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खुद कीजिए अपने भविष्य का फैसला
पिछले कुछ दशकों में पर्यावरण के किन क्षेत्रों में हमने प्रगति की है और किन क्षेत्रों में अभी लंबा सफर तय किया जाना है। इन्हीं सब बातों पर प्रकाश डाल रही हैं
सुनीता नारायण /  January 18, 2010

एक नये दशक की शुरुआत हो चुकी है। और मुझे पर्यावरण के क्षेत्र में काम करते लगभग तीन दशक हो गए हैं।

मैं इस सवाल का जवाब पाने की कोशिश कर रही हूं कि क्या 1980 के दशक की शुरुआत के बाद से, जब मैंने पर्यावरण पर काम शुरू किया था, पृथ्वी से जुड़ी समस्याओं में सुधार आया है? या फिर हालात और बिगड़े हैं? अब हम यहां से आगे किस दिशा में जाएंगे?

दो चीजें स्पष्ट हैं। पहली बात यह है कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि पर्यावरण पूरे देश में केंद्र विंदु में बना हुआ है। इस पर व्यापक रूप से चर्चा होती है। नीतिगत मामलों में पर्यावरण का पूरा ध्यान रखा जाता है। आज कोई भी यह कहने का साहस नहीं कर सकता कि उसे पर्यावरण की परवाह नहीं है।

कार कंपनियां जब अपने उत्पाद बेचती हैं तो लक्जरी के साथ-साथ पर्यावरण का पूरा ध्यान रखे जाने की बात करती हैं। रियल एस्टेट कंपनियां भी मकान बेचते समय जल संचयन प्रणाली पर जोर देती हैं। बॉलीवुड कलाकार भी जब थिरकते हैं तो पृष्ठभूमि में हरियाली दिखाई देती है। और सरकारें कहती हैं कि वे भविष्य के लिए कम उत्सर्जन वाली अर्थव्यवस्था चाहती हैं।

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि पर्यावरण का ध्यान रखना अब अंतर्निहित सा हो गया है। इन्हें पर्यावरण सक्रियता के तीन दशकों की उपलब्धि माना जा सकता है, लेकिन इस दौरान एक बड़ा बदलाव भी देखा गया है। 1980 के दशक के शुरू में पर्यावरण मुद्दों को लेकर कुछ जागरूकता थी, लेकिन इसे अधिक महत्व नहीं दिया जाता था। इसे महज मधुमक्खियों और पक्षियों के प्रेमियों की धुन के रूप में अधिक देखा जाता था।

दूसरी बात यह है कि पर्यावरण को लेकर जागरूकता तो काफी बढ़ी है लेकिन असली समस्या बद से बदतर होती जा रही है। हमारी नदियों में प्रदूषण तीन दशक पहले की तुलना में आज काफी हद तक बढ़ गया है। शहरों में कचरा दिनोंदिन तेजी से बढ़ रहा है।

हालांकि सरकारें प्लास्टिक में कमी लाने के तरीकों को तलाशने का प्रयास कर रही हैं और कचरे को दूर दराज के स्थानों में ठिकाने लगाया जा रहा है। शहरों में वायु प्रदूषण भी खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है। इससे हमारे शरीर, खासकर हमारे फेफड़ों को नुकसान पहुंच रहा है। कुल मिला कर, रिपोर्ट कार्ड अच्छा नहीं है।

शायद एक क्षेत्र ऐसा है, जिसमें काफी हद तक सफलता का दावा किया जा सकता है और वह है वन संरक्षण। दूरसंवेदी आंकड़ों से पता चलता है कि हरित इलाके बढ़ रहे हैं। लेकिन ऐसा संरक्षण उन लोगों के स्थानीय आर्थिक विकास की कीमत पर संभव हुआ है जो इन इलाकों के अंदर और इनके आसपास रहते हैं। भारत के गरीब लोग अभी भी समृद्ध वनों में रहते हैं। स्पष्ट है कि उनके लिए इससे आगे रास्ता नहीं है।

अब हम आगे किस दिशा में जाएंगे? समाज के तौर पर हम पर्यावरण मुद्दों में दिलचस्पी ले रहे हैं। यह अच्छी बात है। लेकिन समाज के तौर पर हम पर्यावरण का प्रबंधन करने में विफल हो रहे हैं। हम दो कारणों से इस दिशा में विफल हो रहे हैं।

पहला, आर्थिक विकास की पारिस्थितिकी विफलता - प्रदूषण और विषाक्तता, जो संपदा अर्जन से पैदा होते हैं, को रोकने में सफल नहीं रहे हैं। दूसरा, आर्थिक भलाई के लिए प्राकृतिक पर्यावरण की संपदा का इस्तेमाल कैसे किया जाए।

यह सच है। इसलिए एक समाज के रूप में हमें अब न सिर्फ पर्यावरण के बारे में सोचना होगा बल्कि कुछ करना भी होगा। लेकिन यह आसान काम नहीं है। इसके लिए एक ऐसी नई समझ की जरूरत होगी। हमें ऐसी सख्त नीतियों पर अमल की जरूरत होगी जो विकास की दिशा बदल सकती हों। हमें अपने निजी जीवन में विकल्पों में बदलाव लाना होगा।

ये विकल्प संपन्न देशों के पर्यावरण सुरक्षा अभियान के विकल्पों की तरह ही हैं जिन पर लगभग दो पीढ़ी पहले भी अमल की बात कही गई थी। लेकिन इसमें विफलता ही मिली। यही वजह है कि तापमान परिवर्तन की चुनौती आज भी जस की तस बनी हुई है।

लेकिन आज ये समाज संपन्न हैं, उन्होंने अपने प्रवाह को तेज किया है और काले धुएं से कुछ हद तक मुक्ति पा ली है। लेकिन उनके आर्थिक विकास और उनकी जीवनशैली पूरी दुनिया को जोखिम में डाल रही है और उनके पास इसका सही जवाब नहीं है, क्योंकि वे समय के साथ बदलाव जारी रखना चाहते हैं। वे बढ़ते उत्सर्जन की गंभर समस्या का छोटा समाधान ढूंढ़ रहे हैं।

पश्चिमी पर्यावरण आंदोलन का इतिहास भी हमसे काफी अलग है। यह उस वक्त शुरू हुआ जब ये समाज संपदा से लैस हो गए। इसलिए यह मुहिम अर्थव्यवस्थाओं के विकास के दौरान कचरा, विषाक्त हवा या प्रदूषित पानी की प्रतिक्रिया थी। उनके पास स्वच्छता पर खर्च करने के लिए धन था और उन्होंने ऐसा किया भी। लेकिन उन्होंने बड़े समाधान की तरफ कभी ध्यान नहीं दिया।

वे हमेशा समस्याओं में उलझे रहे। स्थानीय वायु प्रदूषण ज्यादातर पश्चिमी शहरों में अभी भी एक गंभीर समस्या बनी हुई है। वे मौजूदा हालात से निपटने के लिए प्रौद्योगिकी पर खर्च कर रहे हैं। जैसे कि संपन्न विश्व के पर्यावरणविद कचरा प्रबंधक हों, इसके अलावा और कुछ नहीं।

हम कम संसाधनों और असमानता और गरीबी के बावजूद उनसे होड़ करना चाहते हैं। वास्तविकता यह है कि हम उन अधूरे समाधानों में जवाब नहीं ढूंढ़ सकते, जिन पर उन्होंने निवेश किया है। यह हमारे अगले दशक की चुनौती है।

अगला दशक हमारी प्रतीक्षा कर रहा है। क्या हम अपने और अपनी कारों के अवशिष्ट पदार्थों के साथ बह जाएंगे और समझेंगे कि समस्या दूर हो गई है? क्या अगले दशक में हम अधिक वार्ताएं, सम्मेलन आदि ही करते रहेंगे? या फिर कुछ अलग करेंगे?

उदाहरण के लिए, अत्याधुनिक सुविधाजनक बस का उपयोग करेंगे या सिर्फ ईंधन-किफायती या हाइब्रिड कार को सेलेब्रेट करेंगे? अलग जवाब ढूंढ़ें। यह हमारी और सिर्फ हमारी मर्जी पर निर्भर करता है।

Keyword: environment, company products, real estate, plastic, economic development,
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