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रक्षा उपकरणों की खरीद के लिए नीति जरूरी
राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद को रूस और अमेरिका से रक्षा उपकरणों की खरीद के लिए तकनीकी हस्तांतरण और सह-उत्पादन को आधार बनाना चाहिए। विस्तार से बता रहे हैं
के. सुब्रमण्यम /  March 22, 2010

हर साल रक्षा बजट में जितनी रकम आवंटित की जाती है उसमें से हजारों करोड़ रुपये बिना खर्च किए लौटा दिए जाते हैं।

रणनीतिक समुदाय रक्षा उपकरणों के खरीद और रक्षा आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में देरी, उनके परीक्षण में विलंब और नौकरशाही अड़चनों की शिकायत करता रहा है। यह एक अत्यंत गंभीर और महत्त्वपूर्ण मसला है और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएससी) को इस पर विचार करना चाहिए था तथा आवश्यक दिशा निर्देश दिए जाने चाहिए थे।

बड़े अफसोस की बात है कि अब तक किसी भी प्रधानमंत्री और सुरक्षा परिषद के सलाहकारों ने इस मुद्दे का हल ढूंढने के लिए एनएससी की सहायता लेने की कोशिश नहीं की और एनएससी महज विशेष प्रस्तावों को मंजूरी देने वाली मंत्रिमंडलीय समिति बन कर रह गई।

यहां इस बात का जिक्र किया जाना जरूरी है कि शीत युद्ध के दौरान जब भारत के पास हथियारों की खरीद का केवल एक ही स्त्रोत था तब हथियारों की खरीद और आधुनिकीकरण में कोई विलंब नहीं होता था।

विमानों की एमआईजी सीरीज, मिसाइलों की एसए सीरीज, 130 एमएम बंदूक, एफ क्लास और किलो क्लास की पनडुब्बियां, पेटयास और दूसरे सोवियत नौसैनिक जहाज, टी-55, टी-72 और टी-90 टैंकों और मिराज 2000 विमानों की खरीद के पहले गुणवत्ता आवश्यकताओं (क्यूआर) की जांच और उनका परीक्षण नहीं किया गया था।

फैसला लेने वालों ने इन हथियारों और उपकरणों की खरीद के पहले सिर्फ इस बात को ध्यान में रखा कि क्या ये संभावित शत्रु देशों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले उपकरणों को टक्कर देने में समर्थ हैं या नहीं। ये कुछ ऐसे रणनीतिक फैसले थे जिनके पहले गुणवत्ता आवश्यकताओं, न्यूनतम टेंडर आदि की चिंता नहीं की गई।

जब से उपकरणों की प्रतियोगिता के आधार पर की जाने लगी तब से ही घोटालों की शुरुआत हुई। डीकेडब्ल्यू पनडुब्बी और बोफोर्स मामले में भ्रष्टाचार पाए जाने की वजह प्रतिस्पर्द्धी बोलियां द्वारा इन्हें खरीदा जाना ही था। जब तक किसी उत्पाद को खरीदने के लिए प्रतिस्पर्द्धी बोलियों और परीक्षण का इस्तेमाल किया जाएगा तब तक विभिन्न स्तरों पर रिश्वत लेने और भ्रष्टाचार की गुंजाइश बनी रहेगी।

इतिहास गवाह रहा है कि दुनिया भर में राजा-महाराजा, प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री, प्रधानमंत्रियों के बेटे व दामाद और वरिष्ठ अधिकारी हथियारों की बिक्री के घोटाले में लिप्त रहे हैं। इसका एक हालिया उदाहरण ब्रिटिश एयरोस्पेस सिस्टम्स का है जिस पर अमेरिका में 40 करोड़ डॉलर का जुर्माना वसूला गया था।

हथियारों की खरीद में तेजी लाना और इस पूरी प्रक्रिया को भ्रष्टाचार से दूर रखना राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति का मामला है। इस मसले को प्राथमिकता देते हुए इसे एनएससी के सुपुर्द किया जाना चाहिए। आधुनिक रक्षा उपकरणों की खरीद और रक्षा तकनीक को उन्नत बनाने और प्रमुख सैन्य शक्तियों के साथ रणनीतिक साझेदारी के लिए एनएससी को रक्षा मंत्रालय को दिशानिर्देश देना चाहिए। इससे देश की रक्षा साख को बढ़ावा मिलेगा।

रक्षा उपकरणों और हथियारों की खरीद किसी टिकाऊ उपभोक्ता सामान जैसे कि टेलीविजन, फ्रिज और वॉशिंग मशीन की खरीद की तरह नहीं है। दरअसल इन उत्पादों को खरीदते वक्त एक उपभोक्ता सबसे कम दाम और उस उत्पाद में अधिक से अधिक फंक्शन की तलाश करता है। ग्राहक चाहता है कि किसी उत्पाद को खरीदते वक्त उसे उसमें ये दोनों खासियतें मिल जाएं।

मगर जब रक्षा उपकरण खरीदे जाते हैं तो यह ध्यान में रखा जाता है कि उस उपकरण का जिस हथियार या उपकरण से मुकाबला होगा, वह उसकी बराबरी का या फिर उससे बेहतर होगा या नहीं। जब कोई उपकरणों के विकास की योजना बना रहा होता है तो गुणवत्ता की जांच महत्त्वपूर्ण होती है। जब किसी देश के लिए रक्षा उपकरणों को खरीद अनिवार्य होती है तो फिर उसे उपलब्ध विकल्पों में से ही चयन करना पड़ता है।

चूंकि भारत रक्षा तकनीक का अधिग्रहण भी करना चाहता है ऐसे में उसे तकनीक के हस्तांतरण पर भी ध्यान देना होगा। मौजूदा समय में रक्षा तकनीक के केवल दो ही प्रमुख स्त्रोत हैं- अमेरिका और रूस।

भले ही यूरोप रक्षा तकनीक का स्वतंत्र स्त्रोत बनने की कोशिशों में जुटा रहता है मगर यूरोपीय देशों के लिए सीमित बाजारों, कंपनियों के विलय और अधिग्रहण और विश्व के सैन्य शोध और विकास खर्च में अमेरिका की प्रमुख हिस्सेदारी की वजह से एक रक्षा उपकरण डेवलपर और उत्पाद के रूप में इसकी भूमिका घटती जा रही है।

शोध एवं विकास केंद्रों को खोलने के लिए और लागत घटाने के लिए पुर्जों और उप-प्रणालियों का बाहर से विकास कराने के लिए भारत अमेरिकी कंपनियों का पसंदीदा गंतव्य है। चीन की चुनौती का सामना करने में भारत के लिए सबसे फायदेमंद बात यह है कि रूस समेत दुनिया की तमाम बड़ी शक्तियां वे भारत को उच्च तकनीकी हथियार और उपकरण बेचने को तैयार हैं जबकि वह चीन को भी इनकी आपूर्ति कर रही हैं।

दूसरी बात यह है कि भारत बड़ी संख्या में उपकरणों की खरीद, लाइसेंस उत्पादन में कदम रखने और सह-उत्पादन समझौतों और संयुक्त आरऐंडडी गठजोड़ की पेशकश की स्थिति में है। भारत विश्व के सबसे बड़े हथियार बाजारों में से एक है और आगे भी बना रहेगा। इस तरह भारत चीन से आगे है क्योंकि चीन को हथियारों की खरीद के लिए चीनी आयात या फिर अमेरिका से उधार या सहायता के तौर पर उपकरणों की आपूर्ति पर निर्भर रहना पड़ता है।

किसी देश को दूसरे देश से संपूर्ण सैन्य तकनीकें प्राप्त हुई हों, ऐसे तीन उदाहरण देखने को मिले हैं। सोवियत संघ ने वर्सिल संधि के बाद रेपैलो संधि के तहत विएमार जर्मनी के साथ किया था। चीन-सोवियत गठजोड़ के बाद चीन को सोवियत से 50 के दशक में संपूर्ण रक्षा तकनीकें मिली थीं। इस कड़ी में एक ताजा उदाहरण रूस से भारत को तकनीक का हस्तांतरण है।

भारत के रूस के साथ काफी पुराने रक्षा संबंध हैं। मगर शीत युद्ध के दौरान रूस के पास रक्षा क्षेत्र में महारथ हासिल थी आज उससे काफी कम है। हालांकि रूस अब भी युद्धक विमानों, नौसैनिक जहाजों, इलेक्ट्रॉनिक और सेंसर तकनीकों की डिजाइनिंग और विकास में काफी आगे है। अमेरिका भी अब भारत को उपकरण बेचने में काफी उत्सुक नजर आता है।

रक्षा उपकरणों के आपूर्तिकर्ता के तौर पर अमेरिका को लेकर जो विचार व्यक्त किए जाते हैं, अक्सर उन्हें गलत समझा जाता है। ऐसा देश जिसके पास पर्याप्त युद्ध संसाधन हैं उसे लघु कालिक रक्षा कार्यवाहियों से नुकसान नहीं पहुंच सकता है।

एनएससी को चाहिए कि वह रूस और अमेरिका से उपकरणों की खरीद के लिए तकनीकी हस्तांतरण और सह-उत्पादन को आधार बनाए। साथ ही रक्षा मंत्रालय को यह अधिकार दे कि हथियारों और उपकरणों के खरीद के समय गुणवत्ता आवश्यकताओं और प्रतिस्पर्द्धी उपभोक्ता परीक्षण को भूल जाएं। इससे उपकरण खरीद की प्रक्रिया में तेजी आएगी और देश की सुरक्षा व्यवस्था को पुख्ता बनाने का यह सबसे कारगर तरीका होगा।

Keyword: defence weapons, national security council, budget, planes, russia, India,
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