बिजनेस स्टैंडर्ड - महंगाई को मात नहीं दे पा रहे संगठित रिटेलर
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महंगाई को मात नहीं दे पा रहे संगठित रिटेलर
कारगर नहीं हो पा रहा रिटेलरों का फार्म-टू-फोर्क मॉडल, माल की आपूर्ति के लिए वेंडरों पर हैं निर्भर
राघवेंद्र कामत / मुंबई January 07, 2010

परिदृश्य 1 : 5 जनवरी : दक्षिण कोलकाता स्थित स्पेंसर्स रिटेल में प्याज 30 रुपये प्रति किलो बिक रहा था। वहीं समीप के किराना स्टोरों में इसकी कीमत 26 रुपये प्रति किलो थी। खास बात यह कि दोनों विक्रेता थोक बाजार से 18 रुपये प्रति किलो की दर से प्याज की खरीद कर रहे थे।

परिदृश्य 2 : 4 जनवरी : नासिक स्थित रिलायंस फ्रेश के स्टोर पर प्याज की कीमत 23 रुपये प्रति किलो थी, जबकि स्थानीय सब्जीमंडी में 20 रुपये प्रति किलो की दर से प्याज बिक रहा था। जबकि नासिक की एपीएमसी में प्याज 14 रुपये प्रति किलो की दर पर उपलब्ध था।

परिदृश्य 3 : 4 जनवरी : मुंबई के लोअर पारेल स्थित फ्यूचर ग्रुप के बिग बाजार में प्याज की कीमत 26 रुपये प्रति किलो थी, जबकि समीप स्थित किराना स्टोर में प्याज 22 से 24 रुपये प्रति किलो बिक रहा था। थोक मंडी से दोनों विक्रेता 10 से 15 रुपये प्रति किलो की दर से प्याज की खरीद कर रहे हैं। प्याज के साथ-साथ आलू की कीमतों में भी इस तरह का अंतर देखा जा रहा है।

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि संगठित रिटेल सेक्टर खाद्य पदार्थों की महंगाई पर काबू पाने में सक्षम नहीं हुए। प्याज और आलू की कीमतें स्थानीय स्टोरों से कहीं ज्यादा संगठित रिटेल स्टोरों में देखी जा रही है।

कुल मिलाकर देखें तो फार्म-टू-फोर्क मॉडल, जिसके तहत किसानों को उत्पाद की अधिक कीमत और उपभोक्ताओं को कम कीमत पर वस्तुएं उपलब्ध कराने की योजना थी वह कारगर साबित नहीं हो पा रही है।

रिटेल क्षेत्र के विश्लेषकों और अधिकारियों का कहना है कि प्रीमियम प्राइसिंग रणनीति, कर्मचारियों का खर्च व आपूर्ति की समस्या के चलते संगठित रिटेल स्टोरों में खाद्य वस्तुओं की कीमत कहीं ज्यादा है। सच तो यह है कि खाद्य पदार्थों के बहुत से रिटेलर सीधे तौर पर किसानों से खरीदारी नहीं कर रहे हैं।

कुछ रिटेलर जो किसानों से सीधे उत्पाद खरीदने की कोशिश कर रहे हैं, वे भी व्यावहार्यता और निर्बाध आपूर्ति मसलों के चलते ऐसा नहीं कर पा रहे हैं। ज्यादातर रिटेलर एपीएमसी से कृषि जिंसों की खरीदारी करते हैं।

महिंद्रा ग्रुप का कृषि कारोबार विभाग महिंद्र्रा शुभ-लाभ सर्विसेस लिमिटेड के सीईओ विक्रम पुरी का कहना है कि आपूर्ति और रिटेलिंग का खर्च बहुत ज्यादा है और ग्राहकों तक उसकी पहुंच अपेक्षाकृत कम है। वहीं असंगठित स्टोरों की लागत कम आती है। ओसीऐंडसी स्ट्रेटजी कंसल्टेंट्स के निदेशक एन. दवे का कहना है कि आपूर्ति शृंखला बनाना भी बड़ी चुनौती है।

कोल्ड चेन और परिवहन पर काफी खर्च करना पड़ता है। फ्यूचर ग्रुप अपने फूड बाजार और बिग बाजार में फलों और सब्जियों की आपूर्ति के लिए वेंडरों पर निर्भर है। फ्यूचर ग्रुप के एक अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि फलों और सब्जियों के कारोबार से कोई रिटेलर पैसा नहीं कमा पा रहा है। प्याज और आलू जैसे जिंसों की बिक्री बहुत ही जटिल और विशेषीकृत व्यवसाय है।

इसके संगठित कारोबार के लिए बहुत रकम की जरूरत पड़ती है। बिग बाजार के अध्यक्ष सदाशिव नायक का कहना है कि वेंडरों के साझा करने की नई रणनीति बनाई जा रही है और कटे हुए फल व सालाद की बिक्री से दोनों को फायदा होने की उम्मीद है। कुछ लोग तर्क देते हैं कि रिटेल स्टोरों में अधिक कीमत का मतलब है ज्यादा कमाई, लेकिन कंपनियों ऐसा नहीं मानतीं।

रिटेलरों का कहना है कि वे अच्छी गुणवत्ता वाले उत्पादों की बिक्री करते हैं। ऐसे में कीमतें थोड़ी ज्यादा हो सकती हैं। आरपीजी ग्रुप के स्पेंसर्स रिटेल के एक अधिकारी ने बताया कि हम उसी दर पर चीजें उपभोक्ताओं को मुहैया कराते हैं, जिस दर पर किराना स्टोर वाले देते हैं। जबकि हमारी वस्तुओं की गुणवत्ता उनसे कहीं अच्छी होती है।

रिलायंस रिटेल के एक अधिकारी ने बताया कि हम स्टॉक को देखते हुए कीमत तय करते हैं, जिसमें रोजाना उतार-चढ़ाव आता रहता है। उन्होंने कहा कि कई किराना स्टोर वाले उनके यहां से सामान खरीदकर ऊंचे दामों पर भी बेच रहे हैं।

विश्लेषकों का भी मानना है कि रिटेल बहुत ज्यादा कमाई करने की स्थिति में नहीं हैं। अर्नस्ट ऐंड यंग के पार्टनर और नैशनल लीडर, रिटेल पिनाकी रंजन मिश्रा का कहना है कि रिटेल कम मार्जिन वाला कारोबार है।

(साथ में प्रदीप्ता मुखर्जी और तुषार पवार)

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