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बहस : फेयर वैल्यू रिपोर्टिंग अच्छी है या खराब?
आशीष भट्टाचार्य /  May 05, 2008
पिछले कुछ सप्ताहों से कॉरपोरेट वित्तीय रिपोर्टिंग में रुचि लेने वाले इस बात पर बहस कर रहे हैं कि क्या फाइनैंशियल इंस्ट्रूमेंट की फेयर वैल्यू रिपोर्टिंग से दर्ज आमदनी में गैर वाजिब उतार चढाव आता है और ऋण का संकट होता है। 
दुनिया भर में वित्तीय विश्लेषकों का प्रतिनिधित्व करने वाले संस्थान सीएफए इंस्टीटयूट नें एक सर्वे में अपने सदस्यों से पूछा कि क्या वित्तीय संस्थानों की फेयर वैल्यू या सटीक रिपोर्टिंग इन संस्थानों में पारदर्शिता को बढ़ावा देती है और क्या इससे इन संस्थानों के रिस्क प्रोफाइल को समझने में आसानी होती है।
79 प्रतिशत सदस्यों ने हां में जवाब दिया। हालांकि 55 प्रतिशत ने कहा कि इस संबंध में साफ सुथरी रिपोर्टिंग से के्रडिट का संकट हो जाता है। सर्वे में भाग लेने वाले सदस्यों में 74 प्रतिशत मानते हैं कि फेयर वैल्यू एकाउंटिंग से बाजार के एकीकरण को बढावा मिलता है।
इंटरनेशनल एकाउंटिंग स्टैंडर्ड बोर्ड (आईएएसबी) के द्वारा जारी एक चर्चा प्रपत्र में बहुत सारे सदस्यों का मानना था कि अगर इस जटिलता का दीर्घ अवधि के लिए समाधान निकालना है तो इसके लिए वित्तीय उपकरणों का फेयर वैल्यू मापन जरूरी है।
फेयर वैल्यू लेखा जोखा के संबंध में एक बात आलोचना के तौर पर कहा जाता है कि इससे आमद की तरलता को जुटाने में कमी आ जाती है। लेकिन इस तर्क को यह कहकर खारिज किया जाता है कि लेखा जोखा कानून में आसानी से आमद को एकत्रित करना कभी लक्ष्य नहीं होता। इसके अलावा लेखा जोखा कानून में यह लक्ष्य भी शामिल किया जाना चाहिए कि किसी खास समयावधि में बैलेंस शीट की सारी वित्तीय स्थिति का जिक्र हो।
वित्तीय स्टेटमेंट को देते समय आर्थिक सच्चाई का ध्यान रखना चाहिए।आईएएसबी के इस वाद-विवाद में फेयर वैल्यू मानक नही रखने के परिणामों पर भी चर्चा हुई। इसे कृत्रिम तरलता और कृत्रिम स्थिरता का नाम दिया गया। अगर वास्तविक तरलता खराब है तो कृत्रिम तरलता बिल्कुल बेकार है। कृत्रिम तरलता तब होती है जब अन्य परिसंपत्तियों और देयताओं में विरोधी दिशा में परिवर्तन होता है और इसमें से किसी एक को फेयर वैल्यू के आधार पर मापा जाता है।
अगर वित्तीय उपकरणों को फेयर वैल्यू के आधार पर मापा जाता है तो आमद ज्यादा तरल हो जाता है जितना नहीं होना चाहिए। फेयर वैल्यू मापन से सारे वित्तीय उपकरण में कृत्रिम तरलता बाहर हो जाएगी और इससे इसे अलग तरीके से मापा जा सकता है।
आमद में कृत्रिम स्थिरता खासकर वित्तीय रिपोर्टिंग में कम होती है और यह कृत्रिम तरलता की ही तरह दिशा भ्रामक होता है। कृत्रिम स्थिरता लागत आधारित मापक के परिणाम देता है। इसमें फेयर वैल्यू में परिवर्तन होने से किसी प्रकार का बदलाव नही आता है। कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि अगर मैच्योरिटी तक वित्तीय परिसंपत्तियों का सही से प्रबंधन किया जाए तो लागत आधारित कृत्रिम स्थिरता एक समस्या नही होती है।
इस विचार के समर्थक मानते हैं कि क्रेडिट घाटे को छोड़कर मैच्योरिटी तक वित्तीय परिसंपत्तियों का फेयर वैल्यू आकलन करना प्रासंगिक नही है। ऐसा इसलिए है कि परिसंपत्तियां उस तरह से नही दिखती जैसे उसे प्रबंधित किया जाता है। इसके लिए आईएएसबी कुछ अलग तर्क देती है। अगर हर चीजों को ध्यान में रखते हुए विचार करें तो फेयर वैल्यू रिपोर्टिंग के तहत प्रबंधन जो निर्णय लेती है वह उपकरण को बनाए रखने के लिए होता है न कि उसे बेचने के लिए।
दूसरे शब्दों में उपकरण के फेयर वैल्यू में हो रहे परिवर्तन का पता इस तरह से निवेशकों को नही चल पाएगा चाहे कंपनी बेहतर स्थिति में ही क्यों न हो और उसने अपना सारा उपकरण मैच्योरिटी से पहले ही बेच दिया हो। वित्तीय उपकरणों के समीझा की जरूरत इसलिए महसूस की जाती है कि जब एकाउंटेंट्स और ऑडिटर इसका लेखा जोखा करते हैं तो आईएएस 39 को क्रियान्वित करने में कठिनाई होती है।
इसमें अलग अलग वित्तीय उपकरण की पहचान और मापन में थोड़ी जटिलताएं होती है।आईएएसबी का यह वाद-विवाद कुछ समस्याओं के निदान पर केंद्रित रहा। इसमें इन वित्तीय उपकरणों की वर्तमान मापन विधि के  मरम्मत की भी बात हुई। इस सुधारों में आईएएस 39 की मुख्य श्रेणियां, लाभ और हानि के माध्यम से फेयर वैल्यू, उपलब्ध उपकरण की बिक्री और मैच्योरिटी तक रहने के बाद बिक्री होने वाले उपकरण प्रमुख हैं।
वित्तीय उपकरण को दो श्रेणियों में विभाजित किया गया। पहला लाभ और हानि के माध्यम से फेयर वैल्यू और दूसरा लाभ और हानि की गणना करते समय अवास्तविक लाभ और हानि की पहचान करना है। ट्रेडिंग और डेरिवेटिव इंस्ट्रूमेंट के लिए इसे लाभ और हानि के जरिये रखना जरूरी है। यह कंपनियों की इच्छा पर निर्भर करता है कि वह और किन मदों को इसके तहत रखना चाहती है।
बिक्री के लिए उपलब्ध उपकरण को अवास्तविक लाभ और हानि की श्रेणी में रखा जाता है और इसमें अन्य विस्तृत आय को भी समाहित कर लिया जाता है। मैच्योरिटी उपकरण तक रहने वाले उपकरण को परिशोधित लागत के आधार पर मापा जाता है।
आगे ये जटिलताएं क्षतियों की प्रतिपूर्ति और हेज के लोखा जोखा से और बढ़ जाता है। इस वाद-विवाद पत्र में आईएएस 39 की जटिलताओं को मापने के लिए मध्यस्थ तरीके खोजे गए जबकि शेष और मुद्दों में फेयर वैल्यू लेखा जोखा की जरूरत महसूस की गई जिसे अपनाने में लंबा वक्त लगेगा।
इसमें जिन तरीके का सुझाव दिया गया है उसमें मैच्योरिटी के बाद या उपलब्ध उपकरणों की बिक्री को खत्म करना या जहां एक क्रियाशील बाजार है वहां हरेक उपकरणों की मूल्य मापन की अनिवार्यता करना आदि शामिल है। एक क्रियाशील बाजार एक ऐसा बाजार है जहां क्रेता और विक्रेता की संख्या बहुत ज्यादा हो और जब क्रे ता को विक्रेता की जरूरत हो उसे वह मिल जाए और जब विक्रेता को क्रेता की जरूरत हो तो उसे वह मिल जाए। वहां सूचनाओं का मुक्त प्रवाह हो और उत्पाद समांगी हो।
पूंजी बाजार और जिंस बाजार इसी तरह की क्रियाशील बाजार का उदाहरण है।इसका एक आरंभिक हल यह होगा कि सारे वित्तीय उपकरणों के लिए वैकल्पिक राहत हो चाहे वह परिशोधित लागत मापन ही क्यों न हो और राशि की प्रवाह (जैसे परिवर्तित ब्याज पर लिया गया ऋण) एक सीमित उपकरण के अंतर्गत हो।
एक तीसरी संभावना यह है कि या तो हेज लेखा जोखा को आसान बनाया जाए या इसे पूरी तरह से खत्म कर दिया जाए।इस सारे उपायों के अपने फायदे हैं लेकिन इससे विभिन्न कं पनियों की सच्ची प्रवृत्ति परिलक्षित नहीं होगी।
Keyword: debate : fair value reporting is good or bas?,
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