी और अंत में यह फैसला लेंगी कि जिन खेलों के आयोजन के लिए इन्हें डिजाइन किया गया था ये उनके लिए भी फिट नहीं हैं। क्या वे उपेक्षित सरकारी इकाइयों की सूची में शुमार हो जाएंगी जिनका इस्तेमाल यदा कदा ही किया जाता है।

हाल-ए-मैदान

इन मैदानों का दौरा करने पर कई चीजें चौंकाने वाली भी सामने आती हैं। जरा इन स्टेडियमों की दुनिया के बेहतरीन स्टेडियमों से तुलना करें तो आप इन्हें कहां पाएंगे? जैसे कि म्यूनिख का आलियांज एरेना या फिर पेइचिंग का नैशनल स्टेडियम या फिर इसी शहर में मौजूद नैशनल स्विमिंग सेंटर की ही मिसाल लें।

आखिर हम जब किसी शहर में कोई भव्य आयोजन करते हैं तब भी कोई आइकन क्यों नहीं बना पाते। यहां तक कि पेइचिंग में भी मास्टर प्लान लाया गया और ओलिंपिक खेलों के बाद इस्तेमाल के लिए ओलिंपिक ग्रीन बनाया गया। इसे सासाकी आर्किटेक्ट ने बनाया।

स्थनीय जनता द्वारा पार्कों के इस्तेमाल में पेइचिंग खेलों के हरित एजेंडे की झलक साफ तौर पर देखी जा सकती है। तीरंदाजी के मैदान के सारी पानी के पुनर्शोधन की पूरी व्यवस्था की गई। सभी वातानूकिलत संयंत्र ऐसे इस्तेमाल किए गए जिनमें फ्लोरीन गैस वाले रेफ्रिजरेटर नहीं थे।

सभी एथलीटों और अधिकारियों को आपूर्ति करने के लिए दिया जाने वाला गर्म पानी सौर ऊर्जा से गर्म किया गया। दरअसल समारोह से पहले ही इन आदर्शों को अपनाने की बुनियाद तैयार कर दी गई थी। हम क्या और कैसे करेंगे?

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