बिजनेस स?टैंडर?ड - बाघों के संरक्षण के लिए आखिर कौन सा रास्ता!
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Tuesday, December 06, 2022 05:00 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

बाघों के संरक्षण के लिए आखिर कौन सा रास्ता!
जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  February 19, 2010

चीन इस बार अपना नया साल 'ईयर ऑफ द टाइगर' यानी बाघ वर्ष के तौर पर मना रहा है।

भारतीय कंपनियां भी वहां के घटनाक्रम से प्रेरणा लेते हुए अपने सामाजिक दायित्व (सीएसआर) के तहत बाघों के संरक्षण की दिशा में कदम बढ़ाने की सोच रही है। हालांकि इस संबंध में जागरूकता फैलाना बहुत अच्छी बात है, मगर यह बात गौर करने लायक है कि इस तरह बाघों को बचाने के बारे में जो सार्वजनिक चर्चाएं हो रही हैं, क्या वे बाघों के दीर्घकालिक हित में हैं?

अगर आप बाघ संरक्षण के रास्ते में आने वाली समस्याओं की तुलना पोस्को से लेकर आर्सेलर मित्तल तक की बड़ी परियोजनाओं में आने वाली अड़चनों से करें तो शायद यह गलत नहीं होगा। यह कहना गलत नहीं होगा कि कुछ मायनों में ये कमोबेश एक सी हैं। दिन पर दिन कम होते बाघों के मुद्दे पर वैश्विक आपात संदेश से तो यही पता चलता है कि भारत जैसे देश में बाघों के संरक्षण का यह तरीका व्यावहारिक नहीं है।

अगर संरक्षणकर्ताओं से अलग हटकर दूसरे लोगों की राय जानने की कोशिश करें तो पता चलता है कि चीन ने बाघ सरंक्षण का जो फार्मूला अपनाया है वह धीरे धीरे लोगों को पसंद आने लगा है। चीन में बाघों के संरक्षण के लिए फार्मों का इस्तेमाल किया जाता है।

उनका तर्क कुछ इस तरह का है : बाघ के शरीर के विभिन्न अंगों का इस्तेमाल दवाओं, कामोत्तेजना बढ़ाने और बुरी शक्तियों को दूर भगाने के लिए किया जाता है। और इन्हीं वजहों से इनका शिकार किया जाता है। तो इन मांगों की पूर्ति के लिए फार्म में पाले गए बाघों का इस्तेमाल क्यों न किया जाए। कुछ वैसे ही जैसे मिंक के फर या मगरमच्छ की खाल आदि के लिए किया जाता है।

उनका कहना है कि ऐसा कर के कम से कम बाघों का शिकार तो रोका जा सकेगा। इस तर्क को कागजों पर खारिज करना शायद मुमकिन नहीं होगा और सच्चाई भी यही है कि जंगलों की तुलना में संरक्षण में अधिक बाघ पाले जा रहे हैं। मगर यहां एक और कटु सच्चाई है और वह यह है कि फार्म के बढ़ते प्रचलन के बावजूद एशिया में बाघ तेजी से विलुप्त होते जा रहे हैं। इनमें कोई कमी नहीं आई है। इसकी कुछ वजहें हैं।

पहली वजह तो यह है कि फार्म में बाघों के पालन से उनके उत्पादों की खपत को बढ़ावा मिला है। उनकी मांग बढ़ी है और इस वजह से ही जंगली बाघों के 'असली' उत्पादों के प्रति भी लोगों की दिलचस्पी बढ़ी है। इन उत्पादों को ज्यादा कारगर और असरदार माना जाता है और इस वजह से इनकी मांग भी इसी हिसाब से बढ़ी है।

बढ़ती मांग का ही नतीजा है कि इन उत्पादों की कीमतें लगातार बढ़ती जा रही हैं। उदाहरण के लिए 6 साल पहले बाघ की हड्डियां प्रति किलो 3,000 से 5,000 डॉलर हुआ करती थी। बाघ की हड्डियों का इस्तेमाल कामोत्तेजना बढ़ाने वाले उत्पाद, जोड़ों या हड्डियों की बीमारियों को दूर करने की दवाएं आदि बनाने में किया जाता है।

वहीं बाघ के नाखून बुरी शक्तियों को दूर भगाने के लिए लोकप्रिय हैं (खासतौर पर भारतीय साधु इसे काफी पसंद करते हैं)। इनकी कीमत भी हड्डियों के बराबर ही है। तब से लेकर अब तक इनकी कीमतें 10 से 15 फीसदी बढ़ी हैं। एशियाई लोगों की बढ़ती संपन्नता इस बढ़ती कीमत की एक वजह है।

मगर आप फार्म कल्चर के पैरोकार हैं या उसे सही मानते हैं तब तो इस बढ़ते प्रचलन के कारण कीमतें घटनी चाहिए थीं या कम से कम स्थिर तो रहनी ही चाहिए थीं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती कीमतों ने तो एक तरीके से शिकार को बढ़ावा ही दिया है। पहली बात तो यह है कि इस पर कोई विशेष खर्च नहीं करना पड़ता है। एक बाघ का शिकार तीन से चार लोग मिलकर करते हैं।

इस पूरी प्रक्रिया पर 200 डॉलर से भी कम का खर्च आता है। फार्मिंग पर इसके दोगुने से अधिक का खर्च बैठता है। इस पूरी प्रक्रिया में हर बिचौलिया 15 से 20 फीसदी का कमीशन लेता है। जब यह उत्पाद ग्राहकों तक पहुंचता है तो यह कमीशन इतना अधिक होता है कि जंगली बाघों को बचाने के लिए प्रोत्साहन इसके सामने काफी बौना नजर आने लगता है।

हालांकि शिकारी प्रजनन के मौसम में बाघों का शिकार करने से परहेज करते हैं क्योंकि उन्हें भी पता है कि उनकी आजीविका का यही मूल स्त्रोत है। पर इस समय में अभयारण्यों में चोरी छिपे शिकार की गतिविधियां बढ़ जाती हैं।

भारत में संरक्षण का बंदोबस्त भी कारगर नहीं है। एक तो इसके लिए स्थानीय समुदायों का विस्थापन करना पड़ता है और उन्हें जीवन यापन के लिए दूसरे विकल्प भी मुहैया कराने पड़ते हैं। वहीं शिकार को रोकने के प्रयास में जिन वन्य गार्डों को तैनात किया जाता है उन्हें नाम मात्र भुगतान किया जाता है (प्रति माह 3,000 रुपये के न्यूनतम भुगतान से कुछ ही अधिक)।

साथ ही उन्हें न पर्याप्त शस्त्र मुहैया कराए जाते हैं और न प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाता है। वन भारतीय संविधान की समवर्ती सूची में शामिल है और इस कारण से प्रोजेक्ट टाइगर मुहिम को व्यावहारिक रूप से सफलता दिलाना और भी कठिन है। केंद्र जिन जंगलों के लिए फंड मुहैया कराता है उनका प्रदर्शन इस बात की पुष्टि कर देता है।

उन जंगलों बेहतर प्रदर्शन है जो पर्यटन के जरिए अच्छा खासा राजस्व कमाते हैं और स्थानीय ग्रामीणों को रोजगार दिलाते हैं। बेचारे बाघों को केंद्र और राज्यों के बीच के वनों का अंतर नहीं पता होता और इस वजह से वे अक्सर अभयारण्यों से भटकते हुए रिजर्व जंगलों में पहुंच जाते हैं जहां उनके शिकार का सबसे अधिक खतरा होता है।

यहां मुख्य बात यह है कि वन्यजीव संरक्षण के लिए कोई 'शॉर्ट कट' नहीं हो सकता है। अगर भारत का कारोबारी जगत बाघों के सरंक्षण में कोई योगदान देना ही चाहता है तो उसे इस तरीके के अभियान चलाने चाहिए जिनमें बाघों से मिलने वाले उत्पादों के इस्तेमाल को सामाजिक मान्यता नहीं देने की पैरवी की जाए।

पश्चिम के देशों ने फर के इस्तेमाल को रोकने के लिए ऐसे ही अभियान चलाए थे। वहां तो फार्म से प्राप्त किए गए फरों से बने कपड़े पहनने वाले लोगों को भी हेय दृष्टि से देखा जाता है।

Keyword: china, year of the tiger, save tigers, indian companies,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 जेबी फार्मा की पहल के बाद हृदयरोग की दवा होगी और सस्ती
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.