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बंदरगाह विस्तार योजनाएं अधर में
शर्मिष्ठा मुखर्जी / नई दिल्ली January 27, 2010

वैश्विक आर्थिक संकट के बाद जहां निजी कंपनियां इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश पर जोर दे रही हैं, वहीं बंदरगाहों की क्षमता विस्तार के लिए प्रस्तावित योजनाओं में से आधी परियोजनाओं को अंतिम फैसले के लिए अगले वित्त वर्ष तक टाल दिया गया है।

जहाजरानी मंत्रालय ने सरकारी और निजी भागीदारी (पीपीपी) में 20,000 करोड़ रुपये से भी ज्यादा की लागत से बंदरगाहों की क्षमता विस्तार के लिए 2009-10 में 30 परियोजनाओं का लक्ष्य किया था।

इन योजनाओं के जरिए केंद्रीय नियंत्रण के 12 बंदरगाहों की क्षमता में 46 फीसदी बढ़ोतरी की उम्मीद की जा रही है। इनमें से सिर्फ 10 योजनाओं को मंजूरी मिली हैं जिनकी लागत राशि महज 2000 करोड़ रुपये है। वहीं, क्षमता विस्तार की करीब आधी योजनाओं पर वित्त वर्ष 2010-11 में फैसला किया जाएगा। इनकी लागत करीब 13,000 करोड़ रुपये है। 

प्राइसवाटरहाउस कूपर्स के कार्यकारी निदेशक विश्वास उदगीरकर का कहना है, 'बंदरगाहों के मामले में बड़े पोर्ट ट्रस्ट मंत्रालय को अपने प्रस्ताव भेजते हैं। इसके बाद यह सार्वजनिक नीजि भागीदारी मूल्यांकन समिति (पीपीपीएसी) के पास स्वीकृति के लिए जाता है। इस वजह से देरी होती है।'

चार परियोजनाओं को मिली मंजूरी

वित्त सचिव अशोक चावला की अध्यक्षता वाली एक उच्च स्तरीय समिति ने चार बंदरगाहों की विस्तार परियोजनाओं को मंजूरी प्रदान की है जिनमें 4,120.29 करोड़ रुपये का निवेश का अनुमान है।

बुधवार को जारी आधिकारिक बयान के मुताबिक 3,125 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से चेन्नई बंदरगाह पर एक विशाल कंटेनर टर्मिनल विकास को मंजूरी दे गई है।

इसके अलावा 387.31 करोड़ रुपये की लागत से उड़ीसा में पारादीप बंदरगाह पर एक बहुद्देशीय बर्थ,  332.16 करोड़ रुपये की लागत से तमिलनाडु में तूतीकोरिन बंदरगाह पर दूसरा नार्थ कार्गो बर्थ और मंगलूर पोर्ट के लिए 275.82 करोड़ की विस्तार योजना प्रस्ताव को मंजूरी मिली।

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