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नकारा वकीलों से कोर्ट की नाराजगी
एम. जे. ऐंटनी /  May 08, 2008
अदालतों में चलने वाले आधे से ज्यादा मुकदमों में सरकार एक पार्टी होती है और सुप्रीम कोर्ट की दहलीज तक पहुंचने वाले मुकदमों में काफी सरकारी धन खर्च करना पड़ता है।
दीवानी मुकदमों में सरकार के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले ज्यादातर लोग धनी और प्रभावशाली होते हैं। इन लोगों के पास मुकादमा लड़ने के लिए उम्दा वकील रखने की कूवत होती है। दूसरी ओर, सरकारी वकील कई मामलों में अक्सर गैर-प्रभावशाली और पंगु होते हैं। इस वजह से सरकारी खजाने पर भारी बोझ पड़ता है।
सुप्रीम कोर्ट के जजों ने इसे एक गंभीर समस्या के रूप में लिया है। 14 अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल की नियुक्तियों (जिन पर काफी बहस भी चल रही है) के बावजूद हालात में थोड़ा-बहुत सुधार भी दर्ज नहीं किया जा सका है।
जस्टिस एस. एच. कपाड़िया और जस्टिस सुदर्शन रेड्डी, जो इनकम टैक्स, उत्पाद, कस्टम और राजस्व से जुड़े कई और मामलों की अपील सुनते हैं, ने पिछले कुछ हफ्तों के दौरान काफी जोर देकर कहा है कि अदालतों में सरकारी डिफेंस की हालत बेहद खस्ता है। सरकारी वकीलों और विधि मंत्रालय के अधिकारियों की अयोग्यता की वजह से होने वाला राजस्व नुकसान आसमान छू रहा है।
इनकम टैक्स बनाम रीयलेस्ट बिल्डर्स ऐंड सर्विसेज के मामले में जजों को मजबूर होकर इन बातों का उल्लेख करना ही पड़ा। हालात सुधारने की नाकाम कोशिश का जिक्र करते हुए जजों ने अपने फैसले में कहा - 'हमने एक दफा फिर यह पाया है कि टैक्स से जुड़े मामलों में भारत सरकार की ओर से हमारे सामने पेश होने वाले वकील समस्या पर जिरह करने को तैयार नहीं है।
अडिशनल सॉलिसिटर जनरल अमरजीत सेन ने हमें बताया कि वह इस मामले में जिरह में हिस्सा लेने की स्थिति में नहीं हैं, क्योंकि वकील डी. के. सिंह ने उनसे मामले की ब्रीफिंग नहीं की। यहां तक कि केंद्र सरकार के एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड बी. वी. बलराम दास भी अदालत में मौजूद नहीं थे।' हीला-हवाली का उदाहरण यह भी है कि इस मामले में दिए गए हाई कोर्ट के फैसले भी सुप्रीम कोर्ट को मुहैया नहीं कराए जा सके। सुप्रीम कोर्ट ने कहा - 'कई मामलों में लेटलतीफी दिखाई गई है।
एक बार फिर केंद्र सरकार की ओर से किसी तरह की नुमाइंदगी नहीं की जा सकी है। इस हालत को देखकर हम हतप्रभ हैं। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बाकायदा सुनवाई की एक खास तारीख तय कर रखी थी, बावजूद इसके किसी तरह के इंतजाम नहीं किए गए। हम चाहते हैं कि भारत सरकार टैक्स से संबंधित मामलों में भविष्य में चीजों को गंभीरता से ले। हमें उम्मीद है कि टैक्स से संबंधित मामलों में तजुर्बा रखने वाले सरकारी वकीलों को सही तरीके से ब्रीफिंग दिलाए जाने के इंतजाम किए जाएंगे।'
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अदालत का समय जाया करने का आर्थिक भुगतान करने का आदेश सरकार को दिया और निर्देश दिया कि आदेश की प्रतियां वित्त मंत्रालय और विधि मंत्रालय को भेजी जाएं ताकि वे इस पर 'तत्काल ध्यान' दे सकें। गौरतलब है मौजूदा विधि और वित्त मंत्री वकील हैं और वित्त मंत्री को तो यह बात बखूबी याद होनी चाहिए कि सरकारी महकमों की हीलाहवाली की वजह उनका मंत्रालय कॉरपोरेट जगत के खिलाफ कितना केस जीत पाया है।
कुछ दिनों पहले एक और मामले में सुप्रीम कोर्ट में ही इसी तरह की कहानी दोहराई गई। अमेरिकन होटल और लॉजिंग एएसएसएन एजुकेशनल इंस्टिटयूट बनाम सीबीडीटी मामले की सुनवाई इस स्थगित करनी पड़ी, क्योंकि इस मामले में मंत्रालय द्वारा जारी किए गए जवाब की प्रति सरकारी वकील को मुहैया नहीं कराई गई थी।
जजों को इस बात का पता तब लगा जब सरकारी वकील मामले की बहस इस तरह कर रहे थे, मानो वे मामले से पूरी तरह वाकिफ ही न हों और वकील के बयान इस मामले में सरकार द्वारा जारी काउंटर-हलफनामे से मेल नहीं खा रहे थे। इसके बाद संबंधित अडिशनल सॉलिसिटर जनरल को अदालत में बुलाया गया।
फिर अडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को भरोसा दिलाया कि वह अपने अधिकारियों की मीटिंग बुलाएंगे और चीजों को पटरी पर लाने की दिशा में काम करेंगे। हालांकि अडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने यह भी कहा कि अधिकारी उनके द्वारा लिखी गई चिट्ठियों को बहुत संजीदगी से नहीं लेते।
90 के दशक में सुप्रीम कोर्ट एक ऐसे ही मामले की सुनवाई के दौरान सरकारी वकील के तर्कों से इतना दुखी हुआ कि उसने जिरह बंद कर दी और मामलों की जांच खुद अपने स्तर से शुरू कर दी। ऐसा किए जाने की वजह यह थी सरकारी वकील द्वारा दी जाने वाली दलीलें सरकार के खिलाफ जाती ही नजर आ रही थीं। यह मामला के. आई. पवूनी बनाम सेंट्रल एक्साइज कलेक्ट्रेट से संबंधित था।
इस मामले में कोर्ट ने कहा - 'हमें इस बात का जिक्र करते हुए काफी दुख हो रहा है कि कस्टम एक्ट के प्रावधानों के खिलाफ काम किए जाने वाले इस मामले में सफेदपोश लोगों के नाम हैं। लिहाजा सरकार को इस बात का ख्याल गंभीरतापूर्वक रखना चाहिए कि ऐसे संवेदनशील और दूरगामी महत्व वाले मामलों में ऐसे वकीलों को जिरह के लिए पेश किया जाए, जिसे कानून के इस खास हिस्से की बेहतर समझ और तजुर्बा दोनों हो।
ऐसा नहीं किए जाने से पब्लिक जस्टिस पर बुरा असर पड़ता है और देश की माली हालत में भी सेंध लगती है। लिहाजा विभिन्न विभागों के सचिव इस मामले पर ध्यान दें और अपने महकमों को दुरुस्त किए जाने की दिशा में काम करें। अटॉर्नी जनरल को भी इन तमाम पहलुओं पर गौर फरमाना चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो इससे कोर्ट का बोझ कई गुना बढ़ जाएगा।'
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