बिजनेस स्टैंडर्ड - प्रबंधन में संस्थागत निवेशकों की भूमिका
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प्रबंधन में संस्थागत निवेशकों की भूमिका
अकाउंटेंसी
आशीष के. भट्टाचार्य /  February 08, 2010

ब्रिटेन की फाइनैंशियल रिपोर्टिंग काउंसिल (एफआरसी) ने संस्थागत निवेशकों के लिए एक प्रबंधन संहिता (स्टीवर्डशिप कोड) विकसित करने के लिए परामर्श की पहल की थी।

इससे संबद्ध संदर्भ बिंदु इंस्टीटयूशनल शेयरहोल्डर्स कमेटी (आईएससी) द्वारा जारी 'कोड ऑन द रेस्पोंसिबिलिटीज ऑफ इंस्टीटयूशनल इन्वेस्टर्स' है। आईएससी दस्तावेज में सुझाव दिया गया है कि निवेश से संबद्ध कंपनियों के प्रबंधन में संस्थागत निवेशकों को नियमित रूप से दखल देना चाहिए।

इस संबंध में नीति का खुलासा किए और मताधिकार (जैसे, क्या उन्होंने एक विशेष प्रस्ताव में प्रबंधन के पक्ष में मत दिया है या इसके खिलाफ मत दिया है) के इस्तेमाल को लेकर सही जानकारी का खुलासा किए जाने की आवश्यकता है और उन्होंने हितों के टकराव की स्थिति का किस तरह प्रबंधन किया।

कैडबरी कमेटी ने अपनी रिपोर्ट (दिसंबर 1992) में कॉरपोरेट शासन के सुधार में संस्थागत निवेशकों की भूमिका को उजागर किया है। रिपोर्ट में कहा गया, 'संस्थागत निवेशकों को रणनीति, प्रदर्शन, बोर्ड सदस्यता और प्रबंधन की गुणवत्ता पर विचारों और सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए वरिष्ठ स्तर के अधिकारियों के साथ नियमित रूप से संबंध बनाए रखना चाहिए।'

प्रबंधन भूमिका

संस्थागत निवेशकों से उनके लिए जिम्मेदार लाभार्थियों की संपदा के प्रबंधन की उम्मीद की जाती है। वे सावधानीपूर्वक इस जिम्मेदारी को पूरा करते हैं और प्रतिभूतियों के पोर्टफोलियो के प्रबंधन में अहम भूमिका निभाते हैं। वे कभी-कभार निवेश कंपनियों के प्रबंधन में सक्रिय रूप से हस्तक्षेप करते हैं।

निजी एजेंसियां अप्रत्यक्ष रूप से फंड प्रबंधकों का मूल्यांकन उनके फंड प्रदर्शन और ऐसे मूल्यांकन पर आधारित रैंकिंग के आकलन के जरिये करती हैं। इस तरह फंड प्रबंधकों का उनकी प्रबंधन भूमिका में अप्रत्यक्ष रूप से मूल्यांकन किया जाता है। बाजार-आधारित यह मूल्यांकन फंड प्रबंधकों को उनके फंडों की रैंकिंग में सुधार लाने के लिए प्रेरित करता है।

प्रबंधन के साथ संबंध

इस तरह के संबंध की व्यवस्था सभी संस्थागत निवेशकों के लिए उपयुक्त रणनीति साबित नहीं हो सकती है। पेंश फंड और बीमा कंपनियां दीर्घावधि नजरिया अपना सकती हैं और इस तरह से नियमित हस्तक्षेप के जरिये निवेश कंपनियों के प्रदर्शन में सुधार लाकर लाभार्थियों के लिए धन पैदा किया जा सकता है।

कुछ पेंशन फंड (जैसे, कैलिफोनिर्या पब्लिक इम्पलॉईज रिटायरमेंट सिस्टम, जिसे कैलपर्स के नाम से जाना जाता है) खराब प्रदर्शन करने वाली कंपनियों के शेयर सस्ते में खरीदते हैं और फिर लाभार्थियों के लिए धन पैदा करने के लिए उनके प्रदर्शन में सुधार के लिए सक्रियता से दिलचस्पी लेते हैं।

ऐसी रणनीति के मामले में म्युचुअल फंड इस तरह के निवेश का सहारा नहीं ले सकते, क्योंकि वे बीमा कंपनियों या पेंशन फंडों की तरह दीर्घावधि पोजीशन नहीं ले सकते। उन्हें रोजाना के आधार पर एनएवी का प्रबंधन करना होगा।

सामान्य तौर पर, प्रभावी संबंध या वचनबद्धता दो वजहों से कठिन है: निवेश कंपनियां नियमित हस्तक्षेप पसंद नहीं करती हैं और इसलिए वरिष्ठ प्रबंधन के साथ संबंध को प्रोत्साहित नहीं किया जाता है, तथा बड़ी तादाद में निवेश कंपनियों के साथ प्रभावी संबंध कायम करना किसी संस्थागत निवेशक के लिए व्यावहारिक रूप से असंभव है।

मताधिकार

दरअसल, संस्थागत निवेशकों के लिए आम बैठकों में भाग लेना और मताधिकार पर ध्यान देना काफी मुश्किल काम है। प्रतिपत्र द्वारा मतदान की मौजूदा व्यवस्था बेहद अप्रभावी प्रणाली है।

किसी प्रतिपत्र को चर्चा में शामिल नहीं किया जा सकता और यह सिर्फ सर्वेक्षण में मतदान से ही संबद्ध है। इसलिए ज्यादातर परिस्थितियों में, प्रॉक्सी यानी प्रतिपत्र वोटिंग के अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सकता। इसलिए संस्थागत निवेशकों को मताधिकार को लेकर सक्षम बनाने की कोशिश के तहत कानून में बदलाव किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

सूचीबद्ध कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ने से संस्थागत निवेशक सामूहिक रूप से सूचीबद्ध कंपनियों की उद्यमिता सुधारने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए हमें इस पर बहस करने की जरूरत है कि क्या भारत को संस्थागत निवेशकों के लिए एक प्रबंधन संहिता बनानी चाहिए? प्रबंधन संहिता का क्रियान्वयन निश्चित रूप से संस्थागत निवेशकों की प्रशासनिक लागत में इजाफा करेगा।

Keyword: financial reporting council of britain, institutional investors, stewardship code, cadbury comitee,
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