बिजनेस स्टैंडर्ड - कामगारों की हालत तो रही बदतर की बदतर
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कामगारों की हालत तो रही बदतर की बदतर
जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  January 21, 2010

इस सप्ताह मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता ज्योति बसु का निधन हो जाने पर देशभर में व्यापक कवरेज मिला।

यह सही है कि बसु का देश में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री पद पर रहने का रिकॉर्ड रहा है लेकिन यह सवाल विचारणीय है कि इस रिकॉर्ड के आधार को छोड़कर क्या ऐसी अन्य बातें रही हैं कि उन्हें श्रध्दांजलि के तौर पर इतनी ज्यादा सराहना मिली।

राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक नेताओं, ट्रेड यूनियन के नेताओं, विपक्ष के नेताओं और उनके मार्क्सवादी साथियों आदि ने बड़े ही कूटनीतिक अंदाज से बसु को श्रध्दांजलि दी। लेकिन किसी ने भी इस संबंध में आम कामगारों से उनकी राय लेने की कोशिश नहीं की।

वैसे यह निरर्थक कोशिश ही होती क्योंकि उनके बारे में ऐसा समझा जाता रहा है कि जिन लोगों के हितों की रक्षा के लिए वह अपने राजनीतिक जीवनकाल में आधी से ज्यादा सदी तक आवाज उठाने का आभास देते रहे, उन लोगों के वह शायद ही नायक रहे थे।

करीब 25 साल के मुख्यमंत्रित्व काल और राष्ट्रीय वामपंथी आंदोलन पर उसके प्रभाव को देखने पर यह आश्चर्यजनक नहीं होना चाहिए। श्रमिकों के मामले में वाम मोर्चे का रिकॉर्ड बहुत अच्छा नहीं रहा है, हालांकि यह जरूरी नहीं है कि इसकी वे वजहें हैं जो मीडिया और उद्योगपति बताते हैं।

60 और 70 के दशक में बंगाल श्रमिक हिंसा का केंद्र बन गया था। पहले नक्सलियों (इनसे बसु का कोई वास्ता नहीं था) और बाद में उनके सत्ता में आने पर मजदूर यूनियनों के जरिए ऐसा हुआ। घेराव, हड़ताल और बंद ने पश्चिम बंगाल को बदनाम कर दिया और इस वजह से राज्य से पूंजी भी बाहर जाने लगी। लेकिन यह बसु की अगुआई वाले वाम मोर्चे के कार्यकाल में कामगारों की कहानी का एक हिस्सा भर है।

मामला यह है कि कई कारोबारी वापस लौट आए और बड़ा साम्राज्य खड़ा करने में कामयाब रहे। उनमें से ज्यादातर का वामपंथी कामरेडों के साथ नजदीकी जुड़ाव था और बसु इसके अपवाद नहीं थे।

कुछ साल पहले एक साक्षात्कार में उन्होंने संबंधों की व्याख्या इस तरह की: 'हमने ऐसी आर्थिक नीति अपनाई जिसके तहत हमने उद्योगपतियों से संवाद स्थापित किया। हमने उनसे कहा कि श्रमिकों की बदौलत ही वे मुनाफा कमाते हैं। हमने उनसे श्रमिकों का ध्यान रखने को कहा...।'

तीन दशक से ज्यादा बीत चुके हैं और यह स्पष्ट है कि बसु उद्योगपतियों से जिस संवाद का हवाला दे रहे थे, उससे किसी भी तरह से कामगारों की स्थिति बेहतर नहीं हुई। दुर्गापुर, हावड़ा, कल्याणी और मटिया बुर्ज के औद्योगिक शहर भयावह स्थितियों के गवाह हैं जिनमें बंगाल के कामगार काम करते हैं।

निश्चित तौर पर यह ऐसे व्यक्ति के मामले में विडंबनापूर्ण विरोधाभास है जिसने ट्रेड यूनियन के बल पर ही अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ाई। बंगाल के दिग्गज उद्योगपतियों की कुछ बड़ी इकाइयां इससे अलग नहीं थी। सलाहकार संस्था मैंकिजी के अध्ययन में राज्य के सबसे बड़े निवेशकों में शुमार एक की इस बात की आलोचना की गई थी कि उसने अपने कामगारों को शौचालय व पीने के पानी की सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई।

वास्तव में इस बात के सबूत हैं कि बसु के कार्यकाल में सांठगांठ से जुड़े पूंजीवाद के सबसे बुरे स्वरूप को बढ़ावा मिला। सच्चाई यह है कि पश्चिम बंगाल के कामगारों की हालत देश के दूसरे हिस्सों के कामगारों से अलग नहीं थी। पश्चिम बंगाल के संगठित क्षेत्र में कामगारों का मामूली अनुपात है - मुख्य रूप से सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में - यह अभी भी अल्पसंख्या में है।

ज्यादातर कामगार असंगठित क्षेत्र में काम करते थे और वहां की स्थितियां गंभीर व क्रूर थी। भारत के दूसरे इलाकों के कामरेडों की तरह आज तक पश्चिम बंगाल के असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए सरकारी सुरक्षा प्राप्त नहीं है तथा स्वास्थ्य व अवकाश प्राप्त करने पर मिलने वाले लाभ से भी वे वंचित हैं।

आश्चर्य यह है कि ज्यादातर लोग वामपंथी सरकार के प्रभावी भूमि सुधार के जरिए मिली जमीन की सुरक्षा से चिपटे हुए हैं और औद्योगिक परियोजनाओं के लिए जमीन लिए जाने का मजबूती से विरोध करते हैं - जैसा कि नंदीग्राम व सिंगुर में हुए संघर्ष में नजर आया।

70 व 80 के दशक में हमेशा से अंसतुष्ट रहने वाले श्रमिकों वाला चुनावी क्षेत्र ट्रेड यूनियन के सदस्यों को अपना राजनीतिक आधार बनाने में मददगार रहा। ये श्रमिक इस काम में उनके लिए मददगार बने रहे। ठीक उसी तरह से जैसे कि जमीन खोने वाले असंतुष्ट लोग ममता बनर्जी केवोट बैंक बन गए। लोगों का नजरिया चाहे जो हो, इन नेताओं ने बसु के प्रभाव से स्वतंत्र होकर अपनी सत्ता का आधार विकसित किया।

दुर्भाग्य से मानवद्वेषी टकराव की ऐसी नीति ने ऐसे राज्य में काम की संस्कृति को विकृत कर दिया जो शिक्षित कामगारों की बड़ी संख्या की शेखी बघार सकता था और अंतत: यह लक्षित लोगों को काफी कम फायदा पहुंचा पाया। बेरोजगारी का दुष्चक्र और कम उत्पादकता पूर्ण हो चुकी थी। 90 के दशक के मध्य में राज्य में ऊर्जा का आधिक्य हो गया, ऐसा नहीं है कि यहां ज्यादा बिजली उत्पादित हुई थी बल्कि मांग में कमी आ गई थी।

इस तरह से बंगाल बेरोजगारी व कम उत्पादकता के मामले में राज्यों के बीच उच्च स्तर पर बना रहा। इन सभी चीजों के देखते हुए आश्चर्य नहीं होता कि बंगाल की अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने की कोशिश के तहत 90 के दशक के मध्य में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश लाने की कोशिश की, लेकिन यह नाकाम साबित हुई।

सालाना विदेश दौरों में बसु सक्षम निवेशकों को यह भरोसा दिलाने की कोशिश करते रहे कि यूनियन उनके नियंत्रण में है। हां, यूनियन तो थी लेकिन वे वामपंथी नियंत्रित नहीं थीं। लेकिन बंगाल में इसने एफडीआई का पहला मामला कारगर नहीं होने दिया। इसके तहत एसर ग्रुप का प्रस्ताव राज्य के मालिकाना हक वाले मरणासन्न ग्रेट ईस्टर्न होटल केअधिग्रहण का था।

दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम यह है कि बसु के उत्तराधिकारी बुध्ददेव भट्टाचार्य अब चीजें सही करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उनका तरीका शायद गलत है - ठीक उसी तरह जैसे कि बसु की प्रशंसा गलत चीजों को गलत तरीकेसे करने के तौर पर की गई है।

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