बिजनेस स?टैंडर?ड - गरीब किसानों का गम, दाम मिलते हैं कम
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गरीब किसानों का गम, दाम मिलते हैं कम
चिंता की बात यह है कि किसानों को बढ़ती कीमतों का फायदा नहीं मिल पाता
सुरिंदर सूद / नई दिल्ली January 28, 2010

कृषि जिंसों की आसमान छू रही कीमतें हर जगह चर्चा का प्रमुख विषय बनी हुई हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि इन जिंसों को उगाने वाले किसानों को ऊंची कीमतों का कोई फायदा नहीं मिल रहा है। कम पैमाने पर उत्पादन करने के कारण इन किसानों को व्यवस्था में अंतर्निहित कई खामियां झेलनी पड़ती है। इन्हीं अंतर्निहित खामियों की वजह से किसानों को बेहतर प्रतिफल नहीं मिल पाता है। इस तरह से जिंसों की जितनी कीमत उपभोक्ता चुकाता है, उसमें किसानों की हिस्सेदारी काफी कम होती है।

इनमें से ज्यादातर समस्याओं का हल नए बिजनेस मॉडल के जरिए किया जा सकता है। इसके तहत उन्हें इनपुट की खरीद व उत्पादों की बिक्री में किफायत का सामूहिक लाभ मिल सकता है। ऐसे में सहकारिता की अवधारणा से इस मकसद को हासिल किया जा सकता है, लेकिन दुर्भाग्य से दूध व चीनी जैसे क्षेत्रों को छोड़कर भारत में यह अवधारणा सही तरीकेसे काम नहीं कर पाई है।

प्राइमरी प्रोड्यूसर्स कंपनी भी एक अच्छी नई अवधारणा थी। इसकी परिकल्पना 2000 के दशक की शुरुआत में की गई थी, उस दौरान उस पर काफी बहस भी हुई,  लेकिन बाद में इसे करीब-करीब भुला दिया गया था। प्राइमरी प्रोड्यूसर्स कंपनी सहकारी संस्था और प्राइवेट लिमिटेड कंपनी का मिलाजुला रूप था। यानी उसमें दोनों की विशेषताएं समाहित थीं। लेकिन उसमें दोनों की गैर-जरूरी विशेषताएं नहीं थीं। किसानों और दूसरे क्षेत्रों के भी उत्पादकों की ओर से प्राइमरी प्रोड्यूसर्स कंपनी गठित करने के लिए साल 2002 में कंपनी कानून 1956 में संशोधन किया गया था।

इसके तहत, किसानों का समूह एक साथ मिलकर प्राइमरी प्रोड्यूसर्स कंपनी का गठन कर सकता है और बड़े पैमाने पर इनपुट की खरीद, कुल उपज की बिक्री, खेती के लिए जरूरी मशीन को किराए पर लेने और उत्पाद की गुणवत्ता में सुधार करने जैसी सेवाएं प्रदान कर सकता है।

ऐसी व्यवस्था में किसान अपनी जमीन नहीं गंवाएंगे और उस पर खेती जारी रख सकेंगे। प्राइमरी प्रोड्यूसर्स कंपनी में हर सदस्य का एक वोट होगा, चाहे उसके पास कंपनी की हिस्सेदारी कितनी भी हो। प्राइमरी प्रोड्यूसर्स कंपनी के शेयरों की खरीद-फरोख्त स्टॉक एक्सचेंज में नहीं की जा सकेगी और इसकी हिस्सेदारी का हस्तांतरण सिर्फ सदस्योंं को ही किया जा सकेगा ताकि बड़ी कंपनियों द्वारा प्राइमरी प्रोड्यूसर्स कंपनी के अधिग्रहण के खतरे को कम किया जा सके। इन कंपनियों को होने वाले मुनाफे का बंटवारा सदस्यों के बीच उस अनुपात में होगा जिस अनुपात में उन्होंने कंपनी के जरिए लेन-देन किया हो।

वास्तव में, ऐसी अवधारणा को फिर से जीवित करने का श्रेय राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को जाता है, जिन्होंने नई दिल्ली में 21 दिसंबर 2009 को आयोजित कॉरपोरेट सम्मेलन में इसका समर्थन किया था। उन्होंने नैशनल रेनफेड एरिया अथॉरिटी (एनआरएए) और कंपनी मामलों के मंत्रालय को इस मोर्चे पर पहल करने को कहा था।l

एनआरएए के सीईओ जे. एस. सरमा ने कहा कि बारिश पर आश्रित किसान सबसे गरीब हैं और उन्हें कोई फायदा नहीं मिल पाता, लिहाजा प्राइमरी प्रोड्यूसर्स कंपनी के गठन से उन्हें काफी फायदा मिलेगा। उनका मानना है कि कॉरपोरेट सेक्टर को भी इसमें शामिल किया जा सकता है और उन्हें किसानों से जोड़ा जा सकता है। इसी नजरिये से नैशनल रेनफेड एरिया अथॉरिटी ने वर्षा सिंचित क्षेत्र के विकास के लिए बढिय़ा बिजनेस मॉडल पर इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ कॉरपोरेट अफेयर्स (आईआईसीए) के सहयोग से पिछले हफ्ते नई दिल्ली में कार्यशाला का आयोजन किया था।

प्राइमरी प्रोड्यूसर्स कंपनी के मॉडल पर चर्चा के अलावा कार्यशाला में उन संभावनाओं की खोज की जिसकेतहत कृषि आधारित उद्योगों को किसानों के सीधे संपर्क में लाया जाए और दोनों को इसका फायदा मिले। साथ ही, ऐसा काम किसानों को उनकी जमीन से हटाए बिना हो। उद्योग व किसानों के बीच कामयाब जुड़ाव के कुछ उदाहरण हैं। गन्ना उत्पादकों चीनी मिल के बीच गठजोड़ ऐसे उदाहरण में शामिल हैं। ऐसा गठजोड़ दूसरी फसलों के उत्पादकों के साथ भी किया जा सकता है, जो कि किसी खास क्षेत्र में उत्पादित होते हैं, जैसे राजस्थान व उसके आसपास के इलाकों में ग्वार की अच्छी पैदावार होती है। हालांकि ऐसे चलन को प्रोत्साहित करने के लिए कुछ बाधाओं को दूर करने की दरकार होगी।

हालांकि कई राज्यों ने एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केटिंग कमिटी ऐक्ट (एपीएमसी एक्ट) में संशोधन किया है, लेकिन उन्होंने भी इसमें उस तरह संशोधन नहीं किया है, जैसा कि केंद्र चाहता है। ऐसे कानून को निवेश की सहूलियत के हिसाब से बनाए जाने की दरकार है।

इस देश में प्राइमरी प्रोड्यूसर्स कंपनी की सफलता के उदाहरण हैं और इसमें दक्षिण भारत के मसाला क्षेत्र का मामला सामने रखा जा सकता है। लेकिन यह चलन रफ्तार पकडऩे में नाकाम रहा है। इसकी मुख्य वजहों में से एक यह है कि वित्त का प्रबंध करने में काफी परेशानी होती है। बैक ऐसी कंपनी को उधार देने को इच्छुक नहीं होता क्योंकि उसके पास ऐसी कोई संपत्ति नहीं होती जिसे जमानत के तौर पर रखा जा सके। कुछ कंपनियां वित्त का प्रबंध करने में कामयाब रही हैं, लेकिन इसके लिए कंपनी के निदेशकों को अपनी व्यक्तिगत संपत्ति जमानत के तौर पर रखनी पड़ी है। ऐसी कंपनियों के विकास में संसाधन की उपलब्धता के महत्त्व को देखते हुए इसका समाधान बिना किसी देरी के किए जाने की दरकार है। इसका एक रास्ता यह हो सकता है कि प्राइमरी प्रोड्यूसर्स कंपनी का जुड़ाव बैंक के साथ हो, ठीक उसी तरह से जैसे कि ग्रामीण स्वसहायता समूह का है। राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) भी इस बाबत सामने आ सकता है और प्राइमरी प्रोड्यूसर्स कंपनी को कर्ज देने के लिए बैंकों को पुनर्वित्त की सुविधा उपलब्ध करा सकता है।

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