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वाहन दुर्घटना बीमा की राह में हैं बड़ी मुश्किलें
अदालती आईना
एम. जे. एंटनी /  January 20, 2010

भारत में सड़क दुर्घटनाओं की दर इतनी ऊंची है कि यहां मोटर वाहन से कुचले जाने की आशंका किसी क्लब में दांव लगाकर जीतने की संभावना से भी ज्यादा है।

इसलिए आश्चर्य नहीं होता कि मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण में शहर के चौराहे पर खड़े वाहनों की तरह ही मुकदमों का अंबार लगा हुआ है। वर्ष 1988 के मोटर वाहन अधिनियम से इन सालों के दौरान कई तरह की समस्याएं पैदा हुई है और यह खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है।

इसलिए उच्चतम न्यायालय ने कुछ दिन पहले करीब 20 ऐसे मुद्दों को सुलझाने का फैसला किया है, जो आम तौर पर सामान्य होते हैं। अदालत की सूची में तत्काल ध्यान आकृष्ट करने वाला एक सवाल यह है कि बीमा कंपनियों का दायित्व क्या होगा जब उस ड्राइवर की वजह से दुर्घटना हुई हो जिसके पास उस समय वैध लाइसेंस नहीं हो।

इसी तरह के अन्य सवालों में सामान ढोने वाले वाहन में सवारी करते हुए यात्रियों का दुर्घटनाग्रस्त होना, यात्री कार में अतिथि का दावा, वाहनों में ओवरलोडिंग और मुआवजे के तौर पर दिए गए चेक का न भुन पाना शामिल हैं।  चेक का न भुन पाना  इतना आम हो गया है कि सबसे पहले इस मुद्दे का समाधान खोजा जाएगा। आश्रितों को मुआवजा देने की खातिर नुकसान का आकलन करना समस्याओं से घिर जाता है क्योंकि इस कवायद में क्षतिपूर्ति की बाबत कई सहज चीजें शामिल होती है।

इसमें पीड़ित की जीवन प्रत्याशा, उसकी कमाई की क्षमता और वह कितने साल काम कर सकता था, अपने आश्रितों को वह कितनी रकम का योगदान कर सकता था, हो सकता है मृतक ज्यादा दिनों तक जीवित नहीं रह पाता या उसके आश्रित अनुमानित जीवन प्रत्याशा तक जीवित न रह पाए, मृतक के बेहतर नौकरी की संभावना या नौकरी गंवाने की संभावना आदि बातें शामिल हो सकती है। मुआवजे की घोषणा से पहले न्यायाधिकरण इन चीजों पर विचार करता है।

हालांकि खुद मोटर वाहन अधिनियम कई तरह की समस्याएं खड़ी करता है। कई मामले सेक्शन 149 से संबंधित होते हैं। न्यायाधिकरणों और अदालतों द्वारा बीमा कंपनियों को वैसे तीसरे पक्षकार को मुआवजा देने को कहा जाता है जिनमें वास्तव में अनधिकृत, मुफ्त में यात्रा करने वाले यात्री शामिल हैं। ऐसे मामलों में दिए गए फैसले से विभिन्न तरह के परिणाम सामने आते हैं। इसके बाद बीमा कंपनियां इस मामले को अंतिम निर्णय के लिए उच्चतम न्यायालय ले जाती है।

बीमा कंपनियां अंतिम फैसले के लिए सेक्शन 146, 147, 149 और 166 से जुड़े मामलों पर अपील करती है। ये प्रावधान बसों की ओवरलोडिंग और लापरवाही से ड्राइविंग, बीमा पॉलिसी की सेवा-शर्तों के उल्लंघन से जुड़े हैं, क्या बीमा कंपनी ओवरलोडेड सार्वजनिक वाहन से सफर करने वाले घायल या मृतक के प्रतिनिधि को मुआवजा देने के लिए बाध्य है।

बीमा कंपनियों की अन्य अपील इस बात पर जोर देती है कि वह वैसी दुर्घटना के मामले में मुआवजा देने को बाध्य नहीं है जिसमें ड्राइवर के पास वैध लाइसेंस न हो या फिर उसके पास मौजूद लाइसेंस फर्जी था। कभी-कभी वाहन मालिक के पास उस लाइसेंस की अवधि समाप्त होने की बाबत या वैध लाइसेंस होने की जानकारी नहीं होती। अगर बीमा कंपनी भुगतान नहीं करती है तो वाहन मालिक को अपने संसाधनों को भारी-भरकम मुआवजा देना पड़ता है।

जब प्रीमियम के भुगतान के लिए दिया गया चेक अनादर हो गया हो और उसी दौरान दुर्घटना हुई तो क्या मोटर वाहन अधिनियम के सेक्शन 146 के तहत और बीमा अधिनियम के 64वीबी के तहत बीमा कंपनी का उत्तरदायित्व बनता है? बीमा कंपनियों ने यह सवाल भी उठाया है।

मोटर वाहन अधिनियम की दूसरी अनुसूची के तहत दुर्घटना के मामले में पैदा होने वाली समस्या पिछले दो दशक से जवाब की राह देख रहा है। इस अनुसूची में दिए गए फॉर्मूले का सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में उपहास उड़ाया है, इसकी शुरुआत यूपी स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन बनाम त्रिलोक चंद्रा के मामले से हुई थी। मुआवजे की रकम तय करने में मुद्रास्फीति का ध्यान नहीं रखा जाता।

दूसरे शब्दों में अन्य फैसले - मसलन कुशानुमा बनाम न्यू इंडिया एश्योरेंस मामला - में इस फॉर्म्यूले की प्रशंसा हुई है और टिप्पणी की है कि दूसरे तरीकों के मुकाबले यह सुरक्षित दिशा-निर्देश था। अब अदालत कहता है कि न्यायाधिकरण को कब इस तरीके का इस्तेमाल करना चाहिए और कब नहीं। अगर निजी कार में यात्रा करने वाला व्यक्ति दुर्घटना में मारा जाए तो क्या मुआवजे की बाबत बीमा कंपनी का उत्तरदायित्व बनता है?

यह सामान्य सवाल है जिस पर आधिकारिक कथन की जरूरत है। आतंकवाद और सशस्त्र डकैती के इस दौर में कानूनी दुविधा पैदा हुई है और यह है ड्राइवर की हत्या और वाहन केपरित्याग से संबंधित। कुछ अदालतों ने कहा है कि यह दुर्घटना का मामला है, इसलिए बीमा कंपनी उत्तरदायी होगी। लेकिन कुछ अन्य अदालतें ऐसा नहीं सोचती।

कई सवाल पहले ही छोटे खंडपीठ से बड़े खंडपीठ को हस्तांतरित किए जा चुकेहैं और उनके जवाब की प्रतीक्षा की जा रही है। क्या न्यायाधिकरण उत्तरदायी न होने के बावजूद बीमा कंपनी से आश्रितों को मुआवजा देने और फिर इस रकम की वसूली वाहन मालिक से करने को कह सकता है? अदालतों ने अलग-अलग जवाब दिया है।

ऐसे सवालों पर अदालत अगले महीने और बाद में भी विचार करेगी। इस तरह से ऐसे और कितने सवाल  होंगे, यह महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। अगर कानून बनाने वालों ने समय-समय पर अधिनियम पर नजर डाली होती तो अदालतों का भार काफी कम हो गया होता। लेकिन ऐसी बातें चलन में नहीं हैं।

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