बिजनेस स्टैंडर्ड - कच्चे हीरों की कमी से संकट
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कच्चे हीरों की कमी से संकट
दिलीप कुमार झा / मुंबई February 18, 2010

अगस्त 2008 के बाद वैश्विक मंदी से अभी हीरा उद्योग उबरने की कोशिश कर ही रहा है, भारतीय हीरा उद्योग के सामने एक और संकट आ गया है। 

हीरा प्रसंस्करण उद्योग को 25-30 प्रतिशत कच्चे हीरों की कमी का सामना करना पड़ रहा है, जिससे भविष्य की योजनाएं प्रभावित हो रही हैं। भारत के तमाम आभूषण निर्माता नए डिजाइन और तराशी आजमाना चाहते हैं।

इसकी वजह है कि हांगकांग में मार्च 5-9 के बीच एशिया की हीरों की बड़ी प्रदर्शनी होने जा रही है। लेकिन कच्चे हीरों की उपलब्धता सीमित होने की वजह से उन्हें संभावनाएं कम नजर आ रही हैं। ज्यादातर भागीदारों का मानना है कि उनकी बिक्री बुरी तरह प्रभावित होगी, क्योंकि कच्चे हीरे की कमी है।

इसके पहले यह शो कम बिक्री वाले मौसम (मार्च-मई) में होने की वजह से बहुत फायदेमंद साबित होता था। लेकिन कच्चे हीरे की कमी होने और कीमतों में 3-5 प्रतिशत की बढ़ोतरी से उम्मीदें धूमिल हुई हैं। इससे भारत की बड़ी कंपनियों की योजनाओं पर बुरा प्रभाव पड़ा है।

कच्चे हीरे की कमी की पुष्टि करते हुए जेम्स ऐंड ज्वैलरी एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (जीजेईपीसी) के पूर्व चेयरमैन संजय कोठारी ने कहा, 'भारत ने 2009 में करीब 30 प्रतिशत कम हीरों का आयात किया है, जो जनवरी 2010 में भी जारी रहा। लेकिन यह अभी शुरुआत है। वैश्विक अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे सुधर रही है और हीरों के आभूषण की मांग भी आने वाले महीनों में पूर्ववत होने लगेगी।'

भारत, दुनिया का सबसे बड़ा हीरा प्रसंस्करण क्षेत्र है। 2009 में भारत में 7.5 बिलियन डॉलर के कच्चे हीरों का आयात हुआ, जबकि इसके पहले के साल में 12-13 बिलियन डॉलर के हीरों का आयात हुआ था। इसकी वजह यह है कि माइनिंग कंपनियों ने अपने उत्पाद में बहुत ज्यादा कटौती कर दी थी।

डी-बीयर्स की रिपोर्ट के मुताबिक उसका 2009 में कुल हीरा उत्पादन 246 लाख कैरेट रहा, जो 2008 के उत्पादन की तुलना में 49 प्रतिशत कम है। इसी तरह से रियो टिंटो ने अपने वार्षिक उत्पादन में 33 प्रतिशत की कटौती कर दी और 2009 में उसका उत्पादन 140.26 लाख कैरेट रहा। इन दो कंपनियों का वैश्विक कच्चे हीरे के 95 प्रतिशत से ज्यादा हिस्से पर नियंत्रण है।

इस उद्योग के लिए अगले 2-3 महीने बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। यह निर्यात बाजार के हिसाब से बहुत कमजोर महीने होते हैं। पश्चिमी देशों के खरीदार सामान्यतया क्रिसमस, नए साल और वेलेंटाइन डे के बाद अपनी योजनाएं टाल देते हैं। इसके बार ताजा खरीदारी साल के अंत में शुरू होती है। लेकिन मध्य पूर्व और एशिया सहित अन्य इलाकों के खरीदार, विभिन्न मौकों पर खरीदारी जारी रखते हैं।

बहरहाल,डी बीयर्स और रियो-टिंटो सहित खनन कंपनियां अपना उत्पादन बढाने के मूड में नहीं हैं, खासकर तब तक- जब इसकी कीमतें फायदेमंद न हो जाएं। लंदन से डी-बीयर्स की एक प्रवक्ता ने कहा कि वैश्विक उपभोक्ता लग्जरी गुड्स की मांग करते हैं, जो अभी पूरी तरह से गति नहीं पकड़ सकी है और यह आर्थिक संकट शुरू होने के पहले की तुलना में कम है। इसे देखते हुए 2010 में हम संभलकर कदम उठाना चाहते हैं।

इसी वजह के चलते 2010 की पहली तिमाही के अंत में दक्षिण अफ्रीका की नमकलैंड माइंस में उत्पादन को स्थगित कर दिया गया है। उम्मीद की जा रही है कि यहां सामान्य उत्पादन चालू होने में 3 साल लगेंगे, जब खदानों की संचालन लागत के मुताबिक दाम मिलने लगेंगे और हीरों की बिक्री से आमदनी होने लगेगी।

10 महीने की सुस्ती के बाद हीरों के आभूषण का कारोबार जुलाई 2009 से गति पकड़ने लगा है। लेकिन अभी भी अगस्त 2008 के स्तर को हासिल नहीं किया जा सका है। डॉयमंड इंडिया लिमिटेड के चेयरमैन प्रवीण शंकर पंडया ने कहा कि जून 2009 तक हीरा उद्योग करीब 50 प्रतिशत सिमट गया, जो संकट के दौर के पहले के स्तर की तुलना में केवल 85 प्रतिशत तक पहुंच पाया है।

कैसे हो तराशी?

मांग की तुलना में भारत में कच्चे हीरों की 25-30 प्रतिशत की कमी
हांगकांग में 5-9 मार्च 2010 को आयोजित प्रदर्शनी के लिए नए डिजाइन तैयार करना चाहते हैं कारोबारी
हीरों का खनन करने वाली कंपनियों ने घटा दिया है उत्पादन

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