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बढ़ रहे हैं सच की परवाह नहीं करने वाले वादी
अदालती आईना
एम. जे. एंटनी /  January 13, 2010

हमसे कहा जाता है कि डॉक्टरों  और वकीलों को पूरी सच्चाई बताई जानी चाहिए।

उनसे कोई भी बात नहीं छुपानी चाहिए और न ही उनके सामने असत्य बोलना चाहिए। लेकिन इसमें अदालतों को छोड़ दिया गया है। शायद यही वजह है कि उच्चतम न्यायालय ने हाल में कहा है कि सच्चाई के प्रति सम्मान नहीं रखने वाले वादियों की संख्या में पिछले चार दशकों के दौरान बढ़ोतरी हुई है।

यह समस्या निश्चित रूप से गंभीर हो सकती है क्योंकि पिछले महीने दलीप सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले में जो फैसला आया था उसकी प्रस्तावना में बहुत लंबे पैराग्राफ में लिखा गया है कि गांधीवादी मूल्यों में किस तरह गिरावट आ गई है। विभिन्न अंशों में कहा गया है - कई शताब्दियों से भारतीय समाज की जीवन के दो आधारभूत मूल्यों- सत्य और अहिंसा पर अटूट आस्था रही है।

महावीर, गौतम बुध्द और महात्मा गांधी ने इन मूल्यों को अपने दैनिक जीवन में उतारने की खातिर लोगों का मार्गदर्शन किया है। स्वतंत्रता से पहले सच्चाई न्याय देने की व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा हुआ करती थी और अदालत में सच बोलकर लोग गौरवान्वित महसूस करते थे और इस बाबत वे परिणाम की चिंता नहीं करते थे। मुकदमेबाजी में शामिल लोग अदालती कार्यवाही के दौरान झूठ, गलतबयानी और सच्चाई को दबाने  में नहीं हिचकिचाते।

इस रुख को देखते हुए अदालत ने नए नियम बनाए हैं और अब यह अच्छी तरह स्थापित हो चुका है कि न्याय के प्रवाह को प्रदूषित करने की कोशिश करने वाले वादी या दागी हाथों से न्याय के शुध्द स्रोत को छूने वाले किसी तरह की राहत के हकदार नहीं हैं चाहे वह अंतरिम हो या अंतिम। हालांकि समस्या समाप्त नहीं हुई है। न्यायिक व्यवस्था में इसकी जड़ें गहरी हैं।

हर साल अदालती प्रक्रिया को कोसने वाले बेईमान वादी से संबंधित मामले ऊपरी अदालत तक पहुंचते हैं। निचली अदालत में परिस्थितियां निश्चित रूप से खराब होंगी। साल 2008 में अदालत ने कहा है कि अगर वादी ने साफ-सुथरे हाथों से अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाया हो, खुद के पास उपलब्ध सच्चाई का खुलासा नहीं किया हो और प्रक्रिया में देरी करने की इच्छा रखता हो तो फिर उसे व्यवस्था से बाहर रखा जाएगा (सुनील पोद्दार बनाम यूनियन बैंक ऑफ इंडिया)। कई अन्य मामलों में इसे दोहराया गया था।

वर्तमान मामले में जमीन रखने की अधिकतम सीमा पर सीलिंग लागू करने वाले उत्तर प्रदेश के कानून के तहत जमीन के मालिक को जब अतिरिक्त जमीन सरेंडर करने को कहा गया तो वह 1975 से अपने निधन तक कार्यवाही टालता रहा, जब तक कि उसके कानूनी प्रतिनिधि ने मुकदमा अपने हाथ में नहीं ले लिया।

उच्चतम न्यायालय में पिछले महीने यह मामला समाप्त हुआ, लेकिन सैकड़ों भूमिहीन लोगों को इस कानून का फायदा लेने से वंचित होने से पहले यह नहीं हुआ। भूमि सुधार की नाकामी के लिए कई कारण गिनाए जा सकते हैं, लेकिन मुकदमेबाजी निश्चित रूप से उनमें से एक है, सरेंडर में देरी और भूमि का इस्तेमाल तीन पीढ़ियों तक करने के लिए इस पर दांव लगाया जा सकता है, जैसा कि इस मामले में नजर आ रहा है।

पोते का प्रमुख तर्क यह था कि उसके पूर्वज को कानून के तहत चल रही कार्यवाही का नोटिस नहीं मिला और वह इतने बीमार थे कि अधिकारियों के सामने अपने आपको पेश करने में असमर्थ थे। इन सभी बातों पर भरोसा नहीं करते हुए उच्चतम न्यायालय ने टिप्पणी की : हम उस दुस्साहस से चकित हैं जिसमें पोता शपथ लेकर गलत बयान दे सकता है... यह अधिकारियों को गुमराह करने की कोशिश है और अदालतों ने तीन पीढ़ियों तक इसका संप्रेषण किया है।

साथ ही यह आचरण निंदा के योग्य है। वे ऐसी श्रेणी के लोग हैं जो न सिर्फ कोशिश करते हैं और न्याय को प्रदूषित करने में कामयाब भी हो जाते हैं। उपरोक्त वर्णित मामले कठिन हैं, लेकिन उनमें सफेद झूठ भी है। यह इतना गहरा है कि वादी के हाथ पर निश्चित रूप से इतने धब्बे होंगे कि उसे अदालती पोर्टल में घुसने से वंचित कर सके? अगर गंदगी हटा दी जाए और हाथ साफ सुथरा हो जाएगा तो क्या जिस तरह की राहत की मांग की गई है उसे देने से इनकार किया जाएगा?

अरुणिमा बरुआ बनाम केंद्र सरकार के मामले में एक कर्मचारी ने इस सच्चाई को उसी समय दिल्ली उच्च न्यायालय में तब छुपाया कि उसने उस समय जिला अदालत की शरण ली थी। उच्च न्यायालय ने उसकी याचिका खारिज कर दी क्योंकि उसे फोरम शॉपिंग करते पाया गया। हालांकि अपील किए जाने पर उच्चतम न्यायालय उसकी तरफ उदार नजर आया।

इसने कहा कि अदालत का दरवाजा खटखटाना मानवीय अधिकार था और अगर उसके लिए दरवाजा बंद कर दिया जाता तो वैयक्तिक मामले में यह घोर अन्याय हो सकता था। उसकेमुताबिक, तथ्यों को दबाने भर से किसी व्यक्ति को अदालत का दरवाजा खटखटाने से वंचित किया जा सकता है। लेकिन तथ्यों का मामला वैयक्तिक मामलों पर निर्भर करता है।

लगता है कि ब्रिटिश अदालत ने सौ साल पहले ऐसी दुविधा का सामना किया था। वहां फैसले पर चर्चा करते हुए एक न्यायविद् ने कहा : साफ-सुथरे हाथ की अनुपस्थिति का तब तक कोई मतलब नहीं बनता जब तक कि भ्रष्टता, हाथ पर लगी गंदगी पर सवाल न उठा हो, का तत्काल व अनिवार्य संबंध उस समानता से न हो जिसकी मांग की गई है। साफ-सुथरे हाथ का नियम सटीक या संतोषजनक संचालन में सक्षम नहीं हो सकता।

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