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किसे मिलता है अपील करने में असामान्य देरी का फायदा!
अदालती आईना
एम. जे. एंटनी /  March 11, 2010

कई बार वकील अपील करने में बहुत ज्यादा विलंब हो जाने पर न्यायाधीश से आग्रह करता है कि वह इस देरी को माफ कर दें। वैधानिक रूप से अपील करने की एक सीमा होती है।

वकीलों के इस तरह के अनुरोध पर सुनवाई करने वाले न्यायाधीशों को एक समस्या से जूझना पड़ता है। ऐसी देरी को माफ कर देने से प्रतिवादी सुस्त पड़ सकते हैं और वे ऐसी न्यायिक उदारता का फायदा उठा सकते हैं।

दूसरी ओर अगर न्यायाधीश निर्धारित समयसीमा के बाद की गई अपील को विलंब के आधार पर खारिज कर देते हैं तो ऐसे प्रतिवादी को भुगतना पड़ सकता है जिसके पास देर से अपील करने का वाजिब कारण हो। ऐसे प्रतिवादियों के अधिकारों पर कुठाराघात हो सकता है।

समयसीमा पुरानी कानूनी कहावत के आधार पर तय की गई है : सतर्क लोगों को समानता का फायदा मिलता है न कि उन लोगों को जो अपने अधिकार की बाबत नींद में होते हैं। न्यायाधीश तब असमंजस में पड़ जाते हैं जब राजस्व विभाग देरी के लिए माफी चाहता है।

कर की मोटी रकम इसमें शामिल होती है और विभाग अपने स्वभाव के मुताबिक अपील करने में देर करता है। यह देरी दिन में नहीं बल्कि महीनों या सालों में होती है। अगर न्यायाधीश कड़ा रुख अपनाते हुए देरी के आधार पर उनकी अपील खारिज कर देते हैं तो अंतत: आम जनता को इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है क्योंकि राजस्व का काफी नुकसान होता है।

अपील करने में होने वाली देरी के इस खेल में करवंचना करने वाला विजेता होता है, अगर लंबी प्रतीक्षा की बात आती है तो वही मुख्य संदिग्ध होता है। यह कहना मुश्किल है कि अपील करने में हुई देरी नौकरशाही की सामान्य प्रकृति की वजह से होती है या इस देरी को करवंचना करने वालों की तरफ से प्रोत्साहन मिलता है।

ओरिएंटल एरोमा केमिकल इंडस्ट्रीज लिमिटेड बनाम गुजरात इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कुछ दिन पहले दिया गया फैसला न्यायिक असमंजस को रेखांकित करता है। निचली अदालत में मुकदमा हार चुके इस सरकारी निगम को गुजरात उच्च न्यायालय ने अपील दायर करने में चार साल की असामान्य देरी को माफ कर दिया।

न्यायाधीशों ने अपने स्वविवेक का इस्तेमाल करते हुए कहा - हालांकि दावा किया जा रहा है कि अपील दायर करने में चार साल व 28 दिन की देरी हुई है, लेकिन वास्तव में यह सिर्फ 1067 दिन ही है। जब कंपनी ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया तो अदालत ने इस विशेषाधिकार को न सिर्फ गलत पाया बल्कि यह सच्चाई भी साबित हो गई कि सरकारी निगम ने 'साफ-सुथरे हाथों' से अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाया था।

कॉरपोरेशन के वकील कई बार अदालत में उपस्थित नहीं हुए और उन्हें कॉरपोरेशन के अधिकारियों की तरफ से भी निर्देश नहीं मिला था। गुजरात उच्च न्यायालय में लंबित कॉरपोरेशन की अपील को सर्वोच्च न्यायालय ने न सिर्फ खारिज कर दिया बल्कि उच्चाधिकारियों को इस बात की जांच का आदेश दिया कि देरी करने वाले अधिकारियों के आचरण की जांच की जाए।

अदालत ने कहा कि अगर निगम को अधिकारियों के आचरण से नुकसान हुआ है तो यह रकम उनसे ही वसूली जानी चाहिए। पिछले साल इसी समय कर्नाटक राज्य बनाम वाई. मूईदन कुन्ही के मामले में अपील की बाबत जानबूझकर की गई असाधारण देरी का मामला सर्वोच्च न्यायालय के सामने आया। भूमि न्यायाधिकरण में मुकदमा हारने के 14 साल बाद राज्य सरकार ने कर्नाटक उच्च न्यायालय में अपील दायर की।

सरकार ने इस असाधारण देरी पर ध्यान नहीं देने की गुहार लगाई, लेकिन इसे खारिज कर दिया गया। सर्वोच्च न्यायालय में की गई अपील में अधिकारियों के व्यवहार के चलते हुई देरी का मामला सामने आया। अदालत ने सरकार से कहा कि अपील पर सुनवाई से पहले वह 10 लाख रुपये का भुगतान करे।

साथ ही यह भी निर्देश दिया कि कथित धोखाधड़ी व कानूनी उपचार शुरू करने में हुई देरी के लिए जिम्मेदार हर व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की जाए, जवाबदेही तय की जाए और उन लोगों से यह रकम वसूली जाए। याची कुन्ही के लिए कुछ नहीं हुआ क्योंकि कार्यवाही के दौरान ही उनकी मौत हो गई। वैसे यह मामला उन्होंने 1982 में दायर किया था।

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा - इस देरी की खातिर कुशल प्रबंधन किया गया है और यह सार्वजनिक खर्च (सरकारी) पर बेईमान वादी को बचाने के लिए किया गया है। अदालत हालांकि अपील में होने वाली देरी पर लचीला रुख अपनाती है, लेकिन एक सीमा तक ही ऐसे लचीले रवैये को विस्तार दिया जा सकता है।

कुछ महीने पहले अदालत ने दिल्ली राज्य बनाम अहमद जान के मामले में एक बार फिर सरकार को अधिकारियों की जवाबदेही तय करने को कहा था। नियंत्रक एवं महा लेखा परीक्षक ने साल 2003 में ऐसी देरी पर स्टडी की थी और पाया कि इसकी मुख्य वजह कानून के पालन में लापरवाही है, जो कि कानून की किताब में पहले से ही दर्ज है।

हर चरण में देरी होती है, उदाहरण के तौर पर : प्रमाणित प्रति की प्राप्ति, बोर्ड को कागजात सौंपने, उनकी जांच, पैनल ऑफ काउंसिल द्वारा उसका मसौदा तैयार करने और अधिकारियों द्वारा इसे दायर करने में देरी होती है। इसके अलावा राजस्व जैसे संवेदनशील मामलों को देखने वाले अधिकारियों का स्थानांतरण होता है व उनकी पदोन्नति भी होती है।

हाल के वर्षों में यह समस्या काफी हद तक बढ़ी है और स्थायी हो गई है। पूर्व अटॉर्नी जनरल की अध्यक्षता में बनी कमेटी केंद्रीय कानून विभाग द्वारा प्रोसेसिंग व अपील दायर करने के मामले की गड़बड़ियों को कामयाबी के साथ समाप्त नहीं कर पाई। हाल में खबरें आई हैं कि आयकर विभाग 700 ऐसे मामलों में सर्वोच्च न्यायालय जाने की तैयारी कर रहा है जिसमें अपील दायर करने की बाबत असाधारण देरी हुई है।

ऐसे मामलों में सरकार को होने वाला नुकसान काफी बड़ा है। चूंकि स्वविवेक के इस्तेमाल की बाबत कोई दिशा-निर्देश नहीं है, उच्च न्यायालय मामले के तथ्यों व परिस्थितियों के हिसाब से अपना नजरिया पेश करता है।

Keyword: advocates, appeal, judge, justice, corporation,
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