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दिल्ली का खास खयाल
साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  March 27, 2010

दिल्ली के निवासी राष्ट्रमंडल खेलों की लागत पर अचानक नींद से जाग गए हैं।

राज्य सरकार ने 850 करोड़ रुपये (एक साल में करीब 2000 रुपये प्रति परिवार) उगाहने के लिए रसोई गैस से लेकर डीजल तक और मोबाइल फोन से लेकर कपड़ों तक पर कर बढ़ा दिया है या सब्सिडी में कटौती कर दी है। इससे कई लोग परेशान और खेल विरोधी हो गए हैं।

वैसे भी, राज्य ने केंद्र से राष्ट्रमंडल खेल के लिए बुनियादी ढांचे में निवेश के वास्ते 2000 करोड़ रुपये देने को कहा था, लेकिन प्रणव मुखर्जी के बजट में उसे इसका आधा मिला। अगर केंद्र ने कुछ न दिया होता (और तर्क दिया जा सकता है कि बिहार और ज्यादा रकम पाने का हकदार है) तो फिर दिल्ली में करों में बढ़ोतरी दोगुनी हो गई होती।

दिल्ली का हमेशा ही खास खयाल रखा जाता है लेकिन इस बात को बहुत कम स्वीकार किया जाता है। ऐसे में खेलों के मेजबान के लिए इनकी लागत कितनी है? पांच-छह साल पहले जब यहां खेल आयोजित करने के लिए बोली लगाई गई थी तब शुरुआती आंकड़ा 767 करोड़ रुपये का था।

पिछले साल यह आंकड़ा दोगुने से ज्यादा होकर 1260 करोड़ रुपये पर पहुंच गया और हालिया रिपोर्ट बताती है कि इसमें एक बार फिर बढ़ोतरी हुई है। इसके मुकाबले राज्य की मुख्यमंत्री कहती हैं कि खेल की मेजबानी करने की लागत 15000 करोड़ रुपये है जिसमें लो-फ्लोर बसें, मेट्रो लाइन, फ्लाइओवर, स्ट्रीट लाइट, बेहतर स्ट्रीट फर्नीचर, दोबारा बनाए गए फुटपाथ जैसी शहर की बुनियादी संरचनाओं में निवेश शामिल है।

इस कवायद से राजधानी देश के दूसरे शहरों से अलग नजर आएगी। कहना न होगा, शहर के पास अगले छह महीने में अतिरिक्त बिजली होगी। 15000 करोड़ रुपये के बावजूद परिव्यय तब मामूली लगता है जब इस बात का पता चलता है कि इस साल ग्रीष्मकाल में विश्व कप फुटबॉल की मेजबानी में दक्षिण अफ्रीका 6 अरब डॉलर (27000 करोड़ रुपये) खर्च कर रहा है।

अंतर बस इतना है कि विश्व कप के आयोजन में एक से ज्यादा शहर शामिल होते हैं और एक पखवाड़े से ज्यादा चलते हैं। इसके अलावा प्रतिभागियों की संख्या भी ज्यादा होती है। तुलना मुश्किल है, पर सवाल यह है कि : क्या हम शहर में अतिरिक्त मेट्रो लाइनों या बसों (इनमें से कुछ वातानुकूलित भी हैं) पर खर्च की गई रकम को खेल की लागत में जोड़ेंगे?

कुल मिलाकर, अगले साल दिल्ली के सार्वजनिक परिवहन का कुल परिव्यय 4224 करोड़ रुपये होगा, जो कि निश्चित रूप से सामान्य नहीं है। यहां मुद्दा यह हो सकता है कि क्या दिल्लीवासी इसका भुगतान करेंगे या फिर देश के दूसरे इलाकों में रहने वाले लोग। किसी शहर के निवासी अपना राजस्व खुद पर खर्च करने के हकदार होते हैं।

लेकिन अगर रकम केंद्र की तरफ से उपहार के तौर पर आ रही है, यह रकम जरूरतमंद राज्यों को दी जा सकती थी, ऐसे में सवाल पैदा होता है और इसे पूछा भी जाना चाहिए। वर्तमान साल के बजट के लिए दिल्ली को केंद्र से 2496 करोड़ रुपये मिले, यह आंकड़ा इससे पूर्व वर्षों के मुकाबले तीन गुना है। ऐसे में लगता है कि बाकी देश भी इसी तरह भुगतान कर रहा है।

वैसे भी, समृध्द दिल्ली के पास कुल 26000 करोड़ रुपये का बजट है - परेशान वृहन्मुंबई नगर निगम के 20000 करोड़ रुपये से पर्याप्त रूप से ज्यादा। अन्य अंतर यह है कि असामान्य रूप से दिल्ली बजट का 43 फीसदी हिस्सा योजनागत खर्चों के लिए है (नए स्कूल, नए अस्पताल और एंबुलेंस के नए बेड़े)।

वास्तव में, एक ओर जहां पश्चिम बंगाल का बजट दिल्ली के बजट का तीन गुना बड़ा है (करीब पांच गुना आबादी के लिए), इसका योजना परिव्यय सिर्फ 50 फीसदी ज्यादा बड़ा है। इस संदर्भ को देखते हुए दिल्लीवासियों को 850 करोड़ रुपये की जो अतिरिक्त रकम चुकाने को कहा गया है वह बहुत मामूली राशि है।

शहर का जिस तरह से कायापलट हो रहा है और केंद्र जिस तरह से वित्तीय समर्थन मुहैया करा रहा है उसे देखते हुए दिल्लावासियों को शांत रहना चाहिए और कोई शिकायत नहीं करनी चाहिए।

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