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क्या सच में कारगर है ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना?
नरेगा के लिए भले ही बड़े-बड़े दावे किए गए हों, लेकिन अन्य योजनाओं की तरह ही यह भी बहुत कारगर नहीं रही है। राजीव गांधी ने ठीक ही कहा था कि गरीबों के लिए खर्च की जाने वाली रकम का 15 फीसदी ही उन तक पहुंच पाता है। बता रहे हैं
सुरजीत एस. भल्ला /  March 28, 2010

एक दशक या इससे कुछ पहले बुकर पुरस्कार से सम्मानित अरुंधती रॉय ने दावा किया था कि भारत में बांधों के निर्माण के कारण 5 करोड़ लोग से ज्यादा विस्थापित हो चुके हैं।

इसका मतलब यह हुआ कि बांध बनने के कारण हर तीन में से एक ग्रामीण को अपनी जगह छोड़नी पड़ती है (याद रहे कि 1950, 1960 और 1970 के दौर में जब ज्यादातर बांध बनाए गए थे उस समय आबादी आज से काफी कम हुआ करती थी)।

बारीकी से जांच करने से पता चलता है कि विस्थापितों की वास्तविक संख्या इस दावे के दसवें हिस्से से भी काफी कम है, यानी कि अनुमानित तौर पर विस्थापितों की कुल संख्या 30 लाख लोगों के आस पास है। कवियों और उपन्यासकारों के पास चीजों को बढ़ा चढ़ाकर पेश करने का लाइसेंस होता है, मगर सरकारी एजेंसियां भी ऐसा करने लगें तो फिर मामला अलग होता है।

खासतौर पर 2010 के सुशासन के युग में। ग्रामीण विकास मंत्रालय की एक ताजा रिपोर्ट (राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना , नरेगा को लागू कराने का भार इसी मंत्रालय पर है) में अरुंधती रॉय की तरह ही बढ़ चढ़कर दावा किया गया है।

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2009-10 में नरेगा के जरिए रोजगार मुहैया कराने की योजना के तहत दिसंबर 2009 तक 4.3 करोड़ लोगों को काम दिया जा चुका है। इस वित्त वर्ष की आखिरी तिमाही में सबसे अधिक लोगों को रोजगार मुहैया कराया गया है। नरेगा के तहत मुहैया कराए गए रोजगारों में से एक तिहाई तो इसी तिमाही में मुहैया कराए गए हैं।

वर्ष 2009-10 में 5 करोड़ परिवारों को नरेगा के तहत रोजगार दिलाने का अनुमान है। कांग्रेस का कहना है कि देश में करीब 15 करोड़ ग्रामीण परिवार हैं और हर तीन में से एक ग्रामीण परिवार को नरेगा के तहत रोजगार उपलब्ध कराया जाएगा।

कांग्रेस का यह दावा काफी कुछ अरुधंती रॉय की तरह ही है। इससे भी खास यह दावा है कि यह रोजगार न्यूनतम भुगतान मुहैया कराएगा और यह गरीबों के लिए है। साल 20045 के सरकारी आंकड़ों के हिसाब से भारत में ग्रामीण गरीबी 20 से 25 फीसदी है।

अगर हम यह भी मानें कि गरीबी में कोई सुधार नहीं हुआ है (जो सरकार समग्र विकास के मोर्चे पर खुद पर गर्व करती है, उसके लिए यह एक शर्म की बात है) तो 22.5 फीसदी गरीब परिवारों का मतलब होता है करीब 3.4 करोड़ परिवार। तो इसका मतलब यह हुआ कि सरकारी दावों के हिसाब से हर गरीब परिवार को नरेगा के जरिए रोजगार मुहैया कराया जा चुका है, यहां तक कि इनसे अलग हटकर 50 फीसदी और परिवारों को काम दिलाया गया है।

सरकार द्वारा बढा चढ़ाकर पेश किए गए इस दावे का उसे काफी फायदा हुआ है। साल 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली शानदार जीत की एक वजह यह भी रही है। कुछ लोगों को कांग्रेस की जीत का अनुमान तो था मगर यह अहसास नहीं था सरकार का नरेगा रूपी हथियार विपक्ष पर ऐसा घोर प्रहार करेगा।

दरअसल ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि हमने कभी सरकारी आंकड़ों पर निगाह डालने की जहमत नहीं उठाई। नरेगा लागू किए हुए एक साल पूरा होने पर यानी कि 2006-07 में सरकार ने 2.1 करोड़ परिवारों को रोजगार मुहैया कराने का दावा किया।

अब महज 3 सालों में सरकार यह दावा कर रही है कि वह 5 करोड़ परिवारों को रोजगार दिला चुकी है। इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है कि कांग्रेस ने जीत दर्ज की है। गरीब कांग्रेस से लगाव रखते हैं क्योंकि पार्टी उनके साथ खड़ी रही है।

मगर क्या सच में ऐसा है? एक दफा राजीव गांधी ने कहा था कि गरीबों के हित के लिए तैयार की गई योजनाएं वास्तव में उन तक पहुंच ही नहीं पाती हैं। बिना किसी खास वैज्ञानिक आधार के भी उन्होंने यह कहा था कि गरीबों के लिए खर्च की जाने वाली रकम का केवल 15 फीसदी हिस्सा ही उन तक पहुंच पाता है।

जिन विशेषज्ञों ने इस बयान की जांच करने की कोशिश की है उन्हें इसमें किसी दूसरे अर्थशास्त्री के अनुमान से ज्यादा सच्चाई नजर आई है। राजीव गांधी के इस वक्तव्य और कांग्रेस सरकार के गरीबों तक पहुंचने के दावे की जांच का एक तरीका है। 2006-07 में एनएसएस सर्वेक्षण के 63वें दौर में 15 साल से ऊपर के लोगों से एक सवाल पूछा गया।

उनसे पूछा गया कि उनमें से कितने लोगों ने पिछले 365 दिनों में किसी लोक कल्याण कार्यक्रम में हिस्सा लिया है, उन्होंने उसके लिए कितने दिन काम किया और उन्हें कितना भुगतान किया गया। इसके साथ ग्रामीण विकास मंत्रालय के आंकड़े का भी अध्ययन किया गया।

मंत्रालय के आंकड़े अप्रैल 2006 से मार्च 2007 के दौरान के हैं जबकि एनएसएस के आंकड़े जुलाई 2006 और जून 2007 के बीच के हैं। कुछ हद तक यह सही है कि नरेगा का तेजी से विस्तार हुआ है, एनएसएस के आंकड़े इन दावों की सच्चाई उजागर करते हैं।

आंकड़ों से यह पता चलता है कि नरेगा के लिए जितनी रकम आवंटित की गई थी वह भी पूरी तरह खर्च नहीं की जा सकी थी। आवंटित रकम का तीन-चौथाई से भी कम हिस्सा खर्च किया जा सका था। माना कि नरेगा को लागू किए हुए उस दौरान कुछ ही समय बीता था, मगर 2008-09 में जब आवंटन बढ़ाकर 30,000 करोड़ रुपये किया गया तो भी नरेगा अधिकारी इसका महज 73 फीसदी हिस्सा ही खर्च कर पाए थे।

मंत्रालय का दावा है कि 2006-07 में 8,823 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे जिनमें से दो-तिहाई (5,842 करोड़ रुपये) वेतन पर खर्च किया गया था। बाकी की रकम यानी कि 3,250 करोड़ रुपये प्रशासनिक कार्यों और पूंजी उपकरण पर खर्च की गई थी। यानी कह सकते हैं कि यह रकम खर्च करने के लिए खर्च की गई थी।

मगर 5,842 करोड़ रुपये तो वेतन के रूप में खर्च किए गए थे, क्या वे वास्तव में नरेगा मजदूरों की झोली में गए थे। एनएसएस के मुताबिक जितनी रकम मजदूरी के तौर पर खर्च की गई थी उनमें से केवल आधी ही मजदूरों तक पहुंच पाई थी। यानी तकरीबन 3,000 करोड़ रुपये ही मजदूरों को मिल पाए थे। इसमें से भी गरीब मजदूरों को एक छोटा सा हिस्सा ही मिल पाया था।

एनएसएस के मुताबिक गरीबों की झोली में महज 1,270 करोड़ रुपये ही गए थे। इन आंकड़ों पर थोड़ा विचार कीजिए। सरकार काफी तामझाम के साथ यह घोषणा करती है कि वह भुखमरी, गरीबी, असमानता और अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए कितना खर्च कर रही है। पिछले 20 सालों से लगातार ऐसे प्रमाण मिलते रहे हैं कि गरीबों के लिए शुरू किए जाने वाले कार्यक्रम बाकी सब तक तो पहुंचते हैं मगर गरीबों से ही दूर रह जाते हैं।

कांग्रेस ने अपने काम के बदले में भोजन योजना का नाम बदलते हुए और इसे विस्तार देते हुए इसका नाम नरेगा कर दिया और अब इसका नाम मरेगा कर दिया गया है (जिसका एक मतलब मरना भी होता है)।

वह 2006-07 में इस योजना पर 8,823 करोड़ रुपये खर्च करती है मगर जिनके लिए यह योजना बनाई गई है उन तक महज 14.7 फीसदी हिस्सा (1,270 करोड़ रुपये) ही पहुंच पाता है। इन आंकड़ों से साबित होता है कि राजीव गांधी ने जो बयान दिया था वह बिल्कुल सटीक था।

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