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आगामी बजट से मिलेंगे कई महत्त्वपूर्ण संकेत
निवेशकों को आश्वस्त करने का समय आ गया है। वित्त मंत्री की ओर से एक मजबूत और विश्वसनीय नीतिगत दस्तावेज पेश किया जाना समय की जरूरत है। इससे निवेशकों का उत्साह बढ़ेगा और पूंजी निवेश की गति तेज होने की उम्मीद बंधेगी। बता रहे हैं
आकाश प्रकाश /  February 12, 2010

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार इस वर्ष 26 फरवरी को आम बजट पेश करने जा रही है।

बजट के रूप में सरकार एक ऐसा महत्त्वपूर्ण आर्थिक दस्तावेज प्रस्तुत करेगी जिससे संभावित प्रभावों के बारे में महत्त्वपूर्ण संकेत मिलेंगे। सबसे पहले विदेशी निवेशक आने वाले बजट को इस रूप में परखेंगे कि संरचनात्मक सुधारों की दिशा में आगे बढ़ने के प्रति नई संप्रग सरकार कितनी गंभीर है।

वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के लिए मुश्किल यह है कि इस बार उनके पास कोई बहाना नहीं है। वर्ष 2009 के लिए बजट पेश करते समय उन्होंने बजट तैयार करने के लिए सीमित वक्त होने की बात कही थी। तब उन्होंने कहा था कि राजकोषीय घाटा नियंत्रित करने के वास्ते एक विश्वसनीय योजना तैयार करने के लिए 13वें वित्त आयोग की रिपोर्ट की जरूरी है, जो फिलहाल नहीं आई है (बाद में यह रिपोर्ट आ गई)।

नीति निर्माता पूरे साल सुधारों की बात करते रहे, और तमाम चीजों को एक बजट दस्तावेज के तहत लाने में कामयाब नहीं हो पाए। पिछले 9 महीनों के दौरान फिर ऐसी ही स्थिति बनती नजर आ रही है। निवेशक नीतिगत सुधारों में तेजी चाहते हैं। उनकी इच्छा है कि कुछ कड़े फैसले किए जाएं और इस बात के प्रति जागरूकता बढ़ाई जाए कि हम बड़े गंभीर राजकोषीय संकट का सामना कर रहे हैं।

ऐसे में यह कोई नहीं चाहता कि और समितियां गठित की जाएं और राजकोषीय घाटे से निपटने के तरीकों के बारे में केवल जुबानी जमाखर्च हो। निवेशक चाहते हैं कि कम-से-कम राजकोषीय घाटा कम करने के लिए राजस्व और खर्च, दोनों मोर्चों पर संरचनात्मक सुधारों के लिए विश्वसनीय योजना की घोषणा की जाए। क्या पारेख समिति की रिपोर्ट की तरह उर्वरकों के लिए पोषक-तत्त्व आधारित सब्सिडी की रूपरेखा तैयार की जा सकती है?

राजस्व के मोर्चे पर क्या हम वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का विश्वसनीय ढांचा और समय सीमा तैयार कर पाएंगे, प्रत्यक्ष कर संहिता के मामले में हमारी स्थिति क्या है? जीडीपी के आंकड़े नए सिरे से तैयार करने और विकास की ऊंची दरों की उम्मीद जतानेसे राजकोषीय घाटा कम नहीं होगा।

मेरे विचार से निवेशक बहुत कम असरकारक राजकोषीय घाटा कम करने की योजना और ऊंची विकास दरों की बेकार बातों के बारे में सकारात्मक नजरिया नहीं रखते। यह बड़ा जोखिम वाला कदम प्रतीत होता है। किसी भी वजह से विकास दरों में कोई भी गिरावट वित्तीय और आर्थिक नतीजों पर गंभीर असर डाल सकती है।

मौजूदा वक्त में ये ढांचागत मसले इसलिए महत्त्वपूर्ण हैं कि हमें विकास की गति को क्षति पहुंचाए बगैर राजकोषीय घाटे को कम करने की जरूरत है। वस्तु एवं सेवा कर जैसे ढांचागत सुधार बहुत मायने रखते हैं क्योंकि इनसे राजस्व लीकेज रुकता है और विकास की गति तेज होती है।

साथ ही साथ कॉरपोरेट मुनाफा और वित्तीय दक्षता भी बढ़ती है। इसी तरह प्रत्यक्ष कर संहिता की मदद से विभिन्न रियायतें हटाने, कर दरें प्रभावी तरीके से बढ़ाने और उत्पादकता एवं दक्षता दुरुस्त करने के मौके मिलते हैं। ओईसीडी देशों में राजकोषीय घाटा कम करने की कवायद से भारी आर्थिक मूल्य चुकाने का भय रहता है।

ऐसा करने से पहले से ही लचर अर्थव्यवस्था की मुश्किलें बढ़ने का खतरा रहता है। लेकिन इस मायने में भारत की स्थिति बिल्कुल अलग है। यहां की अर्थव्यवस्था कर ढांचे को सरल एवं कारगर बनाने में सक्षम है, जिससे राजस्व में भारी इजाफा होगा और विकास की गति तेज होगी।

ओईसीडी देशों की तरह राजकोषीय घाटा कम करने के उपाय अपनाने से यहां आर्थिक नतीजों पर नकारात्मक असर आवश्यक रूप से नहीं होगा। हमारे देश में कर ढांचा काफी उलझा हुआ है। इसलिए यदि इसमें सुधार किया जाता है, तो इससे अर्थव्यवस्था को बुनियादी तरीके से मजबूत करने का मौका मिलेगा।

निवेशक भारत में राजकोषीय घाटा कम करने में बहुत मददगार साबित होते हैं, इसकी एक वजह वैश्विक उपभोक्ता हैं। जब पूरी दुनिया में राजकोषीय घाटा दो अंकों में हो, तब भारत में यह एक अंक तक कैसे सीमित रह सकता है? यह इस बात का एहसास कराता है कि वैश्विक वित्तीय संकट से उबरने के लिए हमारा 2 अंकों वाला राजकोषीय घाटा बहुत कम है। हमें खुद की ढांचागत समस्याएं हल करने के लिए सारे तरीके अपनाने होंगे।

निवेशकों को भारत में पेट्रोलियम उत्पाद बाजार की जटिलता भी चिंतित करती है। वर्ष 2008-09 में एक बार पहले भी हम इसी तरह की मुश्किल स्थिति का सामना कर चुके हैं, जब कच्चे तेल की कीमत 125 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर जा पहुंची थी, उस दौरान हमारी तत्कालीन माली हालत पर सवालिया निशान लग गया था।

इस बार भी तकरीबन वैसी ही स्थिति है, जिससे निपटने के लिए हम एक बार फिर बाहरी पूंजी पर निर्भर हैं। यह स्थिति तब है, जब हम आंतरिक संसाधनों से अपने घाटे को पाटने की क्षमता रखते हैं। बाहरी पूंजी जरूरी है, लेकिन आर्थिक विकास को गति देने के लिए, न कि राजकोषीय घाटे से निपटने के लिए।

मैं पहले ही आगाह कर चुका हूं कि अब सब्र टूट रहा है, निवेशक ठोस कार्रवाई देखना चाहते हैं। पिछले कुछ महीनों की घटनाओं की वजह से उनकी घबराहट बढ़ गई है। 3जी की नीलामी में एक बार फिर देरी हो रही है। जीएसटी लागू किए जाने में भी देरी हो रही है। इन मोर्चों पर समय सीमा की कोई स्पष्ट रूपरेखा नजर नहीं आ रही है।

ऊपर से सरकार नया खाद्य अधिकार विधेयक लाने के लिए प्रतिबद्ध है, इस कदम से खर्च पर अतिरिक्त दबाव बढ़ेगा। उधर एनटीपीसी के अनुवर्ती सार्वजनिक निर्गम (एफपीओ) को भी उत्साहजनक समर्थन नहीं मिला। इसके अलावा सरकार द्वारा आक्रामक विनिवेश कार्यक्रम भी जोरदार तरीके से शुरू नहीं किया गया। मौजूदा स्थिति से पार पाने के लिए कोई कानूनी बदलाव लाए जाने के आसार भी नहीं हैं।

स्पष्ट है कि वित्त मंत्री की ओर से एक मजबूत और विश्वसनीय नीतिगत दस्तावेज पेश किया जाना समय की जरूरत है। अगर ऐसा होता है तो इससे निवेशकों का उत्साह बढ़ेगा और पूंजी निवेश की गति तेज होने की उम्मीद बंधेगी।

यह तर्क दिया जा सकता है कि भारत को निवेशकों की खासकर विदेशी निवेशकों की चिंता नहीं करनी चाहिए। लेकिन यह कटु सत्य है कि राजकोषीय घाटा कम करने के लिए सरकार को विनिवेश के अलावा और कोई दूसरा उपाय नजर नहीं आ रहा है, और विदेशी निवेशकों के बगैर गंभीर विनिवेश नहीं हो पाएगा।

Keyword: UPA government, budget, economic document, foreign investment, policy makers,
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