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अमेरिका व चीन के बीच टकराव से बढ़ेगा खतरा!
चीन और अमेरिका के बीच व्यापार में समस्या के अलावा ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध व ताइवान को हथियारों की आपूर्ति जैसे कई और मुद्दे भी हैं। विस्तार से बता रहे हैं
ए. वी. राजवाडे /  January 20, 2010

न्यूयॉर्क स्थित राजनीतिक जोखिम परामर्श फर्म यूरेशिया ग्रुप ने हाल ही में अमेरिका-चीन संबंधों को 2010 में सबसे बड़ा वैश्विक खतरा बताया है।

ईरान के परमाणु कार्यक्रमों के लिए उस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने की अमेरिका की कोशिशें राजनीतिक रूप से भीषण टकराव पैदा कर सकती हैं। चीन के ऐसे कदम का विरोध करने की पूरी संभावना है।

अमेरिका द्वारा ताइवान को अत्याधुनिक सैन्य हथियारों और उपकरणों की फिर से आपूर्ति शुरू किए जाने की संभावना दूसरा गंभीर मुद्दा हो सकता है। चीन ताइवान को अपना एक बिछड़ा हुआ प्रांत मानता है। आर्थिक मसलों में द्विपक्षीय व्यापार असंतुलन और अपनी मुद्रा का मूल्य बढ़ाने के लिए चीन को राजी करने की अमेरिका की कोशिश शामिल है।

डॉलर के मुकाबले 21 फीसदी तक की बढ़ोतरी के बाद यह दर जुलाई 2008 के बाद से स्थिर बनी हुई है। चीन की विनिमय दर नीति अपने एशियाई व्यापार भागीदारों के लिए भी समस्याएं पैदा कर रही है। वियतनाम ने हाल में ही अपनी मुद्रा में 5 फीसदी तक अवमूल्यन किया है।

चीन का अकाउंट सरप्लस यानी चालू खाते में आधिक्य 2007 में जीडीपी के 11 फीसदी से घट कर पिछले साल लगभग 6 फीसदी रह गया था। चीन जर्मनी को पीछे छोड़ कर दुनिया में सबसे बड़ा निर्यातक बन गया है। अमेरिकी घाटा भी जीडीपी के 7 फीसदी से लगभग आधा रह कर 3 फीसदी रह गया है।

ये बदलाव वित्तीय संकट और अमेरिका में आर्थिक मंदी के प्रत्यक्ष परिणाम हैं और सवाल यह है कि क्या आर्थिक रिकवरी के बाद भी यह सुधार बरकरार रहेगा: नवंबर 2009 में अमेरिकी घाटा गहरा गया था। जब तक अमेरिकियों के खर्च और बचत आदतों में कोई बड़ा बदलाव नहीं आता, विनिमय दर में बदलाव के बावजूद घाटा बना रह सकता है।

इस सब के बाद व्यापार-भारित संदर्भ में 2002 के बाद से इसमें 20 फीसदी से भी अधिक की कमी ज्यादा मददगार साबित नहीं हुई- कम से कम अब तक तो ऐसा ही है। और चीन की भागीदारी इस घाटे में सिर्फ 30 फीसदी की है। पश्चिमी समीक्षक चीनी नीति को विनिमय दर की दिग्भ्रमित हेराफेरी के रूप में देखते हैं, जिससे उसके स्वयं के उपभोक्ताओं को भी नुकसान पहुंचा है।

मेरे विचार से, यह चीनी तर्क के लिए आसान है। विनिमय दर बढ़ोतरी एक अपस्फीतिकारी नीति है और इससे निश्चित रूप से जीडीपी विकास में कमी आएगी। चीनी नेतृत्व का मानना है कि सामाजिक स्थिरता की खातिर 8 फीसदी की विकास दर जरूरी है। वे सामंजस्यपूर्ण समाज को इससे कहीं ऊपर देखते हैं। इस नजरिये के पीछे एक राजनीतिक आयाम भी है।

अपनी वैचारिक जड़ों को त्याग कर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की वैधता शासक के रूप में लोगों के जीने के दर्जे में लगातार सुधार पर आधारित है।  और निश्चित रूप से ईरान में चुनावी परिणामों में कथित गड़बड़ी के खिलाफ ताजा विरोध चीनी लोगों को सामंजस्य और स्थिर सामाजिक माहौल बनाए रखने के लिए और अधिक उत्सुक बनाएगा।

इसके अलावा जापान का अनुभव बढ़ती मुद्रा के दुष्प्रभावों को स्पष्ट रूप से बताता है। 1980 के दशक में, जापान को अपनी मुद्रा में इजाफा करने की अनुमति के लिए अमेरिकी दबाव के आगे घुटने टेकने पड़े थे। एक समय तो यह बढ़ कर 80 येन प्रति डॉलर पर पहुंच गई थी। आर्थिक स्थिरता के पिछले दो दशक चीन को परिवर्तित विनिमय दर की अच्छाइयों के बारे में शायद ही भरोसा दिला पाएं।

वे अच्छी तरह जानते हैं कि हमारे कुछ अधिकारी इसे नहीं समझते, जैसा कि डैनी रोड्रिक ने अपने एक लेख में तर्क दिया था, 'मुद्रा के अवमूल्यन और आर्थिक विकास के बीच सभी विकासशील देशों  में मजबूत सकारात्मक संबंध है।' चीन का तर्क जो भी हो, लेकिन अमेरिका चीनी वाणिज्यवाद को ध्यान में रखते हुए जो भी कदम उठाएगा, वह वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा जोखिम हो सकता है।

क्या वह चीनी उत्पादों के आयात पर शुल्क लगाए जाने जैसे संरक्षणवादी कदम उठाएगा? (हाल के महीनों में अमेरिका ने चीनी टायरों और स्टील पाइपों के आयात पर शुल्क थोपा है।) शिकागो विश्वविद्यालय में इंटरनैशनल इकनॉमिक्स ऐंड फाइनैंस के प्रतिष्ठित प्रोफेसर रॉबर्ट एलिबर ने हाल में ही सभी चीनी आयात पर तब तक 10 फीसदी का समान शुल्क लगाए जाने की वकालत की थी, जब तक कि द्विपक्षीय घाटा वाजिब स्तर तक न आ जाए। यह हर महीने 1 फीसदी तक की बढ़ोतरी के बराबर होगा।

यहां उस स्थिति का उल्लेख किया जा सकता है जिसमें अमेरिका ने अपने बिगड़ते व्यापार संतुलन को पटरी पर लाने के लिए 1970 के दशक में यूरोपीय मुद्राओं और डॉलर के मुकाबले जापानी येन की वृद्धि को प्रभावी बनाए जाने की दिशा में कदम उठाया था।

ऐसी स्थिति में, खासकर ईरान और ताइवान को लेकर राजनीतिक असहमति के साथ चीन डॉलर प्रतिभूतियों में आगामी निवेश को बंद कर अच्छी तरह से जवाबी कार्रवाई कर सकता है। अमेरिका-चीन की व्यापारिक लड़ाई एक बड़ा खतरा है, जैसा कि मॉर्गन स्टैनली के प्रबंध निदेशक (एशिया) स्टीफन रोच भी हाल ही में तर्क दे चुके हैं।

सिंगापुर में नवंबर में हुए एशिया प्रशांत आर्थिक सहयोग सम्मेलन में अमेरिका बाजार-आधारित ऐसी विनिमय दरों पर सहमति जुटाने में सफल रहा था। लेकिन ऐसी घोषणाएं चीन को उसकी नीति में बदलाव के लिए राजी करने की दिशा में अविश्वसनीय हैं।

(तब से चीन आसियान के साथ मुक्त व्यापार समझौता कर चुका है और आसियान+3 ने चियांग माई इनीशिएटिव के तहत केंद्रीय बैंकों के बीच 120 अरब डॉलर की बहुपक्षीय मुद्रा विनिमय सुविधा के लिए हस्ताक्षर किए हैं।) मेरे विचार से, इसका एक समाधान हो सकता है और वह है- ब्रेटन वुड्स 2 में जी-4 मुद्राओं के लिए सीमित उतार-चढ़ाव के साथ चीनी मुद्रा का अप-वैल्यूएशन यानी अधिक मूल्यांकन।

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