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एक सराहनीय कोशिश
आकाश प्रकाश (संस्थापक एवं सीईओ, अमांसा कैपिटल)
आकाश प्रकाश /  February 27, 2010

वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने जो बजट पेश किया है, उसे इसलिए खास माना जा सकता है कि एक तो उसमें हतप्रभ करने के लिए कुछ नहीं है और दूसरा यह कि शेयर बाजार ने उसका स्वागत दिल खोल कर करते हुए 1.25 प्रतिशत की छलांग मार दी (मुख्यत: बढ़त का कारण शॉर्ट कवरिंग ही रही)।

बजट को लेकर बाजार ने अपनी ख्वाहिशों का इजहार अपेक्षित तौर पर दबी जुबां में ही किया था और वित्त मंत्री ने बखूबी इन आकांक्षाओं को पूरा कर दिखाया। सकारात्मक पहलुओं में सबसे पहली बात वित्त मंत्री के बजट भाषण की शुरुआत में ही आ गई कि सामाजिक व्यय के क्षेत्र में मजबूती लाने के लिए कैसे सरकार को आगे बढ़ना है और विकास के लिए कैसे अनुकूल माहौल तैयार करना है।

हर क्षेत्र के बारे में चर्चा किए बिना ही इस सरकार ने सधे और स्पष्ट लहजे में अपनी बात कह दी। पीएसयू विनिवेश के मसले का सीधा जिक्र करते हुए वित्त मंत्री ने इससे मिलने वाली 40 हजार करोड़ रुपये की रकम और इन कंपनियों में से सरकारी हिस्सेदारी बेचे जाने की जरूरतों व फायदों का बिना किसी लाग-लपेट के जिक्र किया।

यह अंदाज फिर एक बार स्पष्ट और सधा हुआ नजर आया, जिससे साफ हो गया कि इस मसले पर अब और सफाई देने की गुंजाइश नहीं है। एक और सकारात्मक पहलू यह रहा कि सरकार ने लक्ष्यों पर वित्त आयोग की सिफारिशों को मंजूर करने और राजकोषीय मजबूती के नजरिए में पारदर्शिता को लेकर इच्छाशक्ति जाहिर कर दी।

राजस्व घाटे को 2013 तक 4.1 प्रतिशत तक लाने और 2014 तक इसे 3 प्रतिशत पर पहुंचाने की उम्मीद भी अच्छी बात रही। सार्वजनिक कर्ज  जीडीपी लक्ष्य को मंजूर करने की इच्छाशक्ति भी एक बार फिर बड़ा बदलाव नजर आया।

स्पष्ट तौर पर यह कह देना कि सरकार फर्टिलाइजर या तेल बॉन्ड जारी नहीं करेगी और सभी सब्सिडियों का भुगतान नकद करेगी, इन क्षेत्रों की कंपनियों के लिए सकारात्मक तो है ही, साथ ही राजस्व गणनाओं में पारदर्शिता भी सुनिश्चित करेगी। वित्त मंत्री का यह कहना भी बाजार के दिल को खुश कर गया कि 2011 में राजस्व घाटे को 5.5 फीसदी पर ले आया जाएगा।

भरोसे लायक वृहत लक्ष्यों का जिक्र करने पर भी वित्त मंत्री की तारीफ की जानी चाहिए क्योंकि इन्हें देखकर ऐसा लगता है कि अगर बजट में मामूली बढ़त को लेते हुए 13 प्रतिशत जीडीपी और शुध्द कर आय विकास दर 15 प्रतिशत का अनुमान लगाया जा रहा है तो इन दोनों लक्ष्यों को पूरा कर पाने को लेकर कोई संदेह भी नहीं है।

खर्च भी सही दिशा की ओर बढ़ रहा है, जिसमें योजनाबध्द खर्च में 15 प्रतिशत और गैर योजनाबध्द खर्च में महज 6 प्रतिशत की विकास दर शामिल है। हालांकि कोई यह सवाल भी पूछ सकता है कि कुल खर्च केवल 8.5 प्रतिशत पर लाने की क्षमता है भी या नहीं?

कर ढांचे के पुनर्गठन के बाद मध्यम आय वर्ग की झोली में आ रही अतिरिक्त 25-30 हजार करोड़ रुपये की रकम को भी शहरी उपभोक्ता के सेंटीमेंट्स में जोरदार बढ़त और खपत में मदद के लिहाज से एक और बड़ा कदम कहा जाएगा।

मैट में 18 प्रतिशत की बढ़ोतरी भी मेरी समझ से सकारात्मक है क्योंकि यह हमें करों की कम दर के डीटीसी आदर्श की ओर जाने को मजबूर करेगी, जो कि हर कंपनी को सीमित छूट के साथ देना होता है। उत्पाद में केवल 2 प्रतिशत के रोल बैक को भी बाजार के लिए एक चौंकाने वाला तोहफा ही माना जाएगा।

अन्य सुधारों, मसलन कोयला ब्लॉकों की नीलामी, कोयला नियंत्रक का सृजन, निजी क्षेत्र के लिए नए बैंक लाइसेंस खोले जाने की इच्छा और कानूनी सुधारों के लिए भत्ते भी बड़ी सकारात्मक बातों में ही शुमार हैं। बजट को लेकर मुझे जो समस्या है, वह यह कि यह एक बार फिर से सुधारों को दरकिनार करने वाला रहा है।

वित्त मंत्री ने राजस्व घाटे को जीडीपी के 6.9 प्रतिशत से घटाकर 5.5 फीसदी पर लाने की कवायद की है, वह भी तब जबकि टैक्सेशन में महज 20 हजार करोड़ रुपये की शुध्द बढ़त है। बजट की सारी गणित इन बातों पर टिकी है कि खर्च विकास को 8.6 प्रतिशत पर नियंत्रित रखा जाए और विनिवेश व थ्री जी नीलामी के जरियों से 75 हजार करोड़ रुपये जुटाए जाएं जबकि ये दोनों ही बातें पूरी तरह से सरकारी बूते की नहीं हैं।

आय बढाने का जो एकमात्र वास्तविक कदम नजर आ रहा है, वह है पेट्रोलियम पदार्थों पर शुल्क बढ़ाना जो कि महंगाई की आग में घी का काम करेगा। सच तो यह है कि बॉन्ड बाजार, 2011 के लिए लोअर बोरोइंग कार्यक्रम को लेकर शुरुआती बढ़त में था, ईंधन कीमतों में इजाफे के बाद बढ़ी महंगाई के चलते अपना जलवा खो चुका है।

खर्च के मसले पर वास्तविक संगठनात्मक बदलावों का भी इसमें अभाव है क्योंकि कीर्ति पारेख रपट पर कोई कदम नहीं उठाया गया, फर्टिलाइजरों के लिए एनएसबी योजनाओं पर विस्तृत जानकारी नहीं दी गई और खाद्य सब्सिडियों के लक्ष्यों पर भी कोई सुगबुगाहट नहीं दिखी।

क्या हम वाकई कुल खर्च विकास दर को 2011 के बाद 9 प्रतिशत के आस-पास रख पाएंगे, जबकि खाद्य बिल अधिकार और शिक्षा के अधिकार के बिल के खर्च को अभी भी बजट की अंकगणित में शामिल किया जाना बाकी है। दोनों बड़े राजस्व सुधार, जीएसटी एवं डीटीसी को 2011-12 में ही लागू किया जाना है।

बजट में सबसे बड़ा सकारात्मक पहलू वित्तीय आयोग के राजस्व लक्ष्यों को लेकर जताई प्रतिबध्दता है और इसके लिए यह सौ फीसदी अंक दिए जाने लायक भी है। हालांकि इसे लेकर बाजार की खुशी को तात्कालिक कहा जा सकता है क्योंकि यह जल्द ही इस बात पर ध्यान देना शुरू करेगा कि इन लक्ष्यों को हम पाएंगे कैसे।

बहरहाल, समूचे परिदृश्य को निहारने के बाद इसे कम से कम बुरी कोशिश तो नहीं कहा सकता क्योंकि इसने सरकार को कई कठिन संरचनात्मक सुधारों को लागू करने के लिए कुछ समय मुहैया करा देगा।

वैसे सरकार को कभी न कभी तो इस बात को समझना ही होगा कि इन बड़े वादों पर उसे खरा उतरकर भी दिखाना है क्योंकि बाजार केवल जबानी लक्ष्यों पर भरोसा नहीं करता, उसे वह मूर्त रूप में साकार होते देखना चाहता है।

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