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परदेस से है सस्ते कर्ज की आस
अप्रैल से घरेलू कर्ज महंगा होने पर कंपनियां कर सकती हैं विदेश का रुख
रंजू सरकार / मुंबई February 22, 2010

बड़ी कंपनियां सस्ते कर्ज के लिए विदेशी बाजारों का रुख कर सकती हैं।

दरअसल वित्त प्रबंधकों का मानना है कि अप्रैल में नए आधार दर आने के बाद घरेलू बैंकों से लिए गए कर्ज महंगे हो सकते हैं। यही वजह है कि बड़ी कंपनियां अन्य देशों का रास्ता पकड़ सकती हैं।

विदेशों में पूर्ण हेज लोन रुपये के मुकाबले 200 आधार अंक सस्ता है। लेकिन समस्या यह है कि वहां ज्यादा मात्रा में लंबे समय तक कर्ज देने को बहुत कम बैंक ही तैयार हैं। पिछले हफ्ते भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों को कहा कि आधार दर तैयार करें, जो प्रधान उधारी दर (पीएलआर) का स्थान लेगा। यह बैंकों के लिए बेंचमार्क दर है।

बड़ी कंपनियां जो पीएलआर दरों से कम पर कर्ज जुटाने में सक्षम हैं, आधार दर के तहत न्यू फ्लोर प्राइस पसंद नहीं करेंगी। अगर ऐसा हुआ तो कंपनियों की कर्ज लागत बढ़ सकती है। हीरो होंडा के सीएफओ रवि सूद का कहना है कि बड़ी कंपनियां कर्ज लागत कम करने के लिए विदेशी बाजारों का रुख कर सकती हैं।

जीएमआर ग्रुप के सीएफओ सुब्बा राव का भी कहना है कि कई कंपनियों के लिए विदेशी कर्ज अपेक्षाकृत सस्ता पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि अगर कोई कंपनी मुद्रा की हेजिंग न करने का जोखिम उठाती है तो उसके लिए ईसीबी सस्ता पड़ सकता है।

अगर कंपनियां ब्याज और मुद्रा का जोखिम उठाने में सक्षम हो तो ईसीबी निसंदेह सस्ता पड़ सकता है और वे लाइबोर को अपना सकती हैं। विदेशी बाजारों से कर्ज लेने के लिए लाइबोर को बेंचमार्क माना जाता है। कंपनियां ब्याज दरों की अदला-बदली के जरिए फ्लोटिंग लोन को फिक्स्ड लोन में बदल सकती हैं। जो पांच साल के लिए कर्ज की लागत 2.8 फीसदी हो सकती है।

इसी तरह कंपनियां मुद्रा में उतार-चढ़ाव के जोखिम की भरपाई भी कर सकती हैं, लेकिन इसके लिए अतिरिक्त 2.5 से 3 फीसदी की लागत आ सकती है। ग्रीनबैक फॉरेक्स सर्विसेज के निदेशक सुब्रमण्यन शर्मा के मुताबिक ब्याज और मुद्रा के जोखिम की भरपाई करने के बाद पांच साल के ईसीबी की लागत 8.5 से 9 फीसदी हो सकती है, जबकि रुपये में कर्ज की दर 10 से 11 फीसदी हो सकता है। लेकिन इसमें कई तरह की समस्या भी है।

मौजूदा समय में कर्ज देने को बहुत से विदेशी बैंक तैयार नहीं हैं। जेएसडब्ल्यू स्टील के सीएफओ शेषगिरि राव का कहना है कि बड़ी मात्रा में कर्ज देने को विदेशी बैंक तैयार नहीं हैं। विदेशी बैंक अभी अपने बैंलेंस शीट को कम करने की कोशिश में हैं।

यही वजह है कि वे बाजार में ज्यादा कर्ज नहीं दे रहे हैं। लेकिन कंपनियां 250 से 500 करोड़ रुपये का कर्ज विदेशी बैंकों से जुटा सकती हैं। हालांकि घरेलू बाजार में भी कुछ संभावनाएं हैं। रिजर्व बैंक में कॉमर्शियल पेपर का जिक्र नहीं है। ऐसे में बैंक से कम दर पर कॉमर्शियल पेपर जारी कर सकते हैं।

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