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चैट-फेसबुक में जिंदगानी, ये है ऑफिसों की नई कहानी
इंसानी पहलू
श्यामल मजूमदार / नई दिल्ली January 28, 2010

सार्वजनिक क्षेत्र की एक नवरत्न कंपनी के प्रमुख अपनी मुंबई शाखा के कार्यालय में 10 साल पुराने लकड़ी के एक शोकेस को बदलकर कुछ ऐसा सामान लाना चाहते थे जो अपेक्षाकृत कम जगह घेरता हो।

वह उस शोकेस को कार्यालय से बाहर हटाना चाहते थे मगर उनके सचिव ने उनसे कहा कि ऐसा करने से पहले उन्हें दिल्ली के प्रशासनिक विभाग को इसकी जानकारी देनी चाहिए। आखिरकार काफी जद्दोजहद के बाद मुंबई शाखा के प्रमुख इस शोकेस को पिछले हफ्ते कार्यालय से बाहर निकाल पाए मगर इसके लिए उन्हें करीब 8 महीने इंतजार करना पड़ा।

अब जरा जानते हैं कि आखिर इस छोटे से काम में उन्हें इतना समय क्यों लगा। प्रशासन ने उन्हें एक औपचारिक पत्र लिखकर बताने को  कहा कि आखिर वह इस शोकेस को क्यों हटाना चाहते हैं। प्रशासन का तर्क था कि ऐसा बताना इसलिए जरूरी है क्योंकि उनसे पहले जितने अधिकारी रहे हैं उन्हें इस शोकेस पर कोई आपत्ति नहीं रही है। शाखा प्रमुख द्वारा इस संबंध में औपचारिक पत्र भेजने के दो महीने बाद उन्हें स्थानीय प्रशासन और लेखा कर्मचारियों ने यह जानकारी दी कि उस शोकेस की बुक वैल्यू 1900 रुपये है और उसे कार्यालय से हटाने के लिए जरूरी है कि कम से कम तीन ऐसी कंपनियों से कोटेशन मंगवाया जाए जो इस शोकेस को खरीदने में दिलचस्पी रखती हैं। उसके बाद इस कोटेशन को मंजूरी के लिए भेजा जाए।

अब जाहिर सी बात है कि उस एक दशक पुराने शोकेस को खरीदने में कम ही लोगों की दिलचस्पी होगी, इस वजह से शाखा प्रमुख को उसके लिए संभावित खरीदार ढूंढऩे में खासी मशक्कत करनी पड़ी। काफी प्रयास के बाद उन्होंने स्थानीय फर्नीचर दुकानों से तीन कोटेशन जुटाए। इस शोकेस के लिए जो सबसे ऊंचा कोटेशन आया  वह 700 रुपये का था। कोटेशन मिलते ही इससे संबंधित दस्तावेज दिल्ली भेज दिया गया और शाखा प्रमुख ने राहत की सांस ली कि उनकी माथापच्ची अब खत्म हो चुकी है। मुख्यालय ने दो महीने बाद शाखा प्रमुख को एक पत्र लिखकर बताया कि 8 सदस्यीय खरीद बिक्री समिति का मानना है कि इस शोकेस के लिए जो कोटेशन आए थे उनमें राशि काफी कम है और नियमों के मुताबिक नए कोटेशन के लिए दोबारा से समाचारपत्रों में विज्ञापन दिया जाना चाहिए।

अखबारों में विज्ञापन देने के बाद 4 पक्षों ने इस शोकेस को खरीदने में इच्छा जाहिर की और इस दफा सबसे ऊंची बोली 800 रुपये की थी। शाखा प्रमुख को बताया गया कि फिलहाल खरीद बिक्री समिति दूसरे कामों में व्यस्त है और इसलिए उन्हें अपनी बारी आने के लिए कुछ समय इंतजार करना पड़ेगा। शोकेस को बेचने के लिए तीन महीने बाद मंजूरी मिल ही गई, मगर तब तक सबसे ऊंची बोली लगाने वाले फर्नीचर दुकान के मालिक का इरादा बदल चुका था। वह अब इसे खरीदना नहीं चाहता था। आखिकार इस शाखा प्रमुख ने खुद अपनी जेब से 850 रुपये दिए और दुकान के मालिक से कहा कि वह अपनी ओर से महज इसे खरीदने की रसीद दे दे। शोकेस को खरीदने के लिए कोई तैयार नहीं था, लिहाजा इसे तोड़ दिया गया।

शाखा प्रमुख को इस पूरे घटनाक्रम में यह बात समझ में नहीं आती है कि आखिरकार महज 850 रुपये के इस सामान के लिए फैसला लेने में समिति को इतना समय क्यों लगा। वह कहते हैं कि इससे ज्यादा तो कंपनी ने इस मामले को निपटाने के लिए भेजे गए पत्रों के कुरियर पर खर्च कर दिए।
यह केवल इस 8 सदस्यीय समिति की बात नहीं है, दफ्तर में समय बरबाद करने के ऐसे अनगिनत उदहारण हैं। स्वर्गीय सुमंत्रा घोषाल यह अक्सर कहा करते थे कि करीब 90 फीसदी प्रबंधक ऑफिस में खुद को व्यस्त दिखाने में व्यस्त रहते हैं।

चलिए अब जरा कुछ ऐसे कामों पर नजर डालते हैं जिनके जरिए व्यस्त लोग खुद को व्यस्त दिखाने की कोशिश करते हैं। कुछ प्रबंधक किसी भी चीज को एकटक घूरते नजर आ जाएंगे ताकि उनके आस पास के लोगों को लगे कि वह किसी गंभीर मसले पर विचार कर रहे हैं। कुछ तो इनसे भी दो कदम आगे निकलते हुए केवल इसलिए मीटिंग बुलाएंगे ताकि वे अपने कनिष्ठों को बता सकें कि उन्हें बुद्धिमानी से काम करना चाहिए और उन्हें कुछ अलग सोचना चाहिए।

वहीं आपको कुछ लोग ऐसे भी मिल जाएंगे जिन्हें हर काम के लिए लिखित रिपोर्ट चाहिए। मगर ऐसे अधिकारियों के पास जब आप उनके कहे अनुसार ही रिपोर्ट लेकर जाएंगे तो वे ही आपसे कहेंगे कि उनके पास इतना फालतू समय नहीं है कि वह इन बेकार की रिपोर्टों में अपना सर खपा सकें। वे ही आपसे कहेंगे कि सीधे सरल और कम शब्दों में उन्हें समझाया जाए कि माजरा क्या है। और कहीं अगर अगली बार उनके नीचे काम करने वाले कर्मचारी उन्हें कोई मौखिक सुझाव देने चले गए तो वे ही प्रबंधक चिल्लाकर यह कहने में देर नहीं लगाएंगे कि जब तक उन्हें किसी बारे में लिखकर नहीं दिया जाता है तब तक वह कैसे उस मसले के बारे में सोच सकते हैं।

दफ्तर में समय बरबाद करने का सबसे लोकप्रिय तरीका सोशल नेटवर्किंग है। आप किसी भी बड़ी कंपनी में चले जाइए और आपको वहां कर्मचारी चैटिंग करते और ऑनलाइन गेम खेलते नजर आ जाएंगे। कर्मचारी भले ही इंटरनेट पर कुछ ढूंढ़ते व्यस्त नजर आएं मगर उनमें से कई दरअसल समय बरबाद कर रहे होते हैं। पिछले महीने एसोचैम के एक अध्ययन से पता चला है कि कर्मचारी हर दिन दफ्तर में सोशल नेटवर्किंग साइटों पर कम से कम एक घंटा बरबाद करते हैं। 

एसोचैम के सामाजिक विकास फाउंडेशन सर्वे में बताया गया है कि कंपनियों को इस वजह से हर दिन अपनी उत्पादकता का करीब 12.5  फीसदी का नुकसान उठाना पड़ता है। ऑफिस में काम करने वाले करीब 82 फीसदी कर्मचारियों के पास फेसबुक अकाउंट है और एक औसत कर्मचारी इसे रोजाना 30 से 40 मिनट इस्तेमाल करता है यानी एक साल में करीब एक हफ्ता वह फेसबुक पर बिताता है। वहीं 77 फीसदी कर्मचारी जिनके पास ऑर्कुट अकाउंट है वे ऑफिस में इसका इस्तेमाल करने से नहीं चूकते हैं। दिलचस्प तो यह है कि 83 फीसदी कर्मचारियों को इसमें कुछ गलत नहीं लगता है। हर 10 में से 4 कर्मचारी ऑफिस में अपना ऑर्कुट, फेसबुक प्रोफाइल अपडेट करता है। सर्वे से पता चलता है कि अधिकांश संगठन जितनी नजदीकी से कर्मचारियों के ईमेल पर निगरानी रखते हैं उतनी गंभीरता के साथ इन साइटों पर नजर नहीं रखते।

हालांकि ऐसा सिर्फ भारत में ही देखने को नहीं मिलता है बल्कि दुनिया के दूसरे देशों में भी कर्मचारी ऑफिस में अपना समय बरबाद करते पाए जाते हैं। सैलरी डॉट कॉम और अमेरिका ऑन लाइन के अध्ययन से पता चलता है कि अमेरिका में एक औसत कर्मचारी लंच और नियमित ब्रेक के समयों को छोड़कर ऑफिस के 8 घंटों में से 2.09 घंटे बरबाद करता है।

Keyword: PSU, Navratna,
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