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जनहित के लिए ही दाखिल की जाएं जनहित याचिकाएं
अदालती आईना
एम जे एंटनी /  February 11, 2010

न्याय पाने के लिए जनहित याचिकाओं और सूचना के अधिकार के तहत कानूनी प्रक्रिया में आई तेजी की तुलना संचार में मोबाइल टेलीफोन और इंटरनेट के विस्तार से की जा सकती है।

बस डर इस बात को लेकर सता रहा है कि ये महज वक्त की बरबादी करने का साधन भर न बन जाएं। पिछले कुछ वर्षो में उच्चतम न्यायालय में भारत का नाम बदलकर हिंदुस्तान करने, अरब सागर का नाम परिवर्तित कर सिंधु सागर रखने और यहां तक कि राष्ट्रगान को बदलने तक के लिए जनहित याचिकाएं दाखिल की जा चुकी हैं।

इनमें से सबसे अंतिम वाली याचिका पर तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश ने कुछ अर्से तक सुनवाई भी की थी।  कई बार निजी फायदों के लिए भी जनहित याचिकाओं का रास्ता अख्तियार किया गया है। मसलन किसी औद्योगिक परियोजना में अड़ंगा डालना, किसी प्रतिद्वंद्वी कारोबारी से बदला लेना और यहां तक कि सार्वजनिक सेवाओं में पदोन्नति पाने के लिए जनहित याचिकाओं का सहारा लिया गया है।

देश की सर्वोच्च अदालत दशक भर से कई मामलों में इस तरह के चलन की कड़ी आलोचना कर चुकी है। अदालत इन्हें 'हस्तक्षेप करने वालों' की संज्ञा दे चुकी है और कई बार इन याचिकाओं को खारिज करने का डर भी दिखाया जा चुका है।

हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने जनहित याचिका से जुड़े एक मामले में दिशानिर्देश तय किए। उत्तराखंड राज्य बनाम बलवंत सिंह मामले में याचमान ने 62 साल से ज्यादा के उम्र के व्यक्ति को राज्य का महाधिवक्ता बनाने का विरोध किया था।

सन 1962 से अब तक उच्चतम न्यायालय कई मामलों में यह व्यवस्था दे चुका है कि राज्यों में महाधिवक्ता नियुक्त करने में उम्र कोई बंधन नहीं है। बावजूद इसके उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने इस याचिका की सुनवाई की और राज्य सरकार को नोटिस भी जारी कर दिया।

सरकार ने सर्वोच्च अदालत में दस्तक दी। यहां पर उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल कराने वाले अधिवक्ता को मुंह की खानी पड़ी। जैसा कि पहले से अंदाजा था उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में सरकार का साथ दिया। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि आखिर उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय में जनहित याचिकाओं की शक्ल में कौन सा खेल खेला जा रहा है या फिर इनकी क्या प्रासंगिकता है।

कड़े शब्दों में उच्चतम न्यायालय ने इस तथाकथित जनहित याचिका को 'जनहित याचिका के नाम पर अदालत का वक्त बरबाद करने वाला' करार दिया। अपने फैसले में न्यायालय ने कहा कि इस चलन को रोकने के लिए एक कड़े फैसले के आलोक में अदालतों को जनहित याचिकाओं से जुड़े सभी पहलुओं की समीक्षा करनी होगी।

अदालत ने कहा, 'आशा है कि भविष्य में अदालतें इस तरह की किसी भी याचिका पर सुनवाई नहीं करेंगी।' उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों ने ही 1980 के दशक में जनहित याचिकाओं का आंदोलन शुरू किया था। वकीलों ने एक हद तक ही इसका समर्थन किया। एस पी गुप्ता, पीयूसीएल और एम सी मेहता मामलों में आए फैसलों ने जनहित याचिकाओं का कद काफी बढ़ा दिया।

अदालत ने जब न्यायिक क्षेत्र के दायरे की समीक्षा की, तब पाया कि गरीबी, अनदेखी, भेदभाव और निरक्षरता की वजह से समाज के एक बड़े तबके की न्याय तक पहुंच ही नहीं है। तब अदालत ने कहा था, 'गरीब, वंचित,कमजोर और भेदभाव के शिकार लोगों को न्याय दिलाने के लिए यह अदालत जनहित याचिका की शुरुआत करती है और इसे और मजबूत बनाने के लिए प्रोत्साहित करती है।'

अदालत ने कहा था, ' यह याचिका अदालत द्वारा अपनी संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी को पूरा करने की अदालत की इच्छा का परिणाम है।' अगर अभी तक जनहित याचिकाओं की विकास यात्रा की बात करें तो इसके तीन चरण रहे हैं। पहला चरण निर्दोष लोगों को जबरदस्ती जेल में डालने और अवैध हिरासत के खिलाफ मोर्चेबंदी के नाम रहा।

दूसरे चरण में जीवन की गुणवत्ता और पर्यावरणीय अपकर्षण पर खासा जोर रहा। वहीं तीसरे चरण में सार्वजनिक जीवन में शुचिता और प्रशासन में पारदर्शिता पर ध्यान दिया गया। हालांकि इस दौरान जनहित याचिकाओं का गलत इस्तेमाल भी शुरू होता गया। इस तरह देखें तो उत्तराखंड मामले में फैसला इस आंदोलन की धार कुंद करने वाला है। इसने भविष्य के लिए आठ नियम तय कर दिए।

पहला तो यह कि अदालतें वास्तविक जनहित याचिकाओं को पूरी गंभीरता दें और उतनी ही गंभीरता से गलत मकसद से दायर की गई याचिकाओं को नकारें। दूसरी बात यह है कि एक अकेले न्यायाधीश की कार्रवाई के कायदों के बजाय पूरे उच्च न्यायालय को जनहित याचिकाओं से जुड़े मामलों में अपने खुद के नियम तय करने चाहिए।

उच्चतम न्यायालय इन नियमों को उच्च न्यायालयों से मंगा भी सकता है। जनहित याचिका पर सुनवाई से पहले याचिका दाखिल करने वाले व्यक्ति की भी अच्छी तरह से जांच परख करनी चाहिए। अदालत को पहले ही याचिका की विषयवस्तु और उससे जुड़े जनहित की समीक्षा करनी चाहिए।

अदालतें यह भी करें कि अमुक जनहित याचिका का सरोकार किसी दूसरी जनहित याचिका से ज्यादा है, ऐसे में अधिक सरोकार वाली याचिका को वरीयता मिलनी चाहिए। अदालत को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी जनहित याचिका से जनता में असंतोष के स्वर न उभरें। इसके साथ ही अदालतों को यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि कोई जनहित याचिका किसी के व्यक्तिगत फायदे से तो नहीं जुड़ी है।

और आखिर में, अदालतों को बेवजह की याचिकाओं को सुनना ही नहीं चाहिए। इसके लिए उन पर आर्थिक दंड लगाने का प्रस्ताव भी किया जा सकता है। उच्चतम न्यायालय केवल नए नियम बनाकर ही चुप बैठता नहीं दिख रहा है। इनके नियमन की कड़ी निगरानी की जाएगी।

सर्वोच्च अदालत किसी भी उच्च न्यायालय से जवाब तलब कर सकती है कि उन्होंने इन नियमों के आलोक में क्या कदम उठाए हैं। लग रहा है कि जनहित याचिका आंदोलन अपने चौथे और सबसे निर्णायक दौर में पहुंच गया है।

Keyword: PIL, RTI, mobile telephone, internet, high court, supreme court,
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