बिजनेस स्टैंडर्ड - बजट के बाद ही निवेश करने की नहीं रखें झंझट
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बजट के बाद ही निवेश करने की नहीं रखें झंझट
आंकड़े बताते हैं कि निवेश के लिए बजट में की जाने वाली घोषणाओं के इंतजार में कई बार बेहतर मौके हाथ से निकल जाते हैं?
जयदीप घोष / मुंबई March 06, 2010

हरेक साल आम बजट पेश होने से पहले कयासों का बाजार गर्म रहता है।

टेलीविजन पर बजट में की जाने वाली संभावित घोषणाओं के बारे में तमाम तरह की खबरें प्रसारित की जाती हैं। आपको ऐसे कई ऐसे विश्लेषक देखने को मिल जाएंगे जो बजट का बाजार पर पड़ने वाले असर पर अपनी राय व्यक्त कर रहे होते हैं। ऐसे में निवेशक विश्लेषकों द्वारा व्यक्त किए  जा रहे अनुमानों के बीच खुद को घिरा हुआ पाते हैं।

जाहिर सी बात है, इन कयासों और अनुमानों के बीच  निवेशकों और बाजार से जुड़े लोगों के मन में उहापोह की स्थिति पैदा हो जाती है। इस बाबत एक वित्तीय सलाहकार क हते हैं 'हमारे ग्राहक केंद्रीय बजट से ठीक पहले निवेश करने में देरी करते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि बजट पेश होने के बाद बाजार में कारोबार की दिशा एक बार फिर से तय हो सकती है।'

इन तमाम बहस से निकलकर अगर हम पिछले पांच सालों के आंकड़ों पर नजर डालें तो बजट में की गई घोषणाओं का बाजार पर असर लगातार कम हुआ है। वर्ष 2006 में पेश बजट पर ही विचार करें, इस दिन बंबई स्टॉक का संवेदी सूचकांक सेंसेक्स 10,282 अंकों के स्तर पर था। महज 30 दिनों के भीतर इसमें 7.75 फीसदी की तेजी आई और यह  उछलकर 11,079 के स्तर पर पहुंच गया।

दिलचस्प बात यह थी कि इस बजट में तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने प्रतिभूति परिचालन शुल्क में 25 फीसदी की बढ़ोतरी करने की घोषणा की थी, लेकिन इसके बाद भी बाजार में कारोबार का दौर नहीं थम सका। अगले छह महीनों में सूचकांक में 12.55 फीसदी की तेजी दर्ज की गई और एक साल बाद बाजार 31.1 फीसदी ऊपर था।

संख्या के आधार पर बात करें तो बाजार ने केंद्रीय बजट के सभी सकारात्मक और नकारात्मक चीजों को अपने भीतर समाहित कर लिया है और इन चीजों का शायद अब उतना फ र्क कारोबार पर देखने को नहीं मिल रहा है। सिर्फ  2008 में सालाना प्रतिफल में कमी आई। इसकी मुख्य वजह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छाई अनिश्चितता रही।

लीमन ब्रदर्स के धराशायी होने से वैश्विक आर्थिक माहौल में अचानक अविश्वास का महौल व्याप्त हो गया था। लेकिन इसके बाद बाजार में लगातार तेजी आई है। हालांकि, छोटी अवधि में बाजार में कारोबार में थोड़ी गिरावट जरूर आई है। वर्ष 2008 के आम बजट के बाद पहले महीने में सेंसेक्स में 2.6 फीसदी की गिरावट आई थी, लेकिन इसके बाद फिर बाजार संभला और सालाना 32.25 फीसदी का प्रतिफल दिया था।

बाजार के जानकारों का कहना है कि कई निवेशकों ने बजट की घोषणाओं का बाजार पर पड़ने वाले असर पर आवश्यकता से अधिक तवाो दी है। दिल्ली के एक शेयर ब्रोकर का कहना है 'मेरे कई ऐसे ग्राहक हैं जिन्होंने बजट के इंतजार में अपनी निवेश की योजना टाल दी। एक ने तो पिछले एक साल से निवेश ही नहीं किया है।

सबसे पहले वह आम चुनाव के समाप्त होने का इंतजार कर रहे थे, उसके बाद भी उन्होंने निवेश नहीं किया और अपने पास नकदी रखना ही उचित समझा। दिलचस्प बात यह है कि वह अभी भी निवेश के लिए सही मौके का इंतजार कर रहे हैं।'

इस ब्रोकर के अनुसार बजट पेश होने के बाद के असर को लेकर कारोबारियों को चिंतित होना चाहिए, निवेशकों को उतनी चिंता करने की जरूरत शायद ही कभी पड़ती है। उसमें भी ऐसे निवेशक जो सिस्टेमेटिक इन्वेस्टमेंट प्लान के जरिये निवेश कर रहे हैं, उन्हें तो और भी चिंता नहीं करनी चाहिए।

एक मुश्त निवेश के बजाय छोटी-छोटी किस्तों में निवेश करना एक अच्छा कदम माना जा सकता है। इस ब्रोकर का कहना है 'क्रेडिट पॉलिसी की घोषणाओं के पहले या बाद बड़ी मात्रा में निवेश कर रहे हैं तो फि र किस्तो में ऐसा करना ज्यादा फायदेमंद हो सकता है।'

हालांकि, बजट या क्रेडिट पॉलिसी जैसी बड़ी घटनाओं के बाद निवेशकों को अपने पोर्टफोलियो को उसी अनुसार व्यवस्थित करने की जरूतर होती है। मिसाल के तौर पर वित्त वर्ष 2010-11 के बजट में होटल और इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनियों को काफी राहत दी गई है, लिहाजा, कोई भी निवेशक इन शेयरों में ज्यादा से ज्यादा निवेश करने का प्रयास करेंगे। इसमें भी पोर्टफोलियो में मामूली फेरबदल की आवश्यकता होती है।

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