बिजनेस स?टैंडर?ड - असफल रहे हैं दुनिया भर के वित्तीय नियामक
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Monday, November 28, 2022 07:29 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

असफल रहे हैं दुनिया भर के वित्तीय नियामक
नीति-निर्माताओं को स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए नियमन की जरूरतों और नवप्रयोग को बढ़ावा देने के बीच सही संतुलन स्थापित करना होगा। बता रहे हैं
सी रंगराजन /  February 09, 2010

यह एक आम धारणा है कि विस्तृत और गहन विकास को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय प्रवाह (फाइनैंशियल इंटरमीडिएशन) आवश्यक है।

बचतकर्ताओं के धन का उपयोगकर्ताओं तक कुशलता के साथ हस्तांतरण होने से संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित हो पाता है। इस तरह संसाधन निर्माण और आबंटन में वित्तीय प्रणाली की जितनी कार्यकुशलता होती है, उतना ही आर्थिक विकास की गति को बढ़ावा मिलता है।

उन्नत आबंटन कार्यकुशलता से प्रतिफल की ऊंची वास्तविक दर के चक्र का निर्माण होता है और बचत में बढ़ोतरी होती है। इसके फलस्वरूप अधिक मात्रा में संसाधन तैयार होते हैं। ऐसे में स्थायी रूप से उच्च आर्थिक विकास के लक्ष्य को हासिल करने के लिए वित्तीय प्रणाली का विकास आवश्यक हो जाता है। यह आसानी से समझ में आने वाली बात है।

हालांकि, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संकट को देखते हुए कुछ सवाल उठ खड़े होते हैं कि क्या वित्तीय बाजार और उत्पादों का निरंकुश विकास अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा है। यह दलील दी जाती है कि सभी वित्तीय इनोवेशन जनकल्याण में वृद्धि के लिए नहीं होते हैं। ऐसे में मौजूदा अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संकट ने बैंकिंग विकास और वित्तीय क्षेत्र के नियमन को लेकर कई गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं।

यह बात एकदम साफ है कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संकट एक नियामक असफलता है। यह असफलता दो तरह से है। पहली, वित्तीय प्रणाली के कुछ हिस्सों का नियमन या तो काफी ढीला था या वहां किसी तरह का कोई नियमन था ही नहीं। यह एक वजह है जिसके चलते फंडों का प्रवाह गैर-नियमित खंडों की ओर तेजी से होने लगा।

ऐसे ही ढीले नियमन का एक उदाहरण निवेश बैंक हैं, हेज फंड और रेटिंग एजेंसियां हैं। दूसरी बात यह है कि विभिन्न डेरिवेटिव उत्पादों के निहितार्थ को लेकर समझ सही नहीं थी। एक तरह से डेरिवेटिव उत्पाद वित्तीय विकास का स्वाभाविक परिणाम हैं। हालांकि, अगर डेरिवेटिव उत्पाद काफी जटिल हो जाते हैं, तो वे चिंता की सबसे बड़ी वजह बन जाते हैं।

मौजूदा घटनाक्रम में रेटिंग एजेंसियों ने संदिग्ध डेरिवेटिव उत्पादों के बाजार में तेजी लाने के लिए गैर-जिम्मेदाराना रवैया अपनाया। ऐसे में यह साफ है कि वित्तीय इनोवेशन और उन पर निगरानी रखने की नियामकों की योग्यता के लिए तालमेल स्थापित नहीं हो पा रहा था।

यह विडंबना ही है कि ऐसी नियामक असफलता एक ऐसे समय में देखने को मिली जबकि बेसिल के बारे में गहन चर्चा जारी थी और दूसरी तरफ मजबूत नियामक ढांचे को लागू किया जा रहा था। इस पर पर आम सहमति है कि नियामक ढांचे को फिर से किस तरह पुनर्गठित किया जाए। नियामक संरचना में सुधार के लिए कुछ मुख्य तत्व इस तरह हैं-

(1) नियामक ढांचे में वित्तीय बाजार के सभी खंडों को शामिल करना चाहिए। नियमन सख्ती के साथ सभी रूप से सभी खंडों पर लागू होना चाहिए।

(2) व्यवस्थागत रूप से महत्वपूर्ण वित्तीय संस्थानों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। अतिरिक्त नियामक प्रावधानों के साथ ही ऐसे संस्थानों के लिए सख्त और व्यापक विवेकपूर्ण नियमों का पालन अनिवार्य होना चाहिए। ऐसे बड़े संस्थान जिनका परिचालन कई देशों में है उनके संदर्भ में विभिन्न न्यायाधिकरण के नियमनों की समन्वित निगरानी होनी चाहिए।

सच पूछिए तो एक प्रस्ताव यह भी है कि वित्तीय संस्थानों और खासतौर से बैंकों को एक निश्चित आकार से अधिक बढ़ने की मनाही हो ताकि उनके संकटग्रस्त होने की आशंका को रोका जा सके। हालांकि इस समय यह साफ नहीं है कि यह प्रस्ताव कितना व्यावहारिक होगा।

(3) संस्थानों के लिए अच्छे समय में बफर स्टॉक का निर्माण करना जरूरी होना चाहिए ताकि बुरे वक्त में उसका इस्तेमाल किया जा सके। इसके लिए बिजनेस चक्र के अनुसार पूंजी पर्याप्तता और प्रावधान संबंधी आवश्यकताओं को लागू किया जा सकता है। साथ ही कारोबारी चक्र के अनुसार इसे बढ़ाने या घटाने की अनुमति दी जा सकती है।

(4) जोखिम आधारित पूंजी अनुपात को बढ़ाकर बैंकों के लिए अधिक साधन (लीवरेज) जुटाये जा सकते हैं।

ज्यादातर देश इस बात पर सहमत हैं कि इस आधार पर नियामक संरचना में सुधार बेहद जरूरी है। हालांकि, वित्तीय लेनदेन पर कर लगाने जैसे उपायों पर सहमति नहीं है। इस बात पर भी सहमति नहीं है कि क्या वित्तीय क्षेत्र में सिर्फ एक नियामक होना चाहिए या कई नियामक होने चाहिए। हाल के अनुभवों से कोई सटीक जवाब नहीं मिलता है।

नए वित्तीय उत्पाद तैयार करने के दौरान बुनियादी मकसद उपभोक्ताओं की संतुष्टि में बढ़ोतरी होना चाहिए। ऐसे में एक सवाल लगातार पूछा जा रहा है कि क्या वित्तीय क्षेत्र में पहले के मुकाबले आज अधिक उथल-पुथल है। जिन तत्वों ने वित्तीय क्षेत्र के विकास में योगदान दिया है, हो सकता है कि उन्होंने इसकी कमजोरी बढ़ाने में भी योगदान दिया है।

बाजार तथा बाजार भागीदारों के बीच परस्पर निर्भरता बढ़ने के कारण विपरीत प्रभावों के तेजी से फैलने की आशंका भी बढ़ी है। ऐसे में रोग के तेजी से फैलने की आशंका बलवती हुई है। कुछ लोगों का सवाल है कि क्या नए वित्तीय उत्पादों से समाज के लिए उपयोगी उद्देश्य की पूर्ति हो रही है।

यह दलील दी जाती है कि बीते दिनों वित्तीय प्रणाली में हुए ज्यादातर इनोवेशन का उद्देश्य अल्पावधि में मुनाफा हासिल करना है, न कि जोखिम प्रबंधन और पूंजी के आबंटन जैसे उसके अनिवार्य काम में बेहतर प्रदर्शन करने के लिए वित्तीय बाजारों की योग्यता को बढ़ाना। इसके साथ ही यह भी उल्लेखनीय है कि इनमें से कुछ इनोवेशन ने वित्तीय अस्थिरता को बढ़ाने का काम किया है।

हालांकि पिछले कुछ दशक में पेश किया सभी या ज्यादातर वित्तीय इनोवेशन को समाजिक हित की दृष्टि से अनुचित बताना ठीक नहीं होगा। कई वित्तीय उत्पाद इस जरूरत को पूरा करते हैं। हम एक अनिश्चितता के युग में जी रहे हैं। विनिमय दर और ब्याज दरों के उतार-चढ़ावों से उपभोक्ताओं को खुद को बचाने की जरूरत है। ऐसे में उपर्युक्त हेजिंग प्रणाली की आवश्यकता है।

एक कार्यकुशल और सुव्यवस्थित वित्तीय प्रणाली का यह काम है कि वह ऐसे साधन मुहैया कराए। यह दलील सही नहीं होगी कि हाल के दिनों में औद्योगिक रूप से आधुनिक देशों में देखे गए आर्थिक विकास को वित्तीय बाजार के विकास से कोई फायदा नहीं मिला है। लेकिन किसी भी क्षेत्र में ज्यादतियों के अपने खतरे हैं।

इस बात को लेकर कोई दलील नहीं है कि नियामक व्यवस्था को पुनर्गठित करने की जरूरत है ताकि बैंकिंग प्रणाली को सटीक बनाया जा सके। बैंकों द्वारा अत्यधिक जोखिम लेने की प्रवृत्ति को हतोत्साहित करने की जरूरत है। इसके लिए उपर्युक्त नियामक उपाय या नियंत्रण को लागू करना होगा।

जाहिर तौर पर बड़ा सवाल यह है कि क्या वित्तीय क्षेत्र की विकास दर वास्तविक क्षेत्र के मुकाबले अधिक है। लेकिन वित्तीय इनोवेशन की राह में अवरोध खड़े करने की नीति सही नहीं होगी। भारत जैसे विकासशील देश में वित्तीय प्रणाली को तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था की विविध जरूरतों को पूरा करने में सक्षम होना ही चाहिए।

ऐसे में हमें वित्तीय इनोवेशन को प्रोत्साहित करना चाहिए। हमें मौजूदा अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संकट से सही सबक सीखना होगा। थोड़े नियमन से वित्तीय अस्थिरता बढ़ेगी, लेकिन बहुत अधिक नियमन से वित्तीय इनोवेशन में बाधा आएगी, जिसकी काफी जरूरत है।

नीति-निर्माताओं को वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए सख्त नियमन की जरूरत और नवप्रयोगों को बढ़ावा देने के बीच सही संतुलन स्थापित करना होगा।
(लेखक प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष हैं।)

Keyword: policy makers, financial system, financial market, international financial crisis, investment banking,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या मौद्रिक नीति पर अपना रुख बदल सकता है आरबीआई
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.