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फूलों के साथ-साथ कांटे भी मिले हैं इस बजट में
इंदिरा राजारामन (प्रोफेसर, भारतीय सांख्यिकीय संस्थान, नई दिल्ली)
इंदिरा राजारामन /  February 27, 2010

नए वित्त वर्ष के लिए केंद्रीय बजट काफी अच्छे हालात के बीच पेश किया गया है। कुछ लोग इसके खिलाफ तीसरी तिमाही के आंकड़ों का हवाला दे सकते हैं, जिन्हें उत्साहजनक नहीं कहा जा सकता।

हालांकि, मैं उनकी इस दलील से सहमत नहीं हूं। उम्मीद है कि जब चालू वित्त वर्ष के लिए प्रारंभिक आंकड़े आएंगे, तो वह काफी अच्छे होंगे। ऐसा मैं इसलिए कह रही हूं क्योंकि 7.2 फीसदी की असल विकास दर और महंगाई के मौजूदा आंकड़े 10.6 फीसदी के आंकड़े से मेल नहीं खाते।

इसीलिए चालू वित्त वर्ष में घाटे की दरों में कमी आएगी और यह कमी इसके बाद आने वाले वित्त वर्षों में भी जारी रहेगी। वैसे, इसके साथ-साथ कई दूसरी बातें भी हैं, जो राहत का सबब बनकर आई हैं। अगले साल में राजस्व घाटा 4 फीसदी के स्तर पर रहने का अनुमान है, जो बीते साल की मध्यम अवधि की राजकोषीय योजना (एमटीएफपी) के तीन फीसदी के अनुमान से ज्यादा है।

हालांकि, नए वित्त वर्ष का वित्तीय घाटा बीते साल के एमटीएफपी के अनुमान के बराबर ही है। इसमें सरकार अपने खर्चों, खास तौर पर गैर योजनागत खर्चों में कटौती करके कमी कर सकती है। आज सब्सिडी पर लगाम लगाने की सबसे ज्यादा जरूरत महसूस की जा रही है। यह हमारे सरकारी खजाने पर बड़े बोझ के रूप में लोगों के सामने आ रहे हैं।

सरकार ने अब उर्वरक सब्सिडी को पौष्टिकता के आधार पर देने का फैसला लिया है। यह वाकई काफी अच्छा कदम है। इसके फायदे हमें सरकारी खजाने पर कम होते बोझ के अलावा कई दूसरे रूप में नजर आएंगे। पेट्रोलियम सब्सिडी को खत्म करने के मामले को सरकार ने ठंडे बस्ते में भले ही डाल दिया है, लेकिन कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों पर सीमा शुल्क को बढ़ाकर उसने एक शुरुआत तो की है।

पेट्रोलियम कीमतों में इजाफे की घोषणा से सदन में इतना जबरदस्त हंगामा हुआ कि उस शोर में वित्त मंत्री के बजट भाषण के एक अहम हिस्से को सुनना मुश्किल हो गया। अपने बजट भाषण में वित्त मंत्री ने अपने खुद के इस्तेमाल के लिए (कैप्टिव माइनिंग) कोयला ब्लॉकों का आबंटन अब नीलामी के आधार पर करने का फैसला लिया है।

यह उन आर्थिक सुधारों में से एक है, जिसकी सिफारिश 13वें वित्त आयोग ने वित्तीय घाटे पर लगाम लगाने के लिए की थी। आयोग के मुताबिक इस तरह के कदमों से वित्तीय घाटे पर काबू पाने में आसानी हो सकती है। इसीलिए अगर सरकार ने वित्तीय घाटे की दिशा में लंबी दूरी तय नहीं की है, तो कम से कम इस दिशा में कदम तो उठाने शुरू कर दिए हैं।

इसके अलावा, दूसरे कदमों को उठाते वक्त भी सरकार ने वित्त आयोग के लक्ष्यों को ध्यान में रखा है। सरकार ने बुनियादी ढांचे को केंद्र में रखकर विकास की रफ्तार को तेज करने का इरादा किया है। इसीलिए तो सरकार ने दिल्ली-मुंबई के बीच एक समर्पित गलियारा और मेगा पावर प्लांटों की योजना बनाई है।

बुनियादी ढांचों के लिए पैसों की कमी अवरोधक नहीं बन पाए, इसके लिए सरकार ने इन्फ्रास्ट्रक्चर बॉन्डों में पैसा लगाने वाले करदाताओं के लिए 20 हजार रुपये तक की अतिरिक्त छूट देने की घोषणा की है। साथ ही, सरकार ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) के लिए किसी तरह की कमी नहीं होने दी है। इस योजना के तहत सरकार गांव-गांव तक सड़कों को लेकर जाना चाहती है, जो इनके विकास में एक अहम भूमिका निभाएंगीं।

कृषि को लेकर केंद्र की बनाई गई चौतरफा नीति इस क्षेत्र के लिए एकीकृत प्रयास की जरूरत को दिखलाती है, ताकि खास तौर पर बारिश संचित दलहन और तिलहन की उत्पादकता में इजाफा किया जा सके। इसके अलावा, सरकार ने अपने इस बजट में पर्यावरण का भी पूरा ख्याल रखा है। सरकार ने प्रदूषण फैलाने वालों पर भी दंड का प्रावधान किया है।

साथ ही, एक स्वच्छ ऊर्जा फंड का भी निर्माण किया है। उत्पाद कर में 10 फीसदी का इजाफा करके और सेवा कर में 10 फीसदी की कटौती को जारी रखते हुए वित्त मंत्री ने संतुलन को बनाए रखा है। यह भविष्य में आने वाले वस्तु व सेवा कर (जीएसटी) की दिशा में उठाया गया बिल्कुल सही कदम है। इससे हमें अपने वित्तीय घाटे को भी काबू में रखने में मदद मिलेगी।

ऐसी बात नहीं है कि यह बजट सारी अच्छी बातों का ही पिटारा था। इसमें कई नकारात्मक बिंदु भी थे। विशेष आर्थिक जोन (सेज) को लगातार जारी सहायता के लिए सरकार को तर्क पेश करने चाहिए। दरअसल, इसमें कई प्रकार के करों में कटौती की गई है। इससे केंद्र राज्यों को कर से होने वाली कमाई में कम हिस्सा दे पाएगा।

इसे सरकार को वित्त आयोग की सिफारिशों को ध्यान में रखते हुए तर्कसंगत बनाया जाना चाहिए। साथ ही, इसमें स्थानीय निकायों की भी सहमति ली जानी चाहिए। स्वच्छ ऊर्जा फंड के लिए पैसा सरकार कोयले पर लेवी लगाकर हासिल करेगी। पैसे जुटाने का यह तरीका पर्यावरण को देखते हुए काफी जायज लगता है, लेकिन इससे कोयले पर आधारित बिजली घरों के खर्च में अचानक काफी इजाफा हो जाएगा।

ध्यान रहे कि आज भी हमारे मुल्क में पैदा होने वाली कुल बिजली में से 60 फीसदी बिजली इन्हीं बिजली घरों से आती है। आज बिजली क्षेत्र की पतली आर्थिक स्थिति की वजह से कई राज्यों में सरकार को मोटा घाटा उठाना पड़ रहा है। यहां भी सरकार ने इस कदम से राज्यों पर पड़ने वाले असर के बारे में नहीं सोचा।

अपनी योजनाओं की समय-समय पर पूरी समीक्षा के लिए एक तंत्र का गठन करने का प्रस्ताव तो है, लेकिन जब तक यह एजेंसी इन योजनाओं को लागू करने वालों के करीब नहीं पहुंच जाती, इसका असर ज्यादा नहीं हो सकता है। हालांकि, अब सरकार ने अनेक योजनाओं के बीच बेहतर समन्वय का परिचय तो दिया है। अब सरकार स्वास्थ्य बीमा के लिए आरएसबीवाई योजना को नरेगा से जोड़ने वाली है।

वैसे, अभी बड़ी योजनाओं के बारे में सरकार गंभीरता से नहीं विचार कर रही है। आज भी इंदिरा आवास योजना जिंदा है, जबकि अरब से ज्यादा आबादी में कुछ खास लोगों को ही मकान बनाने के पैसे देना औचित्य नहीं समझ में आता है। आखिर में आम तौर पर यह सोच है कि वित्त आयोग ने सरकार के कंधों पर भारी बोझ डाल दिया है, जो सही नहीं है।

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