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जरूरत है अपनी व्यवस्था में सुधार लाने की
वोट बैंक की राजनीति को छोड़ हमें बड़ी तस्वीर को देखते हुए कदम उठाने पड़ेंगे, तभी हम आर्थिक विकास की अपनी तेज रफ्तार को कायम रख पाएंगे। बता रहे हैं
अरविंद सिंघल /  February 25, 2010

बीते कुछ हफ्तों में हर कोई वित्त मंत्री के दिमाग में चल रही बातों को समझने की कोशिश में जुटा हुआ है।

साथ ही, मीडिया तक पहुंच रखने वाला हर शख्स मंत्री को सलाह दे रहा है। वैसे भी इस रहस्य पर से आज किसी भी हालत में पर्दा तो उठ ही जाएगा। इसलिए अब इस बारे में वित्त मंत्री को सलाह देने का कोई तुक नहीं है। 

हालांकि, हाल के कुछ दशकों में बजट भाषण सत्तारुढ़ दल या गठबंधन की आर्थिक विचारधारा के बारे में विस्तार से बताने लगा है। इसीलिए शुक्रवार को बजट भाषण का पहला हिस्सा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष करों के बारे में सरकार के वास्तविक प्रस्तावों से ज्यादा अहम होगा। 1947 में मिली आजादी के बाद से भारतीय अर्थव्यवस्था अलग-अलग आर्थिक और राजनीतिक विचारधाराओं से जूझती रही है।

आज इस मुकाम पर यह सिर्फ अकादमिक बहस का मुद्दा बन कर रह गया है कि अगर भारत ने आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए कोई दूसरी राह अपनाई होती, तो हम आज इस वक्त कहां खड़े होते।

आज अहम यह है कि अगर हमें कभी विकसित मुल्कों के बराबर का दर्जा हासिल करना है और अगर हमें अपने मानव विकास सूचकांक को विकसित मुल्कों के बराबर लाना है, तो हमें अपने मुल्क की व्यवस्था के पूरे ढांचे में ही सुधार लाना होगा। इसी से हम ज्यादा अच्छे नतीजे दे पाएंगे।

इसीलिए यह ज्यादा अच्छा होगा कि राजनीति पार्टियां, नौकरशाही, अर्थशास्त्री, उद्योगपति, उद्योग परिसंघ और पूरी आम जनता इस बारे में ज्यादा सोचें। हमें अपनी अर्थव्यवस्था पर चोट करने वाले बड़े मुद्दों की पहचान करनी होगी और फिर उन्हें सुधारने के लिए उचित वैचारिक और नीतिगत कदम उठाने होंगे। इसी से हमारी अर्थव्यवस्था को असल राहत मिलेगी, न कि उन छोटे-मोटे राहत पैकेजों से जो कुछ समय के लिए कर में छूट देते हैं।

इस सूची में सबसे ऊपर रहने वाला चीज शायद भूमि ही होगी, जिसकी वजह से मुल्क आगे बढ़ने से रुका हुआ है। राजनीतिक दल और नौकरशाही को इस बारे में कोई समझ ही नहीं है कि पहले से काफी संकुचित हो चुकी इस संपदा का बेहतर इस्तेमाल कैसे किया जाए। इस संपदा की जरूरत आज अरब के आंकड़े को पार कर चुकी हमारी आबादी और फिर अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों को है।

भूमि होल्डिंग, इसके इस्तेमाल, आधिकारिक निर्माण क्षेत्र (एफएआरएफएसआई) और इस तक पहुंच की सुविधाओं को लेकर ढुलमुल नीति की वजह से भारत में निजी या औद्योगिक इस्तेमाल के लिए जमीन की कीमत पहले से ही आसमान को छू रही हैं। आज हमारा मुल्क दुनिया का सबसे युवा राष्ट्र है। हमारे मुल्क में हर साल 2.5 करोड़ बच्चे पैदा हो रहे हैं और हर साल मुल्क की आबादी में 1.7 करोड़ नए नाम जुड़ रहे हैं।

ऐसे में हमारे मुल्क में लोगों की ज्यादा कमाई में इजाफा नहीं होना चाहिए था। फिर भी अच्छी शिक्षा के अभाव में एक खास तबके की कमाई में तेजी से इजाफा पूरे मुल्क की अर्थव्यवस्था की कार्यकुशलता पर भारी पड़ रही है। इन बड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए भारत को काफी ज्यादा नई सोच वाले उपायों की जरूरत होगी। ऐसे में इन उपायों या पूंजी के लिए मुल्क या क्षेत्र की सीमाएं नहीं होनी चाहिए।

फिर भी हमारे पास छोटे और मझोले उद्योगों और उद्यमियों के लिए एक भी अच्छी रणनीति नहीं है, ताकि इन्हें बढ़ावा मिल सके। खास तौर पर सेवा क्षेत्र में तो इन रणनीतियों का खासा अभाव है, जहां उद्यमियों के पास गिरवी रखने के लिए ज्यादा कुछ नहीं होता। साथ ही, इस क्षेत्र में विश्व भर से पूंजी को हासिल करने की दिशा में भी ज्यादा कुछ नहीं किया जा रहा है।

इससे इस क्षेत्र के विकास पर काफी बुरा असर पड़ रहा है। बुनियादी ढांचे की इस बुरी हालत की वजह से मुल्क को आज काफी भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। यह बात किसी से छुपी हुई भी नहीं है। इनके अलावा, कई दूसरी बातें भी हैं, जो मुल्क के तेज विकास में पहाड़ की तरह खड़ी हैं। इसमें सबसे पहले है, लोगों का सामान्य सेवाओं और वस्तुओं की कीमतों के बारे में भावना।

आज रेलवे भाड़े, मालभाड़े, पेट्रोलियम, पानी, बिजली और शिक्षा में कीमतों में इजाफा नहीं किया जा रहा है। छोटी अवधि में भले ही इससे सत्तारूढ़ दलों को कुछेक ज्यादा वोट मिल जाएं, लेकिन लंबी अवधि में इनके नतीजे भयानक हो सकते हैं। दरअसल, ये बातें लंबी अवधि में क्षमता में इजाफे की राह में स्रोतों की कमी को पैदा करेंगे, जो देश के लिए काफी मुसीबत का सबब हो सकता है।

आज कई ऐसी सब्सिडी है, जिनका औचित्य समझ के बाहर की बात है। सबसे पहले तो कृषि को दिए जाने वाली सब्सिडी को ही ले लीजिए, जो काफी पुराना मुद्दा है। सरकारें इससे छूने से भी कतराती हैं क्योंकि इससे उनके वोट बैंक पर असर पड़ेगा। साथ ही, निर्यात के लिए भी सब्सिडी दी जा रही है।

इसके अलावा, और भी कई तरह की सब्सिडी दी जा रही है। इससे हमारे पास पहले से ही तेज से कम होते जा वित्तीय स्रोत और भी ज्यादा तेजी से कम होते जा रहे हैं। इस पैसे का इस्तेमाल दूसरी जगहों पर ज्यादा अच्छी तरीके से किया जा सकता था।

अब आखिर में आते हैं, गलत कर ढांचे की तरफ। इससे कर चुकने वाले का आधार काफी कम तो है ही है। साथ ही, इसमें टैक्स की दरों को भी दूसरे कई प्रकारों की छूटों से और भी कम रखा गया है। इससे नेताओं को वोट तो मिल जाते हैं, लेकिन मुल्क के लिए अहम वित्तीय संसाधनों का स्रोत खत्म हो जाता है।

जब तक हमारा राजनीतिक नेतृत्व बड़ी तस्वीर की तरफ देखना नहीं शुरू करता है और भारत में संसाधनों के लिए स्रोतों की तलाश नहीं करती है, मुल्क की इस तेज विकास रफ्तार को बनाए रखना एक टेढ़ी खीर साबित होगा। इसका नतीजा लंबी अवधि में पूरे मुल्क को ही भुगतना पड़ सकता है। 

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