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बड़ी कठिन है बजट की डगर
आगामी बजट पेश करते समय विकास दर को बरकरार रखने के साथ-साथ राजकोषीय घाटे को पाटना वित्त मंत्री के लिए बड़ी चुनौती होगी।
एसआई टीम /  February 21, 2010

पिछले साल वैश्विक मंदी के चलते भारतीय अर्थव्यवस्था में गिरावट का दौर देखा गया था, लेकिन इस बार विकास दर को बरकरार रखते हुए राजकोषीय घाटे पर काबू पाने के लिए वित्त मंत्री को कठिन चुनौतियों का सामना करना होगा।

वर्ष 2009 में विकास दर बढ़ाने का लक्ष्य था। लेकिन इस बार भारतीय अर्थव्यवस्था पहले से ही सुधार की ओर अग्रसर है और कई क्षेत्र बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। सीएसओ के अनुमान के मुताबिक वित्त वर्ष 2009-10 में उद्योग और सेवा क्षेत्र की विकास दर 8 फीसदी रहने की उम्मीद है। पिछले कुछ महीनों से वाहन, एफएमसीजी और सीमेंट जैसे कुछ क्षेत्रों का प्रदर्शन बेहतर रहा है।

राहत वापसी

अर्थव्यवस्था के पटरी पर आने के संकेत के साथ ही कई विशेषज्ञों का मानना है कि वित्त मंत्रालय राजकोषीय घाटे को पाटने पर ध्यान देगा जो चालू वित्त वर्ष में सकल घरेलू उत्पाद का 6.8 फीसदी रहने का अनुमान है। राजकोषीय घाटा पिछले एक दशक में सबसे ज्यादा है।

अनुमान है कि वित्त मंत्री अगले वित्त वर्ष में इसे कम कर 5 से 5.6 फीसदी लाने की कोशिश करेंगे। इस योजना के तहत बजट में प्रोत्साहन पैकेजों की वापसी का कदम उठाया जा सकता है। गौरतलब है कि पिछले साल मंदी के दौरान विकास दर को बरकरार रखने के लिए सरकार की ओर से विभिन्न क्षेत्रों को प्रोत्साहन पैकेज दिए गए थे।

हालांकि निर्यात क्षेत्र के अलावा छोटे और मझोले उद्योगों में अभी सुधार होना बाकी है। ऐसे में प्रोत्साहन की वापसी उन क्षेत्रों से हो सकती है, जो बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। इनमें वाहन, सीमेंट, कंज्यूमर डयूरेबल्स, एफएमसीजी जैसे क्षेत्र शामिल हैं। विश्लेषकों का मानना है कि बजट में प्रोत्साहन की आंशिक वापसी की जा सकती है।

विशेषज्ञों का सुझाव है कि उत्पाद शुल्क, जिसमें कटौती की गई थी, उसमें इजाफा किया जा सकता है। हालांकि उत्पाद शुल्क की बढ़ोतरी के दायरे में बेहतर प्रदर्शन करने वाले क्षेत्रों को ही शामिल किया जाना चाहिए। इसी तरह सेवा शुल्क में भी इजाफा संभव है।

विकास की बात

आय में बढ़ोतरी और घाटे को कम करने के साथ-साथ वित्त मंत्री के सामने अर्थव्यवस्था की 8 फीसदी विकास दर बनाए रखने की भी चुनौती होगी। ऐसे में उम्मीद है कि बजट में श्रम आधारित क्षेत्र-टेक्सटाइल, चमड़ा, आभूषण आदि क्षेत्रों को प्रोत्साहन बरकरार रखा जा सकता है।

इसके साथ ही बुनियादी और सार्वजनिक व्यय में इजाफा किया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण और सामाजिक योजनाओं पर भी खर्च बढाया जा सकता है। कुछ नीतिगत मामले हैं, जिनमें ईंधन की कीमतों को नियंत्रण मुक्त करने, श्रम सुधार और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (विमानन, रिटेल और बीमा क्षेत्र) में राहत देने की बात है।

हालांकि ये मामले राजनीतिक लिहाज से संवेदनशील हैं, ऐसे में बजट में शायद ही इस सिलसिले में कोई बड़ा कदम उठे। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि वित्त मंत्री को अर्थव्यवस्था की विकास दर कायम रखने के साथ-साथ घाटे को कम करने जैसे कदम बजट में उठाने होंगे। इसमें प्रोत्साहन पैकेजों की आंशिक वापसी भी संभव है, जिसका संकेत पहले ही दिया जा चुका है।

विशेषज्ञों का कहना है कि राजकोषीय घाटे को काबू करने के लिए पर्याप्त कदमों के अभाव में बाजार की धारणा पर प्र्रतिकूल असर पड़ सकता है। आइए जानते हैं कि बजट से विभिन्न क्षेत्रों की क्या उम्मीदें हैं और उस क्षेत्र की कंपनियों पर क्या पड़ सकता है असर।

वाहन

मंदी से जूझ रहे वाहन क्षेत्र को राहत देने के मकसद से सरकार की ओर से वर्ष 2008 के अंत में प्रोत्साहन पैकेज की घोषणा की गई। इसका असर इस क्षेत्र पर पड़ा और वर्ष 2009 के अंत में इस क्षेत्र की विकास दर सालाना आधार पर 16 फीसदी दर्ज की गई। ब्याज दरों में नरमी और उधारी की स्थिति में सुधार से भी इस क्षेत्र को फायदा हुआ है।

इस क्षेत्र की कई कंपनियों का प्रदर्शन बेहतर रहा है और उनका मुनाफा मार्जिन भी बढ़ा है। ऐसे में उत्पाद शुल्क में मिली छूट वापस ली जा सकती है। छोटी कारों और दोपहिया वाहनों के लिए उत्पाद शुल्क की दर को 14 फीसदी से कम कर 8 फीसदी किया गया था। अब इसे बढ़ाकर 10 फीसदी या ज्यादा किया जा सकता है।

हालांकि कच्चे माल की कीमतों में तेजी को देखते हुए वाहन निर्माता बढ़ी हुई दरों का बोझ ग्राहकों पर डाल सकते हैं। इससे निकट भविष्य में कंपनियों की बिक्री पर असर पड़ने की आशंका है। बड़ी कारों पर अभी 22 फीसदी उत्पाद शुल्क है जो बरकरार रह सकता है।

लेकिन लंबे समय से करों को तर्कसंगत बनाने की वाहन उद्योग की मांग पर विचार संभव है और इसे 23-25 फीसदी से कम कर 16-17 फीसदी तक लाया जा सकता है। व्यावसायिक वाहन सेगमेंट को पैकेज से काफी फायदा पहुंचा है, ऐसे में राहत वापसी से इस पर असर पड़ सकता है। लेकिन जेएनएनयूआरएम में पैसा बढ़ाकर इसे कुछ राहत दी जा सकती है।

बैंकिंग

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में विदेशी संस्थागत निवेशकों की होल्डिंग सीमा में इजाफा और बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को बढ़ा कर 49 फीसदी करने की योजना से वित्तीय क्षेत्र को फायदा मिल सकता है और इससे बैंकों को अपनी विस्तार योजनाओं के लिए पूंजी जुटाने में भी सुविधा होगी।

बैंकिंग क्षेत्र में एकीकरण की दिशा में किसी भी ठोस कदम से सार्वजनिक क्षेत्र के छोटे बैंकों का फायदा हो सकता है। बजट में छोटे बैंकों को 3 अरब डॉलर निवेश का प्रस्ताव आ सकता है, जो वर्ल्ड बैंक मिला है। कृषि ऋण में राहत की सीमा को 30 जून 2010 से बढ़ाने से सार्वजनिक बैंकों के एग्री एनपीए पर दबाव बढ़ सकता है।

बैंकों को लंबी अवधि के कर मुक्त बॉन्ड जुटाने की अनुमति देने से बैंकों को राहत मिल सकती है और बुनियादी परियोजनाओं के लिए फंड मुहैया कराने में मदद मिल सकती है।

पूंजीगत वस्तुएं और ऊर्जा क्षेत्र

ऊर्जा उपकरणों पर आयात शुल्क लगाने से इंजीनियरिंग क्षेत्र की कंपनियों को फायदा हो सकता है। दरअसल, ऊर्जा उपकरणों का आयात चीन और कोरिया से बड़ी संख्या में किया जाता है, क्योंकि वहां इनकी कीमतें 15 से 20 फीसदी कम है।

अगर ऐसा हुआ तो ऊर्जा उपकरण निर्माता कंपनियों बीएचईएल, एलऐंडटी आदि को फायदा मिल सकता है। इसके साथ ही एपीडीआरपी और आरजीजीवीवाई योजना पर खर्च बढ़ाने से टीऐंडडी उपकरण निर्माता और ईपीसी सेवा प्रदाता कंपनियों को फायदा मिलने की उम्मीद है।

अगर टीऐंडडी क्षेत्र के लिए सरकार नैशनल इलेक्ट्रिसिटी फंड (करीब 80,000 करोड़ रुपये का कोष) गठित करती है तो इस क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों को लाभ होगा। इस कोष से राज्यों को टीऐंडडी बुनियादी ढांचे को सुधार के लिए लोन मुहैया कराया जाएगा।

रक्षा क्षेत्र पर निवेश बढ़ाने से भारत इलेक्ट्रॉनिक्स और एलऐंडटी जैसी कंपनियों को फायदा हो सकता है। ऊर्जा यूटिलिटी क्षेत्र को धारा 80आईए (10 साल तक कर छूट) के तहत मेगा अल्ट्रा पावर प्रोजेक्ट लगाने वाली कंपनियों को फायदा हो सकता है।

दरअसल, इसकी अवधि एक साल बढ़ाने की योजना है। फिलहाल इसकी अवधि मार्च 2011 है। हालांकि आयात शुल्क बढ़ाने से आयातित उपकरण महंगे हो सकते हैं, जिससे परियोजनाओं की लागत में इजाफे का अंदेशा है।

कंस्ट्रक्शन एवं इन्फ्रास्ट्रक्चर

पिछले साल नई परियोजनाओं के आवंटन में देरी हुई थी, लेकिन इस बार भारत निर्माण योजना के तहत व्यय बढ़ाने से कंस्ट्रक्शन कंपनियों-आईवीआरसीएल और नागार्जुन कंस्ट्रक्शन आदि को फायदा हो सकता है।

इसके साथ ही जेएनएनआरयूएम के तहत आवंटन बढ़ाने से पटेल इंजीनियरिंग, प्रतिभा इंडस्ट्रीज, यूनिटी इन्फ्रा, अहलूवालिया कॉन्ट्रैक्ट्स और सिंप्लैक्स इन्फ्रास्ट्रक्चर को फायदा मिलने की उम्मीद है। कंपनियों को पुनर्वित्त और वित्त में भी स्पष्टता की उम्मीद है।

ऐसे में उन परियोजनाओं को फायदा मिल सकता है, जो फंडिंग की राह देख रही हैं। इसके साथ ही यह क्षेत्र प्रस्तावित नई कर संहिता के तहत मैट में राहत चाह रहा हैं।

एफएमसीजी

सरकार की ओर से ग्रामीण क्षेत्रों पर ध्यान देने से एफएमसीजी कंपनियों को अप्रत्यक्ष रूप से फायदा मिल सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में व्यय बढ़ाने का अर्थ है कि ग्रामीण इलाकों के लोगों के हाथों में पहले से ज्यादा पैसा आएगा, जिसका लाभ एफएमसीजी क्षेत्र की कंपनियों का मिल सकता है।

लेकिन उत्पाद शुल्क जिसे 12 से घटाकर 8 फीसदी किया गया था, उसमें 2 फीसदी इजाफा किया जा सकता है। इसका कंपनियों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। लेकिन डाबर, मैरिको जैसी कंपनियां इससे बच सकती हैं। आईटीसी की सिगरेट की बिक्री हाल के दिनों में 7 से 8 फीसदी बढ़ी है, जो उत्पाद शुल्क में इजाफा नहीं करने के कारण बढ़ी है।

लेकिन इस बार बजट में उत्पाद शुल्क बढ़ाया जा सकता है। उत्पाद शुल्क 5 फीसदी से ज्यादा बढ़ा तो सिगरेट की बिक्री पर असर पड़ सकता है। इसके साथ ही सेवा शुल्क और मैट में बढ़ोतरी का भी कंपनियों पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका है।

धातु

घरेलू स्टील कंपनियों की बिक्री में हाल के दिनों में खासी तेजी आई है। दरअसल, वाहन और बुनियादी क्षेत्रों में मांग काफी बढ़ी है। लेकिन स्टील की कीमतें 2008 के उच्च स्तर से अब भी कम है।

ऐसे में अगर प्रोत्साहन वापसी के तहत उत्पाद शुल्क में कटौती वापस ली जाती है तो स्टील की मांग कुछ मामलों में कम हो सकती है। लेकिन बुनियादी क्षेत्रों पर व्यय बढ़ाया जाता है तो स्टील कंपनियों को इससे फायदा हो सकता है। खासकर ऐसी कंपनियों को जो लंबे उत्पादों का निर्माण करती हैं।

तेल एवं गैस

कच्चे तेल के आयात पर शुल्क में इजाफा और उत्पाद शुल्क में बढ़ोतरी से राजकोषीय घाटे को पाटने में मदद मिल सकती है। धारा 89 आईबी के तहत तेल व गैस उत्खनन में कर अवकाश की अवधि में विस्तार से ओएनजीसी और रिलायंस इंडस्ट्रीज को फायदा मिल सकता है।

फार्मा

चालू वित्त वर्ष के पहले 9 महीनों में फार्मास्यूटिकल्स कारोबार करीब 18 फीसदी की दर से बढ़ा है। आरऐंडडी निवेश में बढ़ावे के लिए फार्मा क्षेत्र चाहता है कि शोध खर्च में 150 फीसदी छूट को बढाकर 200 फीसदी किया जाए।

इसके साथ ही उद्योग का मानना है कि इस छूट की अवधि 2012 से आगे बढ़ाया जाए। हालांकि ज्यादातर कंपनियां उत्पाद शुल्क मुक्त क्षेत्र में निर्माण करती हैं, लेकिन इस क्षेत्र से बाहर की इकाइयों पर असर पड़ने की आशंका है।

दूरसंचार

मौजूदा समय में इस क्षेत्र की कंपनियों के मुनाफे पर असर देखा जा रहा है। इस क्षेत्र की कंपनियों की मांग है कि धारा 80 आईए के तहत 5 से 10 साल के लिए 100 फीसदी कर में छूट दी जाए। इसके साथ ही यह क्षेत्र एकसमान कर की मांग भी कर रहा है। कर में किसी भी तरह की बढ़ोतरी का बोझ ये कंपनियां ग्राहकों पर डाल सकती हैं।

अन्य

वर्ष 2009 की पहली छमाही में आतिथ्य उद्योग को मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। ऐसे में यह क्षेत्र बुनियादी क्षेत्रों की तरह ही करों में 10 साल के लिए 100 फीसदी छूट की मांग कर रही हैं।

विमानन क्षेत्र भी एटीएफ पर शुल्क में कटौती की मांग कर रहा है। रिटेल क्षेत्र बहु-ब्रांड रिटेल में प्र्रत्यक्ष विदेशी निवेश की मांग कर रहा है। मीडिया क्षेत्र सेटटॉप बॉक्स पर आयात शुल्क में 5 फीसदी छूट की मांग कर रहा है।

रियल्टी क्षेत्र आयकर छूट की सीमा 1.5 लाख रुपये से बढ़ाकर 3 लाख रुपये करने की मांग कर रहा है। इसके साथ ही टाउनशिप परियोजनाओं के लिए बुनियादी क्षेत्र का दर्जा देने की मांग कर रहा है।

बजट में संभवत: शामिल न हों

तेल सब्सिडी का मसला बजट से अलग रह सकता है
जीएसटी और प्रत्यक्ष कर मसौदे पर बजट के बाद निर्णय
रिटेल, विमानन, बीमा में एफ डीआई निवेश में राहत
कृषि सुधार के लिए लंबी अवधि की कार्ययोजना
पेंशन और श्रम सुधार का मसला

प्रतिकूल असर की आशंका, अगर...

ऊंची आय पर सरचार्ज एक साल तक जारी रहा
प्रतिभूति लेन-देन पर कर में इजाफा हुआ
दीर्घावधि पूंजी प्राप्ति कर को फिर से लगाना या लघु अवधि पूंजीगत प्राप्ति कर में इजाफा
प्रोत्साहन पैकेज की पूरी वापसी
घाटा पाटने के लिए लंबी कार्ययोजना का अभाव

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