बिजनेस स?टैंडर?ड - उच्च शिक्षा प्रणाली को बड़े सुधारों की दरकार
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उच्च शिक्षा प्रणाली को बड़े सुधारों की दरकार
भारत को अपनी उच्च शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए खुद ही पहल करनी होगी, विदेशी संस्थान और ब्रांड तो इसमें महज सहयोग भर कर सकते हैं। बता रहे हैं
संजय बारू /  March 23, 2010

कपिल सिब्बल एक ऐसे मंत्री हैं जिन्हें फैसले लेने की जल्दबाजी है। यह इस खबर का सुखद पहलू है। भारत को और ऐसे मंत्रियों की जरूरत है, खासतौर पर शिक्षा और बुनियादी ढांचा क्षेत्रों के लिए।

केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय जिसकी कमान पिछले एक दशक के दौरान मुरली मनोहर जोशी और अर्जुन सिंह के हाथों में रही है और इस दौरान मंत्रालय को जो क्षति पहुंची है उसके बाद तो इस मंत्रालय को सिब्बल जैसे कर्ताधर्ता की ही जरूरत थी।

मगर सिब्बल अपने प्रयासों को जल्दबाजी में लागू करने की होड़ में हैं। पिछले महीने बिज़नेस स्टैंडर्ड के संपादकीय में सिब्बल को सावधानीपूर्वक कदम बढ़ाने का सुझाव दिया गया था। इसकी वजह यह है कि शिक्षा एक ऐसा विषय है जिसका असर सब पर पड़ता है, खासतौर पर शहरी मध्यम वर्ग पर। तो अगर शिक्षा नीति में कोई बदलाव करना है तो राजनीतिक मोर्चे पर इसके लिए काफी सोच विचार कर कदम बढ़ाने की जरूरत है।

अपने हालिया प्रयास प्रस्तावित विदेशी शैक्षणिक संस्थागत नियामक विधेयक 2010 का बचाव करते हुए पिछले हफ्ते एक टेलीविजन चैनल पर करण थापर को साक्षात्कार देते वक्त सिब्बल ने अपने शिक्षा सुधारों को 1990 के दशक के शुरुआत के आर्थिक सुधारों से जोड़ा। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित विदेशी शिक्षा बिल का विरोध उन्हीं खेमों की तरफ से हो रहा है जो 1991 में आर्थिक उदारीकरण की आलोचना में जुटे थे।

देखिए आज भारत कहां खडा है। सिब्बल ने समझाते हुए कहा कि आज जिस चीज की आलोचना की जा रही है वहीं आने वाले समय में हमारे लिए फायदेमंद होगी। 1991 में सुधारों का विरोध जल्द ही ठंडा पड़ गया था क्योंकि मध्यम श्रेणी के परिवारों को यह साफ नजर आने लगा कि कीमतें कम होने लगी थीं और शेयर बाजारों के सूचकांक ऊपर उठने लगे थे।

राहुल बजाज को तो लोग अपना मानते थे मगर मुंबईकरों को उनका बॉम्बे क्लब नहीं भाता था। मनमोहन सिंह ने जब सुधारों के लिए पहल की तो देश का मध्यम वर्ग उनके साथ था। सिब्बल को भी यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि समाज का मध्यम तबका उनकी ओर हो।

प्रगति की राह पर बढ़ रहे देश के मध्यम वर्ग के पास खुद को मजबूत बनाने के लिए शिक्षा को अपनाने के अलावा कोई दूसरा हथियार नहीं है। अगर उन्हें लगता है कि किसी फैसले से शिक्षा हासिल करने की उसकी राह कठिन होती है तो वह इसका विरोध करेगा।

भारत में उच्च शिक्षा क्षेत्र में सुधारों का अध्ययन करते हुए देवेश कपूर और प्रताप भानु मेहता (इंडियन हायर एजुकेशन रिफॉर्म: फ्रॉम हाफ बेक्ड सोशलिज्म टू हाफ बेक्ड कैपिटलिज्म, 2007) ने बताया कि भारत में आय या समृद्धि में असमानता से भी ज्यादा खतरनाक शिक्षा हासिल करने में असमानता है। कपूर कहते हैं, 'भारत में शिक्षा की वैसी ही असमानता है जैसी ब्राजील में आस की असमानता है।'

यही वजह है कि कोई भी शिक्षा सुधार कार्यक्रम समग्र विकास की रणनीति के साथ तैयार किया जाना चाहिए। आर्थिक सुधारों का सरोकार नौकरियों और आय से है। वैसे ही शिक्षा का संबंध रुतबे और अवसरों से है। व्यापार उदारीकरण और औद्योगिक डीलाइसेंसिंग भले ही कारोबारियों के भविष्य से जुड़ा हो मगर मध्यम वर्ग के लिए इसके मायने रोजगार के नए स्त्रोतों और उपभोग के नए अवसरों से है।

वहीं दूसरी ओर शिक्षा सुधार एक पीढ़ी के भविष्य से जुड़ा हुआ है। किसी भी नए कदम की साख देश के मध्यम वर्ग के बीच होना जरूरी है। विदेशी शिक्षा बिल के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह कोई इतना बड़ा सुधार कदम नहीं है जितना सिब्बल बता रहे हैं।

क्या लालफीताशाही के रहते हुए उच्च शिक्षा के दरवाजे विदेशी निवेश के लिए खोलना ठीक वैसा ही है जैसा कि स्कूटर के दाम 300 फीसदी से घटाकर 50 फीसदी और उससे भी कम करते हुए इसके उत्पादन में 100 फीसदी विदेशी अधिकार को मंजूरी देना।

सिब्बल इस बिल को पासा पलटने वाला कदम बता रहे हैं। जबकि उनके लिए सही यह होता कि वह इसे 'सुविधा' प्रदान करने वाला कदम बताते। जरा इन तथ्यों पर गौर करें। कपूर और मेहता ने अपने अध्ययन में कहा था कि 2005-06 में भारत सरकार उच्च शिक्षा पर कुल 4.3 अरब डॉलर खर्च कर रही थी जबकि भारतीय नागरिक दुनिया भर में विदेशी विश्वविद्यालयों और शिक्षा संस्थानों को टयूशन फीस के तौर पर करीब 3.5 अरब डॉलर का भुगतान कर रहे थे।

ये दोनों ही आंकड़े अब बढ़ चुके होंगे। भारतीय छात्रों द्वारा विदेशों में इतना खर्च करने की कई वजहें हैं। सबसे सीधी सी वजह यह है कि कई ऐसे भारतीय हैं जो यह खर्चा उठा सकते हैं और इनकी संख्या बढ़ती जा रही है। दो दशकों तक 7 फीसदी से अधिक की विकास दर ने संपन्न कारोबारी वर्ग, समृद्ध प्रोफेशनल वर्ग और नए अमीरों की फौज खड़ी कर दी है जो अपने बच्चों को विदेश भेजकर पढ़ाने का खर्चा उठा सकते हैं।

इनमें से कुछ तो विदेश पढने इसलिए जाते हैं क्योंकि वे वहां जाकर पढ़ने की चाहत रखते हैं जबकि कुछ ऐसे भी होते हैं जिनके पास दूसरा कोई विकल्प नहीं होता है। उच्च विद्यालयों में अच्छे अंक पाने के बाद भी इन्हें सीट की कमी की वजह से देश के अच्छे कॉलेजों में दाखिला नहीं मिल पाता है।

जो लोग अपनी मर्जी से विदेश में जाकर पढ़ाई करना चाहते हैं उन्हें अगर देश में ही समान अच्छे अवसर मिलें तो भी वे यहां रह कर पढ़ाई नहीं करेंगे। मगर जो छात्र अच्छे संस्थानों में दाखिला नहीं मिल पाने की वजह से विदेश जाकर पढ़ाई करते हैं, उन्हें अगर देश में ही अच्छा मौका मिले तो वे इसे ही तरजीह देंगे।

विदेशी निवेश और ब्रांड देश में बेहतर शिक्षा संस्थानों में सीट की कमी को दूर कर सकते हैं। और इस कारण से इनका स्वागत किया जाना चाहिए। यह सच्चाई कि भारतीय छात्रों द्वारा यहां फीस स्थानीय मुद्रा में चुकाए जाने से विदेशी मुद्रा प्रवाह कम होगा एक महत्वपूर्ण तथ्य है।

इस तरह भारत विदेशी मुद्रा बचा पाएगा, परिवारों को अपने बच्चों को अपने पास रखने का मौका मिलेगा और छात्रों को आकर्षित करने के लिए विदेशी शिक्षा संस्थानों को भारतीय शिक्षा संस्थानों को टक्कर देनी होगी। मगर भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली को इससे बड़े सुधार और वित्तीय सहयोग की जरूरत है।

शिक्षा की उपलब्ध बढ़ाना एक चुनौती है और शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाना इससे भी बड़ी चुनौती है। अगर कर भरने वाले ही सार्वजनिक सेवा आपूर्ति की चिंता छोड़ दें तो सेवा पर असर पड़ेगा ही और साथ ही कर संग्रह भी प्रभावित होगा।

राजनीतिक दखल, जातिवाद, ट्रेड यूनियनवाद और कई दूसरी खामियों के जमावड़े के कारण उच्च शिक्षा प्रभावित हो रही है। कोई विदेशी निवेशक और संस्थान मौजूदा हालात को बदल नहीं सकता है। राष्ट्रीय सुरक्षा की तरह ही शिक्षा के क्षेत्र में भी भारत को दूसरों से पहले खुद की मदद करनी होगी।

Keyword: kapil sibbal, education, infrastructure, ministry of HRD, murli manohar joshi, arjun singh,
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