बिजनेस स्टैंडर्ड - मुनाफे की फसल काटने की तैयारी
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मुनाफे की फसल काटने की तैयारी
कृषि जिंसों की मांग और आपूर्ति में असंतुलन को देखते हुए कहा जा सकता है कि इस क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों का भविष्य उज्ज्वल है और इनमें निवेश करने पर बेहतर रिटर्न मिलने की उम्मीद है।
जितेंद्र कुमार गुप्ता /  February 08, 2010

ऐसा कहा जाता है कि चीन और भारत के उपभोक्ता अगर किन्हीं खास जिंसों (कमोडिटी) का उपभोग एक साथ शुरू कर देते हैं तो उन जिंस की मांग और आपूर्ति के बीच असंतुलन की स्थिति बन जाती है।

ऐसा कहना जायज भी प्रतीत होता है, क्योंकि इन दोनों देशों की आबादी दुनिया की कुल जनसंख्या का करीब 40 फीसदी है। हालांकि इन देशों में प्रति व्यक्ति खपत अन्य विकसित देशों के औसत से अपेक्षाकृत कम है।

वैसे, जानकारों का कहना है कि निकट भविष्य में अभी स्थितियां उतनी कठिन होने की आशंका नहीं है। निवेश सलाहकारों का मानना है कि भारत और चीन की अर्थव्यवस्था तेजी से विकास कर रही है। इसके बावजूद वैश्विक खाद्य और कृषि जिंसों की खपत पर निकट या मध्यम अवधि में इन देशों का बहुत ज्यादा असर पड़ने की आशंका नहीं है।

लेकिन उनका मानना है कि लंबी अवधि में अगर स्थिति ऐसी ही बनी रही तो इसका असर देखा जा सकता है, क्योंकि खाद्य पदार्थों की आपूर्ति सीमित है और मांग में तेजी से इजाफा हो रहा है।

मांग और आपूर्ति का दबाव

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अध्ययन के मुताबिक वर्ष 2050 तक दुनिया की कुल आबादी करीब 9.1 अरब के आंकड़े तक पहुंच सकती है।

अभी विश्व की कुल जनसंख्या करीब 6.8 अरब है। इसके चलते खाद्य पदार्थों की मांग करीब दोगुनी हो जाएगी, खासकर विकासशील देशों में प्रति व्यक्ति आय बढ़ने से खपत भी बढ़ने की उम्मीद है। इनमें चीन और भारत मुख्य रूप से शामिल हैं।

इसके साथ ही कई देशों में ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने के लिए वैकल्पिक उपाय अपनाए जा रहे हैं। इसके तहत जैव-ईंधनके  लिए कृषि जिंसों का बड़े पैमाने पर उत्पादन और उपयोग किया जा रहा है। चीनी और मक्का इसका सटीक उदाहरण है। एक ओर इनके उत्पादन में गिरावट आ रही है, वहीं दूसरी ओर बायो-फ्यूल में इनका इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है।

यही नहीं, संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के मुताबिक जलवायु परिवर्तन, कृषि योग्य भूमि में कमी, जलसंकट आदि के चलते 2050 तक करीब 35 फीसदी खाद्यान्न का उत्पादन कम होने की आशंका है, जो चिंता की बात है। एक तरफ खाद्य पदार्थों की मांग तेजी से बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर कृषि योग्य भूमि का आकार सिमट रहा है।

भूमि की मात्रा सीमित है, जबकि खाद्यान्न की मांग बढ़ने से दोगुना उत्पादन करना और भी कठिन होगा। अनुमान के मुताबिक कृषि योग्य भूमि का आकार सालाना 1 करोड़ हेक्टेयर की दर से कम हो रहा है। इसकी वजह है कृषि योग्य भूमि का रिहायशी और औद्योगिक गतिविधियों में बढता इस्तेमाल।

जिंस के वैश्विक निवेशक जिम रोजर्स का कहना है कि आपूर्ति पक्ष को लेकर एक चिंता यह भी है कि खाद्यान्न का भंडार दशक के न्यूनतम स्तर पर है। उत्पादन में अगर बड़ी कमी आती है तो आपूर्ति की स्थिति और बिगड़ सकती है। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में लोग पहले से कहीं ज्यादा खपत कर रहे हैं और कुछ खाद्यान्नों का इस्तेमाल ईंधन के रूप में भी हो रहा है।

भारत में इसे लेकर कुछ अन्य समस्याएं भी हैं। प्रॉपर्टी की कीमतों में तेजी आने की वजह से किसान अपनी कृषि योग्य भूमि बेच रहे हैं, जिसका इस्तेमाल रिहायशी और औद्योगिक परियोजनाओं के लिए किया जा रहा है।

अर्थव्यवस्था के विकास और आबादी बढ़ने के साथ ही जलसंसाधनों की किल्लत भी शिद्दत से महसूस की जा रही है। इन स्थितियों को देखने से स्पष्ट है कि किसानों के लिए कृषि उत्पादन बढ़ाना बहुत कठिक कार्य है। दरअसल, भारत में खेती मुख्य रूप से वर्षा जल पर निर्भर है। वैश्विक स्तर की बात करें तो हर 20 साल में पानी की खपत दोगुनी बढ़ जाती है, क्योंकि आबादी में भी दोगुने का इजाफा हो जाता है।

खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुमान के मुताबिक वर्ष 2030 तक प्रति व्यक्ति कृषि योग्य भूमि सिमट कर 0.6 एकड़ रह जाएगी, जो 1960 में 1.1 एकड़ थी। इन सब तथ्यों को ध्यान में रखने के बाद इतना अवश्य कहा जा सकता है कि आने वाले समय में खाद्यान्न की कीमतों में और तेजी आ सकती है।

किसे होगा इससे फायदा

इन सभी पहलुओं का सकारात्मक असर कृषि से संबंधित कंपनियों पर पड़ने की उम्मीद है। पिछले दिनों महंगाई बढ़ने से इसका कुछ असर देखा गया है। रोजर्स का कहना है कि आने वाले समय में खाद्य पदार्थों की कीमतों में और तेजी आ सकती है।

उन्होंने बताया कि खाद्य पदार्थों की कीमतों में जल्द बहुत तेजी नहीं आती है, इसके बावजूद लंबे समय में लोगों के लिए खाद्यान्न प्राप्त करना बेहद कठिन हो सकता है और इसके लिए कहीं ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है। उनके मुताबिक खाद्य पदार्थों की कीमतें जितना लोग सोचते हैं, उससे  कहीं ज्यादा बढ़ जाती हैं। कई चीजों की कीमतें अब भी काफी ज्यादा हैं।

हाल के दिनों में यह बात सामने आई कि खाद्य पदार्थों की कीमतों में तेजी की मुख्य वजह आपूर्ति पक्ष को लेकर है। इस समस्या को दूर करने के लिए कृषि उत्पादन बढ़ाना और अधिक उपज वाली फसल को बढ़ावा देने जैसे कदम उठाने चाहिए।

अर्थशास्त्री और उद्योगपति भी इस बात से सहमत हैं कि इस समस्या का हल आनन-फानन में नहीं निकल सकता, बल्कि इसके लिए योजनाबद्ध तरीके से नीति बनानी होगी और सतत निवेश करना होगा। फूड वैल्यू चेन चलाने वाली कंपनियों को इससे काफी फायदा मिल सकता है और वे कृषि उत्पादन की ज्यादा कीमतों का लाभ उठा सकती हैं।

इस तरह की कंपनियां सीधे तौर पर कृषि कारोबार, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग और कृषि उपकरणों आदि से जुड़ रही हैं। कई कंपनियां फूड वैल्यू चेन के विभिन्न सेगमेंट में काम कर रही हैं। इनमें मोनसैंटो इंडिया (बीज), टाटा केमिकल्स (उवर्रक) प्रमुख हैं। इस सेगमेंट में काम करने वाली पांच कंपनियों को हमने चुना है, जिनका प्रदर्शन बेहतर रहा है और उनका परिचालन मार्जिन भी अच्छा है।

यही नहीं बेहतर बाजार हिस्सेदारी के साथ इन कंपनियों के विकास की संभावनाएं भी बेहतर नजर आ रही हैं। बदलते परिदृश्य में वैश्विक कृषि उद्योग में इन कंपनियों का महत्त्वपूर्ण योगदान है और इनमें विकास की पर्याप्त संभावनाएं नजर आ रही हैं। खास बात यह कि इन कंपनियों के शेयरों का भाव भी बहुत ज्यादा नहीं है और इनमें निवेश पर आने वाले वर्षों में बेहतर रिटर्न मिलने की उम्मीद की जा सकती है।

जैन इरिगेशन

जैन इरिगेशन की मौजूदगी सूक्ष्म सिंचाई (एमआईएस) की व्यवस्था में है, जो जल संसाधनों के बेहतर उपयोग के साथ-साथ कृषि उपकरणों और उवर्रक जैसे क्षेत्र से जुड़ी है। इसका इस्तेमाल फसलों की पैदावार बढ़ाने में किया जाता है। यानी कृषि क्षेत्र से जुड़ी इस कंपनी का भविष्य बेहतर नजर आ रहा है।

अनुमान के मुताबिक भारत में कुल कृषि योग्य भूमि का केवल 3 फीसदी ही सूक्ष्म सिंचाई के जरिए सिंचित है। लेकिन सूक्ष्म सिंचाई के फायदे को देखते हुए अब इसके इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जा रहा है, साथ ही सरकार भी उपकरणों आदि पर सब्सिडी देकर किसानों को यह प्रणाली अपनाने के लिए प्रेरित कर रही है।

अनुमान के मुताबिक अगले 7 साल में अतिरिक्त 1.5 करोड़ हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि की सिंचाई सूक्ष्म तौर-तरीकों  के जरिए होगी। अभी 36.8 लाख हेक्टेयर क्षेत्रों में भी इस पद्धित के जरिए सिंचाई की जा रही है। अनुमान के मुताबिक अगले सात साल में इस क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों को 45,000 करोड़ रुपये के कारोबार की उम्मीद है।

जैन इरिगेशन इस क्षेत्र की दिग्गज कंपनी है और कंपनी की कुल आय में सूक्ष्म सिंचाई की हिस्सेदारी करीब 42 फीसदी है। कंपनी के अन्य कारोबार के मुकाबले सूक्ष्म सिंचाई बिजनेस का परिचालन मुनाफा ज्यादा है। इस सेगमेंट का परिचालन मुनाफा करीब 20 फीसदी है।

अगले दो साल में इस कारोबार से कंपनी की आय सालाना 30 से 35 फीसदी की दर से बढ़ने की उम्मीद है। ऐसा इसलिए कि राज्य सरकारें भी सिंचाई की इस पद्धित को बढ़ावा दे रही हैं। इसके साथ ही कंपनी नए क्षेत्रों में भी प्रवेश की संभावना तलाश रही है। वह कृषि के लिए विभिन्न क्षेत्रों के हिसाब से उपकरण भी विकसित करने में लगी है।

कंपनी पाइप निर्माण और खाद्य प्रसंस्करण कारोबार से भी जुड़ी है। इस सेगमेंट की कंपनी की कुल आय में करीब 55 फीसदी हिस्सेदारी है। यह सेगमेंट भी सालाना 12 से 15 फीसदी की दर से विकास कर सकता है।

विश्लेषकों का मानना है कि जैन इरिगेशन की आय अगले दो साल में 25 फीसदी की दर से बढ़ सकती है। कंपनी का मौजूदा भाव पर पीई अधिक है लेकिन बेहतर रिटर्न की उम्मीद को देखते हुए इसमें निवेश अच्छा सौदा साबित हो सकता है।

करुतुरी ग्लोबल

करुतुरी ग्लोबल गुलाब की कलमों (कट रोज) की सबसे बड़ी वैश्विक कंपनी है। इसकी सालना उत्पादन क्षमता 55.5 करोड़ कलमों की है और कुल वैश्विक बाजार हिस्सेदारी करीब 8 फीसदी है।

कंपनी अपने उत्पादों का निर्यात अमेरिका, यूरोप, जापान, रूस और ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों को करती है। साथ ही कंपनी कीनिया, इथियोपिया और भारत में भी अपना परिचालन करती है। इन देशों में कंपनी करीब 239 हेक्टेयर में इसकी खेती करती है।

कंपनी इथियोपिया में विस्तार की तैयारी में है, इसके लिए उसने 366 हेक्टेयर जमीन भी हासिल की है। नई जमीन पर अगले दो साल में खेती शुरू हो जाने की उम्मीद है। कंपनी जहां विस्तार कर रही है, वहीं इसका मुख्य कारोबार अगले दो साल तक करीब 30 फीसदी सालाना की दर से विकास करने में सक्षम है।

इसके साथ ही कंपनी ने हाल में कृषि आधारित वेंचर बनाया है, जिससे भी उसे आय होने की उम्मीद है। कंपनी ने इथियोपिया में लीज पर 311,700 हेक्टेयर जमीन हासिल की है। विश्लेषकों का कहना है इस जमीन का आकार मुंबई शहर से करीब 7 गुना ज्यादा है। यहां कंपनी चरणबद्ध तरीके से कृषि जिंसों का उत्पादन करेगी।

पहले चरण के तहत  60,000 हेक्टेयर जमीन पर 2010-11 में उत्पादन शुरू करने का लक्ष्य है। कंपनी ने यहां दालें, चीनी, पाम आदि का उत्पादन करने की योजना बनाई है, जिन्हें बाजार में बेचा जाएगा।

खाद्य पदार्थों की बढ़ती मांग को देखते हुए कंपनी का यह कदम अच्छा है। इस कारोबार से कंपनी को 2012-13 में आय होने की उम्मीद है। कंपनी फलों के कारोबार में भी निवेश करने की योजना बना रही है।

केआरबीएल

खाद्य सुरक्षा और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की बढ़ती मांग को देखते हुए खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों को फायदा होने की उम्मीद है। भारत में अभी इस उद्योग का आकार छोटा है, लेकिन अगले कुछ साल में यह 10 फीसदी सालाना की दर से विकास कर सकता है।

विश्लेषकों का कहना है कि प्रति व्यक्ति बढ़ती आय, सकल घरेलू उत्पाद में इजाफा और तेजी से होते शहरीकरण को देखते हुए प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की मांग भारत में बढ़ने की उम्मीद है। भारत प्रमुख कृषि उत्पादक देश है। ऐसे में निर्यात की संभावना से भी फायदा उठाने की कोशिश की जाएगी। इन सब चीजों से खाद्य प्रसंस्करण उद्योग की स्थिति बदल सकती है।

इस क्षेत्र में कई कंपनियां हैं, जिनमें केआरबीएल बासमती चावल के उत्पादन से जुड़ी है। कंपनी की क्षमता सालाना 17 लाख टन चावल प्रोसेस करने की है। केआरबीएल बासमती चावल का निर्यात करने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी है। कंपनी अपने लोकप्रिय ब्रांड इंडिया गेट नाम से चावल की बिक्री करती है, जिसकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में बड़ी हिस्सेदारी है।

बेहतर नेटवर्क और ब्रांड की बदौलत कंपनी का परिचालन मुनाफा इस क्षेत्र की अन्य कंपनियों के मुकाबले कहीं बेहतर है। कीमत के आधार पर बासमती चावल का निर्यात सालाना 20 फीसदी की दर से बढ़ रहा है। आने वाले समय में इसके निर्यात और कीमतों में और बढ़ोतरी की उम्मीद है।

कंपनी का घरेलू कारोबार भी अगले कुछ वर्षों तक सालाना 15 से 20 फीसदी की दर से बढ़ सकता है, क्योंकि मांग में खासी तेजी देखी जा रही है। विश्लेषकों का कहना है कि केआरबीएल की समेकित आय अगले दो साल तक 25 फीसदी की दर से बढ़ सकती है।

रुचि सोया

भारत वैश्विक स्तर पर वनस्पति तेलों का चौथा सबसे बड़ा बाजार है। यहां सालाना 1.2 करोड़ टन वनस्पति तेलों की खपत है। देश में कुल मांग का करीब 35 फीसदी आयात किया जाता है। ऐसे में इस क्षेत्र से जुड़ी घरेलू कंपनियों का भविष्य उज्ज्वल है।

रुचि सोया ऐसी ही एक कंपनी है। पाम ऑयल बाजार में इसकी हिस्सेदारी करीब 17 फीसदी और सोया ऑयल में  25 फीसदी है। कंपनी ज्यादा मार्जिन के लिए ब्रांडेड उत्पादों पर खास ध्यान दे रही है। कंपनी कम लागत पर कच्चे माल की आूपर्ति के लिए विदेशी बाजारों पर भी ध्यान दे रही है।

कंपनी ने इथियोपिया में सोयाबीन की खेती के लिए वहां की सरकार के साथ एक समझौता भी किया है। पाम ऑयल के लिए कंपनी इंडोनेशिया और मलेशिया में प्लांटेशन की संभावनाएं तलाश रही है। कंपनी सरसों तेल का उत्पादन भी बढ़ाने की योजना बना रही है। विश्लेषकों का मानना है कि दो साल तक कंपनी की आय 30 फीसदी सालाना की दर से विकास कर सकती है।

युनाइटेड फॉस्फोरस

युनाइटेड फॉस्फोरस बीज से लेकर कीटनाशकों तक के कारोबार से जुडी है। कंपनी की मौजूदगी घरेलू बाजार के साथ-साथ विदेश में भी है। जेनरिक एग्रो केमिकल्स के क्षेत्र में यह पांचवीं बड़ी कंपनी है।

कंपनी ने अपने विस्तार के तहत हाल के दिनों में विभिन्न क्षेत्रों में कुछ कंपनियों का अधिग्रहण भी किया है। इसकी मौजूदगी करीब 120 देशों में है और कंपनी की कुल आय में विदेशी परिचालन का योगदान करीब 80 फीसदी है। बेहतर नेटवर्क और मजबूत पोर्टफोलियो को देखते हुए कंपनी की आय में बढ़ोतरी की उम्मीद है।

Keyword: agri commodities, economy, FAO, climate change, water crisis,
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