बिजनेस स्टैंडर्ड - गाइटनर को क्या करना चाहिए और क्या नहीं?
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गाइटनर को क्या करना चाहिए और क्या नहीं?
गाइटनर को सार्वजनिक तौर पर भारत पर वित्तीय क्षेत्र को खोलने का दबाव नहीं डालना चाहिए। भारत को वित्तीय क्षेत्र खोलना चाहिए लेकिन अपनी रफ्तार से, जिससे वह कदमताल मिला सके। इस बारे में विस्तार से बता रहे हैं
अरविंद सुब्रमण्यन /  April 05, 2010

अमेरिकी वित्त मंत्री टिम गाइटनर भारत और अमेरिका के बीच आर्थिक संबंधों को नया आयाम देने के लिए भारत पहुंच चुके हैं।

दोनों देशों के बीच बातचीत में वृहत आर्थिक स्थायित्व, वित्तीय बाजार और बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं के लिए वित्त मुहैया कराने जैसे मुद्दे छाए रहेंगे। गाइटनर का भारत के साथ बेहद खास और पुराना रिश्ता रहा है। 1980 के दशक में गाइटनर के पिता भारत में फोर्ड फाउंडेशन के अधिकारी रह चुके हैं और इस नाते उनके बचपन से जुड़े कई यादगार पल इसी देश में गुजरे हैं।

बहरहाल अब वह एक अलग ओहदे और मकसद के साथ यहां आए हैं। दुनिया की सबसे बड़े महाशक्ति देश के खजाने की कुंजी की कमान संभालने वाले गाइटनर को भारत के साथ आर्थिक रिश्तों को नई ऊंचाई देनी है। वैसे उनकी इस यात्रा में तीन मकसद सबसे ज्यादा अहमियत रखते हैं।

सर्वप्रथम और सबसे अहम, उनकी यह  यात्रा प्रतीकात्मक रूप से बेहद मायने रखती है। विशेषकर जिस तरह से अमेरिका-चीन संबंध रणनीतिक और आर्थिक रूप से एक विशेष स्तर पर पहुंच चुके हैं। इसी स्तर पर भारत के साथ संबंधों को मजबूत करने की अमेरिका की रणनीति है।

हालांकि अमेरिका के भारत के साथ आर्थिक संबंध अभी उस लिहाज से उतने महत्त्वपूर्ण नहीं हुए हैं जिस लिहाज से चीन के साथ हो चुके हैं, कम से कम हाल तक तो नहीं। लेकिन अमेरिका का यह ताजा कदम इस बात को दर्शाता है कि भारत की अहमियत किसी भी स्तर पर कमतर नहीं है और अमेरिका की नजरें इस पर इनायत हैं।

इस तरह से गाइटनर का यह दौरा इस बात के मद्देनजर अहमियत रखता है कि आर्थिक रिश्ते बन रहे हैं और उम्मीद है कि आगे इनमें और मजबूती आती रहेगी। दूसरी खास बात जो उनके आगमन से जुड़ी है वह है दोनों देशों के बीच साझे वैश्विक आर्थिक हितों के लिए नई संभावनाएं तलाशना। भारत अब जी-20 देशों के समूह का हिस्सा बन चुका है।

वैसे दोनों देशों के बीच कोई ऐसा ज्वलंत मुद्दा नहीं है जो इन देशों के बीच किसी दरार को पैदा करने का काम करे। मिसाल के तौर पर वित्तीय क्षेत्र की बात करें। इस क्षेत्र में भारत का बहुत कुछ दांव पर नहीं लगा है क्योंकि घरेलू स्तर पर इस मांग ने जोर नहीं पकड़ा हुआ है कि इसे कैसे पुनर्नियंत्रित किया जाए (जबकि अमेरिका और यूरोप पर यही बात लागू होती है) बल्कि कैसे और कितनी तेज इसे विनियंत्रित किया जाए।

लेकिन एक अन्य मुद्दा जो दोनों देशों के आर्थिक हितों से जुड़ा है वह है-चीनी विनिमय दर। जैसा कि मैं फाइनैंशियल टाइम्स में प्रकाशित अपने लेख में कह चुका हूं कि चीनी मुद्रा का अवमूल्यन अमेरिका से ज्यादा भारत जैसे उभरते हुए बाजारों के हितों पर कुठाराघात करने का काम करेगा।

उम्मीद है कि इस मामले में अमेरिका आगे आकर एक ऐसा सर्वमान्य हल निकालेगा जो सभी पक्षों को मान्य होगा। भारत को पहले ही डंपिंग को लेकर चीन से शिकवा रहा है। भारत लगातार शिकायत करता रहा है कि चीन अपने सस्ते माल से देसी बाजार को पाटने का काम रहा है जिससे भारतीय उद्योगों की सेहत बिगड़ रही है। गाइटनर को इस मामले दो समस्याओं का हल निकालना होगा।

इस मामले में भारत की भी अपनी मुश्किलें हैं। भारत यह भी नहीं दिखाना चाहता कि वह अपने इस विशाल पड़ोसी मुल्क की नुक्ताचीनी कर रहा है और दूसरी ओर समस्या का हल भी चाहता है।

(जैसा कि एक वरिष्ठ भारतीय अधिकारी ने मुझे बताया, 'बड़े दिग्गजों को खुद उनके स्तर पर इसका हल निकालने दीजिए। हमारे आसपास के हालात उतने सहज नहीं हैं।') भारत को आगे ले जाने के लिए विशेष कौशल वाली और नरम कूटनीति की जरूरत है। इस मामले को जी-20 (या फिर विश्व व्यापार संगठन) के मंच पर समूह के देशों के समक्ष उठाना चाहिए और केवल इस मामले में अमेरिका का मोहताज होना समझदारी नहीं होगी।

दूसरी समस्या उन लोगों के स्वभाव से जुड़ी है जिनसे गाइटनर को बात करनी है। चीनी विनिमय दरों का प्रभाव सबसे ज्यादा घरेलू उद्योगों पर पड़ेगा। देश का केंद्रीय बैंक, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) भी इससे अछूता नहीं रहेगा क्योंकि यह उस तरह की परेशानी होगी जिससे निपटने का जिम्मा आरबीआई के पास ही है।

यह आरबीआई ही है जो देश में पूंजी प्रवाह को नियंत्रित करता है और चीनी मुद्रा के अवमूल्यन की स्थिति में विनियम दरों का नियमन भी करता है। मगर गाइटनर के समकक्ष खास तौर से वित्त और योजना महकमों को संभालने वाले शायद ही इस मसले से जुड़ी बारीकियों और इसके प्रभावों को उतना महत्त्व दें। ऐसे में उनके सामने यह कड़ी चुनौती होगी कि भारतीय सोच को विनियम दरों के बारे में चेताया जाए।

गाइटनर के साथ आए अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के उपाध्यक्ष डॉन कॉन की मौजूदगी इस स्थिति में बेहद उपयोगी होगी। खासतौर से जब वह आरबीआई के साथ बातचीत की अगुआई करेंगे। भारत के वाणिज्य मंत्री को भी इस बातचीत का हिस्सा होना चाहिए और अपने हितों के बारे में बात करनी चाहिए क्योंकि चीनी मुद्रा का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव भारतीय उद्योगों को ही झेलना पड़ेगा जिसकी जिम्मेदारी उनकी बनेगी।

गाइटनर की इस यात्रा का तीसरा लक्ष्य अमेरिका के लिए विशेषकर वित्तीय क्षेत्र में कारोबारी संभावनाओं को बढ़ावा देना है। भारत में वित्तीय क्षेत्र अभी भी कड़े नियमन के साये में काम कर रहा है और इसे खोलने की मांग जोर पकड़ती रहती है। खासतौर से बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं के लिए निवेश के लिहाज से इसे आसान करने की जरूरत समझी जाती है।

एक अनुमान के तहत भारत को बुनियादी ढांचे के विकास के लिए एक खरब डॉलर के निवेश की दरकार है। यहां मैं श्रीमान गाइटनर को कुछ सुझाव देना चाहता हूं कि संयम और शंति सबसे कारगर साबित होने वाली चीजें हैं। उन्हें सार्वजनिक तौर पर भारत पर वित्तीय क्षेत्र को खोलने का दबाव नहीं डालना चाहिए।

इस मामले में भारतीय वित्तीय मंदी के बाद के दौर में उन्हें कुछ नसीहतें भी दे सकते हैं। भारत को वित्तीय क्षेत्र खोलना चाहिए लेकिन अपनी रफ्तार से जिससे वह कदमताल मिला सके। वित्तीय क्षेत्र सुधार के लिए कई घरेलू मसौदे मौजूद हैं।

समस्या सुधार की राजनीति को दिशा देने की है खासतौर से तब जब भारत में बड़े सरकारी बैंकों की व्यापक मौजूदगी हो। इस मामले में अमेरिकी दबाव सिर्फ काम बिगाड़ने का काम करेगा और इससे रफ्तार पकड़ती सुधार की दिशा भी मुड़ सकती है।

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