बिजनेस स्टैंडर्ड - स्वच्छ पर्यावरण की खातिर सुप्रीम कोर्ट की राह पर चलें हाई कोर्ट
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Tuesday, December 10, 2019 09:00 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

स्वच्छ पर्यावरण की खातिर सुप्रीम कोर्ट की राह पर चलें हाई कोर्ट
अदालती आईना
एम. जे. एंटनी /  April 01, 2010

उच्चतम न्यायालय ने कई बार सक्रिय कार्यकर्ताओं का जैसा उत्साह दिखाते हुए ऐसी सामाजिक व पर्यावरणीय समस्याओं को हाथ में लेने का साहस किया है जिनका समाधान असंभव लगता था।

कई उदाहरणों में ऐसे परिणाम आए हैं जिन्होंने संशयवादियों को आश्चर्यचकित किया है। ऑटोमोबाइल व पेट्रोलियम लॉबी के खिलाफ एक दशक चले लंबे संघर्ष के बाद इसे राष्ट्रीय राजधानी में सार्वजनिक परिवहन के लिए सीएनजी ईंधन लागू करवाने में कामयाबी मिली थी।

पिछले हफ्ते संविधान पीठ ने खतरनाक व भारी उद्योगों के साथ दो दशक से चले आ रहे टकराव का पटाक्षेप कर दिया। इन इकाइयों का संचालन दिल्ली के बीचोबीच हो रहा था। साल 1996 में दिल्ली में इन इकाइयों को अपनी जमीन समर्पण करने के  बाद बंद करने या दूसरे राज्यों में स्थानांतरित करने का आदेश दिया गया था।

इसका मकसद यह था कि इन इकाइयों के वहां से चले जाने से ग्रीन बेल्ट या लंग स्पेस की राह बने। अदालत ने उनसे कहा था कि वह अपनी जमीन समुदाय को समर्पित कर दें। यह वास्तव में बड़ा आदेश था और पिछले पंद्रह साल से उद्योग इस कदम का प्रतिरोध कर रहे थे।

वे उपलब्ध हर कानूनी युक्ति का इस्तेमाल कर रहे थे ताकि यह मामला फिर से खुल जाए या कम से कम उन्हें मोटा मुआवजा मिले जबकि अदालत कई तरह की छूट उन्हें पहले ही दे चुकी थी।

अदालत की टिप्पणी थी : इनमें से कुछ समीक्षा याचिकाएं पिछली याचिकाओं के खारिज या वापसी के बाद दायर की गई थीं और वह भी उन्हीं याचिकाकर्ताओं द्वारा और करीब-करीब समान राहत की खातिर।

अदालत ने करीब 20 बड़े उद्योगों द्वारा दायर समीक्षा याचिकाओं को खारिज कर इस किस्से का अंत कर दिया, जो उस आदेश को वापस करवाना चाहते थे या इसके विकल्प में ज्यादा मुआवजा चाह रहे थे। न ही अदालत सिएल फूड्स ऐंड फर्टिलाइजर इंडस्ट्रीज बनाम केंद्र सरकार के मामले में ऐसा कुछ किया।

बंदी या स्थानांतरण के लिए दिए गए आदेश के खिलाफ मजबूत तर्कों में से एक यह था कि न्यायालय के पास ऐसा व्यापक अधिकार नहीं है। वह संपत्ति के मालिक को जमीन के समर्पण के लिए और इसे समुदाय की जरूरतों के लिए समर्पित करने के लिए नहीं कह सकता। सही तरीका यह है कि भूमि अधिग्रहण कानून या इस तरह के अन्य कानून के तहत जमीन का अधिग्रहण किया जाए।

1990 में गजट में रखे गए मास्टर प्लान के मुताबिक हालांकि, ये उद्योग अल्प जनसंख्या वाले इलाकों में नहीं आए होंगे या काफी पहले इन्हें बंद कर दिया गया होगा। जब अधिवक्ता एम. सी. मेहता ने जनहित याचिका दायर की थी तब उद्योगों व अधिकारियों को इन परिस्थितियों की गंभीरता का अहसास हुआ।

अदालत ने प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों के स्थानांतरण और बंदी की बाबत आदेश की पूरी सीरीज पारित की। एक कमेटी के सहयोग से इसने उद्योगों का वर्गीकरण उनके द्वारा पारिस्थितिकी को पहुंचाए जा रहे नुकसान के आधार पर किया। उनमें से ज्यादातर से कहा गया कि वे राजधानी से बाहर चले जाएं और अपनी जमीन का एक हिस्सा समर्पित कर दें।

जमीन का बाकी हिस्सा फ्लोर एरिया रेश्यो (एफएआर) की शर्तों के आधार पर जमीन के मालिक को इस्तेमाल की अनुमति दी गई। लेकिन यह उद्योगों को संतुष्ट नहीं कर पाया और उन्होंने पिछले हफ्ते तक अपना संघर्ष जारी रखा, जब वे अंतत: मुकदमा हार गए। अदालत ने कहा - लंबे समय तक जमीन केलंग स्पेसग्रीन एरिया में रहने के बाद मालिक को मुआवजे का भुगतान करने का सवाल ही पैदा नहीं होता।

लंबे समय तक खिंचने वाला मामला कम के कम दो सीख देता है। सरकार शहरों के लिए शानदार मास्टर प्लान तैयार करती है, लेकिन जब इसके क्रियान्वयन की बात आती है तो निहित स्वार्थों के आगे वह हतोत्साहित हो जाती है। इस मामले में मास्टर प्लान के क्रियान्वयन के लिए उसे न्यायपालिका की जरूरत पड़ी।

सार्वजनिक परिवहन के लिए सीएनजी ईंधन के मामले में अदालत को पर्यावरणीय मानकों को लागू करने के लिए हस्तक्षेप करना पड़ा। वाहनों से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए एक समय दिल्ली के अधिकारी अदालती आदेश के लिए नाक रगड़ते नजर आए, ताकि बिना किसी राजनीतिक नतीजे के इसे क्रियान्वित किया जा सके।

कार्यपालिका की शक्ति में सेंध लगाने का आरोप अदालत पर लगाया जा सकता है। कुल मिलाकर न्यायाधीश प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन नहीं करते। यह कहानी हानिकारक उद्योगों के मामले में खुद दोहराई गई और वह भी बिना उंगली जलाए हुए। कार्यपालिका ने राजधानी से हानिकारक उद्योगों को हटाने में कामयाबी पाई और वह भी न्यायिक हस्तक्षेप से।

इन मामलों से मिलने वाला दूसरा सबक यह है कि यह दूसरे राज्यों के उच्च न्यायालयों को गंदी चीजों की साफ-सफाई की बाबत रास्ता दिखाता है। दिल्ली की साफ-सफाई में महत्त्वपूर्ण योगदान देने वाला एम. सी. मेहता मामला बताता है कि मुंबई भी सुरक्षित नहीं था। वास्तव में इस शहर में रसायन व अन्य परमाणु सामग्री की मौजूदगी इसे और खतरनाक बनाती है।

लेकिन मुंबई की याचिका किसी न किसी तरह फैसलों की सूची से गायब हो गई। न तो मुंबई के नागरिकों और न ही बंबई उच्च न्यायालय ने अब तक इस मामले को अपने हाथ में लिया है। सार्वजनिक जवाबदेही अधिनियम या सिविल लाइबलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज बिल भी किसी तरह का मरहम उपलब्ध नहीं कराता, अगर चेरनोबिल जैसी दुर्घटना हो जाए।

खतरों से जूझ रहे दूसरे शहरों का मामला भी महत्त्वपूर्ण है। लेकिन वहां कोई नहीं नजर आता है, न तो जोशीले नागरिक और न ही उच्च न्यायालय की ओर से की जाने वाली स्वत: पहल जो कि दिल्ली की कहानी से उध्दरण लेते हुए खुद इसकी शुरुआत करे।

Keyword: supreme court, high court, social issues, environmental issues, fuel, cng,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या ई-कॉमर्स दिग्गजों की एमएसएमई रणनीति होगी कारगर?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.