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अब बैंक बने ऋण लेने वाले
बीएस संवाददाता / मुंबई March 29, 2010

साल के अंत में नकदी की खस्ता हालत का संकेत देते हुए बैंकों ने भारतीय रिजर्व बैंक के लिक्विडिटी एडजस्टमेंट पॉलिसी (एलएएफ) के तहत काफी मात्रा में रकम उधार ली है।

चालू वित्त वर्ष (2009-10) में पहली बार ऐसा हुआ है जब बैंक रिवर्स रेपो के जरिये आरबीआई के पास जितनी रकम जमा करते हैं, उससे कहीं ज्यादा की रकम उन्होंने केंद्रीय बैंक से उधार ली है।

इस बाबत आरबीआई ने एक बयान जारी कर कहा है कि एक बैंक ने जहां एक दिन में 900 करोड़ रुपये उधार लिए वहीं चार बैंकों ने 445 करोड रुपये आरबीआई के पास जमा किए। बैंकरों का कहना है कि प्रणाली में अस्थायी असंतुलन की वजह से उनके संसाधनों पर असर पडा है और यह ऋणों की मांग पूरा करने के लिए फंड की कमी होने जैसे किसी बात की ओर इशारा नहीं कर रहा है।

उल्लेखनीय है कि  रोजाना आधार पर आरबीआई के साथ जमा किए जाने वाले औसत रकम में इस महीने के  शुरू से गिरावट देखी गई है। चालू वित्त वर्ष के बचे दो दिनों में बाकी बची पूंजी पर असर पड़ेगा। मुंबई स्थित एक सरकारी बैंक के एक ट्रेजरी प्रमुख ने कहा 'हाल के दिनों में नकदी की उपलब्धता में कमी आई है और बैंकों द्वारा ऋण दिए जाने की रफ्तार में खासी तेजी आई है।'

आरबीआई की तरफ से जारी किए गए ताजा आंकड़ों के अनुसार क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक सहित सभी सूचीबध्द व्यावसायिक बैंकों के ऋणों के आवंटन में साल-दर-साल के हिसाब से मार्च के अंत में 16.04 फीसदी की तेजी आई है। यह चालू वित्त वर्ष में आरबीआई के ऋणों के आवंटन में 16फीसदी की तेजी के अनुमान से अधिक है।

इधर आरबीआई ने यह भी कहा है कि साल के अंत में नकदी की आवश्यकताओं को देखते हुए लिक्विडिटी एडजस्टमेंट फेसेलिटी के तहत 30 और 31 मार्च को अतिरिक्त रेपो और रिवर्स परिचालन करेगा।

तत्काल चिंताओं की ओर ध्यान दिलाते हुए एसबीआई की एक सहयोगी इकाई के साथ काम कर रहे एक डीलर ने कहा कि कुछ बैंक 5 अप्रैल तक अपनी आवश्यकताओं के लिए अपने पास नकदी रख रहे हैं। 

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