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चुनौतियों के बावजूद है हौसला
आईपीओ : भले ही थर्ड पार्टी लॉजिस्टिक क्षेत्र में काफी तेजी का आलम बरकरार हो मगर एक्वा लॉजिस्टिक्स के लिए मार्जिन बनाए रखना प्रमुख चुनौती होगी
राम प्रसाद साहू /  January 24, 2010

लॉजिस्टिक सेवा प्रदान करने वाली कंपनी एक्वा लॉजिस्टिक आईपीओ के जरिए 150 करोड़ रुपये जुटाने का मन बना रही है।

कंपनी अपनी विस्तार योजनाओं, कार्य पूंजी आवश्यकताओं और अधिग्रहणों के लिए यह रकम जुटाने की तैयारी में है। मुंबई की यह कंपनी ऑटोमोटिव, फार्मास्यूटिकल्स, रिटेल और हेवी इंजीनियरिंग क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों को लॉजिस्टिक सहयोग, परिवहन सुविधा आदि उपलब्ध कराती है।

3पीएल हिस्सेदारी पर नजर

एक्वा लॉजिस्टिक्स थर्ड पार्टी (3पीएल) लॉजिस्टिक क्षेत्र को लक्ष्य कर रही है जो करीब 5,000 करोड़ रुपये का कारोबार है। वर्ष 2013-14 तक यह कारोबार 16,000 करोड़ रुपये से ऊपर तक पहुंच जाने का अनुमान है।

कंपनी इस थर्ड पार्टी लॉजिस्टिक सेवा कारोबार में तेजी का फायदा उठाने की तैयारी में है जहां सेवा प्रदाता कंपनी के पास परिवहन के विभिन्न साधनों (हवाई, सड़क और समुद्र मार्ग) और डोमेन की जानकारी को बेहतर तरीके से इस्तेमाल करने की छूट होती है।

यह सेवा मुहैया कराने वाली कंपनी कम खर्च में यह काम कर सकती है जबकि फर्स्ट पार्टी लॉजिस्टिक्स में उत्पादक के जिम्मे अधिक खर्च वाला परिचालन होता है। वहीं सेकंड पार्टी लॉजिस्टिक ट्रक ऑपरेटरों और भंडार मालिकों के जिम्मे होता है।

बेहतर मार्जिन पर ध्यान

मौजूदा समय में कंपनी अपने राजस्व का 90 फीसदी मल्टीमॉडल परिवहन सेवाओं के जरिए प्राप्त करती है जहां मुनाफा 10 फीसदी से भी कम होता है।

हालांकि कंपनी को उम्मीद है कि आने वाले दिनों में उसके राजस्व का 50 फीसदी हिस्सा उसे कॉन्ट्रैक्ट और प्रोजेक्ट लॉजिस्टिक्स से प्राप्त होगा जिसमें 20 से 25 फीसदी का मार्जिन होता है। कंपनी अब बड़े आकार के ऐसे परिवहन ऑर्डरों को लक्ष्य बना रही है जिन्हें एक जगह से दूसरी जगह ले जाना इतना आसान नहीं होता है और जिसमें अधिक मार्जिन होता है।

कंपनी का मानना है कि मूल्य वर्द्धित सेवाओं पर अधिक ध्यान देकर कंपनी अपना परिचालन मुनाफा मार्जिन बेहतर कर सकती है। 2009-10 की पहली छमाही में कंपनी का परिचालन मुनाफा मार्जिन 12.2 फीसदी का था। हालांकि कंपनी को इन लक्ष्यों को प्राप्त करने में फिलहाल कुछ समय लग सकता है क्योंकि मार्जिन से अधिक वॉल्यूम और राजस्व पर अधिक फोकस कर रही है।

ऐसेट लाइट मॉडल

कंपनी खुद को एक ऐसी कंपनी के तौर पर स्थापित करने की कोशिश में है जो परिसंपत्ति के मोर्चे पर बहुत मजबूत नहीं होने के बाद भी 'सॉल्यूशंस' का रास्ता अपनाकर अपना दबदबा बनाए।

देश की ज्यादातर प्रमुख लॉजिस्टिक कंपनियों की तरह कंपनी के पास ऐसेट तो नहीं हैं पर वह इसे दूसरी सेवा प्रदाता कंपनियों से किराए पर ले लेती है। इस तरह कंपनी भारी भरकम पूंजी निवेश के खर्चे से बच जाती है।

हालांकि कंपनी आने वाले दिनों में आईपीओ फंड के इस्तेमाल से 30 करोड़ रुपये के उपकरण खरीदने की योजना बना रही है। कंपनी प्रबंधन का मानना है कि इन उपकरणों से कंपनी को एक फायदा यह होगा कि वह ऊर्जा परियोजनाओं के लिए लॉजिस्टिक सेवाओं के लिए बोली लगाते वक्त आवश्यक पात्रताओं को पूरा कर सकेगी।

निष्कर्ष

आपूर्तिकर्ताओं और उपभोक्ताओं की ओर से बेहतर सहयोग नहीं मिलने की वजह से कंपनी नकदी किल्लत उठानी पड़ी है। बकाएदारों को रकम वापस करने के लिए तीन महीने की जो मियाद मांगी गई थी वह भी पूरी हो चुकी है।

वहीं 2004-05 से 2008-09 के बीच परिचालन के लिए नकदी भी अपर्याप्त रही है। कंपनी का मानना है कि अभी कुछ समय तक उसे कार्य पूंजी की दिक्कत रहेगी क्योंकि वह अभी विकास के चरण में है और उपभोक्ताओं से ज्यादा से ज्यादा ऑर्डर प्राप्त करने के लिए उसे उन्हें बेहतर क्रेडिट टर्म प्रदान करने होंगे।

कंपनी मौजूदा आईपीओ की एक तिहाई रकम (करीब 45 करोड़ रुपये) का इस्तेमाल कार्य पूंजी की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए करेगी। 3पीएल सेवाओं में कंपनियों के लिए फिलहाल अच्छा माहौल है और इस क्षेत्र में राजस्व में बढ़ोतरी की भी अच्छी संभावनाएं हैं मगर सवाल यह है कि क्या कंपनी दूसरी भारतीय और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ मुकाबला कर पाएगी।

अगर कंपनी ऑर्डर हासिल करने में कामयाब भी रहती है तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती मार्जिन को बनाए रखना और उसे बेहतर बनाना होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि 3पीएल क्षेत्र में ऑलकार्गो ग्लोबल जैसी दिग्गज कंपनियां कदम रख रही हैं।

भले ही दूसरी बड़ी कंपनियों की तुलना में कंपनी के आईपीओ की कीमत कुछ छूट के साथ तय की गई है मगर क्रियान्वयन और कड़ी चुनौती को देखते हुए इसमें थोड़ा जोखिम तो है। निवेशक इससे दूरी बनाए रख सकते हैं।

Keyword: aqua logistics, ipo, expansion plans, acquisition, automotive, pharmaceuticals,
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