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राहत पैकेज की वापसी नहीं है बड़ा सवाल
कम समझदारी वाले लोग राहत पैकेज की वापसी को बजट का अहम मुद्दा बता रहे हैं, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि अभी तक कितने सरकारी वादे पूरे हुए हैं। बता रहे हैं
टी एन नाइनन /  February 24, 2010

बजट से पहले की ज्यादातर अटकलबाजी इस बात पर हो रही है कि क्या बजट में राहत पैकेज को वापस लिया जाएगा और लिया जाएगा, तो कितना लिया जाएगा।

यह बहस राहत पैकेज के बारे में लोगों की कम समझ को दिखलाती है। यह बहस उस बात की तरफ से लोगों का ध्यान हटाती है, जो बहस के केंद्र में होनी चाहिए थी। राहत पैकेज उस सरकारी खजाने में एक साल के अतिरिक्त घाटे को कहते हैं। इस आधार पर इस साल के लिए राहत पैकेज 73 हजार करोड़ रुपये का था।

दरअसल, यह चालू वित्त वर्ष के प्रस्तावित वित्तीय घाटे और बीते वित्त वर्ष के असल वित्तीय घाटे के बीच का अंतर है। इस बात को याद रखें कि 2008-09 में राहत पैकेज काफी बड़ा (करीब 1.93 लाख करोड़ रुपये) का था। इसीलिए राहत पैकेज में कटौती तो काफी पहले ही हो चुकी है।

इसके बावजूद आर्थिक विकास की रफ्तार में इजाफा ही हुआ है। इसमें तो उस रकम को जोड़ा ही नहीं गया, जो सरकार ने 2008-09 में तेल और उवर्रक की सब्सिडी के तौर पर उधार लिया था। अगर इसे भी जोड़ दें, तो चालू वित्त वर्ष में राहत पैकेज पहले से ही नकारात्मक स्तर पर पहुंच चुका है।

अगले वित्त वर्ष में तो वित्त मंत्री से पहले से इस घाटे पर लगाम कसने की उम्मीद है। दरअसल, इस बारे में उन्होंने जुलाई में बजट पेश करते वक्त कहा था। दूसरे शब्दों में इस साल वह बजट में अगर किसी कर में दी गई छूट को वापस लेने का ऐलान नहीं भी करते हैं, तो भी वह राहत पैकेज में कटौती कर देंगे। ऐसा ही होना भी चाहिए क्योंकि अगले साल मुल्क की आर्थिक तरक्की की रफ्तार 8 फीसदी से ज्यादा रहने की उम्मीद है। 

जहां तक उत्पाद और सेवा करों में दी गई छूटों को वापस लेने वाले बचकाने सवालों का प्रश्न है, तो जाहिर तौर इनका असर खास उद्योगों पर जरूर होगा। लेकिन बड़े स्तर पर मुल्क की अर्थव्यवस्था पर इसका असर सीमित ही रहेगा। बीते साल जुलाई में बजट के वक्त वित्त सचिव ने कहा था कि छूट जारी रखने से मुल्क की अर्थव्यवस्था पर 30 हजार करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा।

इन छूटों को वापस लेने से सरकार या तो इतनी रकम या फिर इससे थोड़ी सी ही ज्यादा रकम हासिल कर लेगी। वहीं, चालू वित्त वर्ष का बजट 10.2 लाख करोड़ रुपये का है, जिसमें से 4 लाख करोड़ रुपये का घाटा है। ऐसे में यह रकम तो सरकार के लिए छुट्टे पैसे के समान है।

यहां असल सवाल जुड़ा हुआ है बड़े स्तर पर आर्थिक परिदृश्य के साथ। जो सवाल इस अखबार ने बीते साल जुलाई में सवाल पूछा था और आज भी पूछ रहा है, वह यह है कि क्या इस साल भी सरकार के लिए 6.8 फीसदी का वित्तीय घाटा जरूरी है? सरकार की बड़े स्तर पर अर्थव्यवस्था को लेकर बनाई गई अवधारणाओं में काफी बड़ी-बड़ी गलतियां हैं। 

सरकार यह मान कर चल रही है कि चालू वित्त वर्ष में आर्थिक विकास की दर 8.5 फीसदी से ज्यादा नहीं होगी। उस वक्त वित्त सचिव ने एक साक्षात्कार में कहा था कि उन्हें महंगाई की दर 2 से 4 फीसदी के बीच रहने की उम्मीद है। मध्यवर्ती आंकड़ों को ध्यान में रखें, तो सरकार के मुताबिक असल जीडीपी विकास की रफ्तार 5.5 फीसदी से ज्यादा नहीं होनी चाहिए थी। हालांकि, आधिकारिक बयानों के मुताबिक यह अब 7.5 फीसदी है।

यह केवल संयोग की बात नहीं है। गौरतलब है कि बीते साल फरवरी में पेश अपने अंतरिम बजट में प्रणव मुखर्जी ने उम्मीद जताई थी कि घाटा जीडीपी के 5.5 फीसदी के बराबर हो सकता है। हालांकि, जुलाई में पेश बजट यह आंकड़ा सीधे बढ़कर 6.8 फीसदी के स्तर पर चला गया।

साथ ही, उन्होंने वादा किया था कि 2010-11 में यह वापस घटकर 5.5 फीसदी के स्तर पर आ जाएगा। हालांकि, यहां यह कहा जा सकता है कि अर्थव्यवस्था में आज जो महंगाई का स्तर है, उसमें खराब पैदावार के साथ-साथ राहत पैकेज का भी कहीं न कहीं हाथ है। बीते महीने महंगाई की दर 8.6 फीसदी थी, जो वित्त सचिव के अनुमान से दोगुने से भी ज्यादा है।

अगर अर्थव्यवस्था के बारे में बड़े स्तर पर की गई अवधारणाएं गलत साबित हुईं, तो उन प्रमुख बातों का क्या जिनका उल्लेख वित्त मंत्री ने बीते साल बजट में किया था? उन्होंने 2010 में जीएसटी को लाने की बात कही थी। साथ ही, वह दिसंबर में प्रत्यक्ष कर संहिता को भी लेकर आए।

इसके अलावा, उन्होंने उर्वरक सब्सिडी के आधार में बदलाव, पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों सुधार और 3जी स्पेक्ट्रम की बिक्री (इससे 35 हजार करोड़ रुपये की कमाई होती) के बारे में भी कहा था। यहां हम विनिवेश का उल्लेख नहीं कर रहे हैं क्योंकि इनके बारे में कोई आंकड़े पेश नहीं किए गए थे।

जीएसटी पर वित्त मंत्री काफी उत्साहित थे और उन्होंने इसे अप्रैल, 2010 से लागू करने का वादा भी किया था। यह शुरुआत से ही काफी मुश्किल काम था और इसी वजह से इसे अब अगले साल तक के लिए टाल दिया गया है। प्रत्यक्ष कर संहिता के मसौदे को 45 दिनों के भीतर लेकर आने के बारे में मंत्री का वादा काफी सच्चा लग रहा था, इस बारे में वह एक विधेयक को बहस के बाद संसद के शीतकालीन सत्र में भी लेकर आए।

यह मसौदा अगस्त में आ गया था, लेकिन इस पर इतनी तीखी बहस हुई कि इसे अब भी संसद में पेश किए जाने का इंतजार है। उर्वरक सब्सिडी प्रणाली को बस बीते हफ्ते ही बदला गया है। इसका फायदा हमें अगले साल के सब्सिडी बिल में गिरावट के रूप में देखने को मिलेगा।

पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों के बारे में गठित किरीट पारेख समिति की रिपोर्ट आ चुकी है और इसे आंशिक रूप से भी स्वीकार्य करना नए वित्त वर्ष से पहले मुमकिन नहीं होगा। महंगाई पर मौजूदा बहस को देखते हुए इस बात को समझा जा सकता है। आखिर में 3जी स्पेक्ट्रम की नीलामी अब भी लंबित है।

इस बारे में वित्त मंत्री ने काफी कोशिश भी की, लेकिन वह कोशिश कोई नतीजा नहीं ला पाई। अगर यह अगले छह हफ्तों में नहीं होता है, तो सरकार को बजट में 35 हजार करोड़ रुपये का मोटा-ताजा नुकसान झेलना पड़ेगा। कम शब्दों में कहें तो अब तक न तो जीएसटी आ पाई, प्रत्यक्ष कर संहिता का भविष्य अधर में लटका है, पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत ज्यों की त्यों है और 3जी स्पेक्ट्रम की नीलामी अब तक नहीं हुई।

बड़े वादों में से सिर्फ उर्वरक से संबंधित वादा पूरा हुआ है और वह भी आखिरी वक्त में।  यह सरकार के बारे में कोई बहुत अच्छी छवि पेश नहीं करती है। सरकार यह भी नहीं कह सकती है कि उसके जुलाई के अनुमान सही थे। हकीकत में तो रक्षा मंत्रालय को बीते वित्त वर्ष में लड़ाकू हेलीकॉप्टर और 155 एमएम तोपों को खरीदने के लिए मिला पैसा भी लौटना पड़ा है।

इनकी खरीद वह इस साल भी नहीं कर पाई है, इसीलिए उसे दुबारा इस रकम को लौटाना पड़ेगा। इसीलिए असल मुद्दा राहत पैकेज की वापस नहीं है। असल सवाल यह है कि क्या वित्त मंत्री और संप्रग सरकार अपने दूसरे कार्यकाल के दूसरे बजट में बेहतर प्रदर्शन कर पाएंगे।

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