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क्या भविष्यवेत्ताओं की बातें सच होती हैं?
ज्यादातर पूर्वानुमान सटीक क्यों नहीं बैठते हैं? नई गतिविधियों को बढ़ावा देने वाले रुझानों की शुरुआत कब हुई? रुझानों के उलट ब्रिक जैसे पूर्वानुमान सही कैसे साबित हुए? बता रहे हैं
अभीक बरुआ /  January 06, 2010

क्या पूर्वानुमान कभी सच साबित होते हैं? मुश्किल से ही ऐसा होता है क्योंकि सभी ताजा रुझानों पर निर्भर होते हैं।

पूर्वानुमानों के साथ जीने वाले मेरे जैसे लोग अच्छी तरह से जानते हैं कि इनके साथ असल समस्या यह है कि हममें से किसी के भी पास जादू की छड़ी नहीं है। हममें से ज्यादातर लोग जिस सिलसिले का अनुसरण करते हैं, वे मौजूदा रुझानों पर आधारित होते हैं।

ये रुझान मुश्किल से ही काम करते हैं। जरा उन पूर्वानुमानों के बारे में सोचिए जो 1999 में अगले एक दशक यानी 2000 से लेकर 2009 के लिए व्यक्त किए गए थे। भारतीय विनिर्माण क्षेत्र का प्रदर्शन निराशाजनक था और माना जा रहा था कि इस मोर्चे पर भारत चीन के हाथों हार चुका है।

वैश्विक मानकों को हासिल करने की दिशा में सहयोगी श्रम कानून के अभाव को एक बड़ा कारण माना जा रहा है। सेवा क्षेत्र काफी तेजी से बढ़ रहा था लेकिन रोजगार देने की उसकी क्षमता काफी सीमित दिखाई दे रही थी। कुछ बीपीओ कंपनियों की शुरुआत हुई थी लेकिन उनका काम काफी निचले स्तर का ही था।

एशियाई संकट और डॉटकॉम संकट के कारण खासतौर से एशियाई शेयरों में निवेश करना जोखिमपूर्ण हो गया था। सेलफोन का आगमन हो चुका था लेकिन बाधक नियमनों और भारी पूंजीगत लागतों के कारण दूरसंचार घनत्व काफी कम था। कॉल दर प्रति मिनट 4 रुपये थी और ग्राहक आधार कुछ लाख तक ही सीमित था।

सच्चाई यह है कि भारत को लेकर जताए गए ज्यादातर पूर्वानुमान बहुत आश्चर्यजनक नहीं थे। उदाहरण के लिए अमेरिका और यूरोपीय निवेश बैंकों की रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय कंपनियों की इक्विटी से मामूली प्रतिफल मिलने और विकास दर के 6-7 प्रतिशत तक रहने की उम्मीद जताई गई है।

शेयर कीमतों को लेकर जताए गए पूर्वानुमान भी सीमित थे और कुछ लोग ही सेंसेक्स के 5 अंकों में पहुंचने की भविष्यवाणी करने का साहस रखते थे। हालांकि इसके दो अपवाद भी थे- इनमें से एक गोल्डमैन सैक्स की ब्रिक रिपोर्ट थी। यह पता लगाना उपयोगी होगा कि आखिर ज्यादातर पूर्वानुमान सटीक क्यों नहीं बैठते हैं।

नई गतिविधियों को बढ़ावा देने वाले रुझानों की शुरुआत 1990 के दशक में कब हुई? आखिर तत्कालीन रुझानों के विपरीत ब्रिक जैसे पूर्वानुमान सही कैसे साबित हुए? चलिए बिक्र की रिपोर्ट से शुरुआत करते हैं। सच पूछिए तो ऐसा लगता है कि इसके अनुमान व्यापक आर्थिक और जनसांख्यिकीय बदलावों जैसे बड़े परिदृश्य पर आधारित थे।

बिक्र ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में वास्तविक और बड़े बदलावों की बात की जो आने वाले वर्षों के दौरान होने वाले थे। खासतौर से भारत और ब्राजील के लिए इन बदलावों में जनसांख्यिकीय गठन में अनुकूल परिवर्तन (कार्यशील लोगों की बढ़ती हिस्सेदारी) और विकास शामिल हैं।

मेरी दलील है कि पिछले दशक के दौरान सेवा और विनिर्माण क्षेत्र दोनों में ही भारत की सफलता का प्रमुख कारण इस जनसांख्यिकीय बदलाव की पहली खेप थी, जिसके कारण तुलनात्मक रूप से सस्ता लेकिन कुशल श्रम उपलब्ध हो सका। इस बात पर अब आम सहमति है कि सकारात्मक जनसांख्यिकीय रुझान नये दशक में भी जारी रहेंगे। असली चुनौती अर्थव्यवस्था के उस हिस्से की पहचान करने की है जो सबसे अधिक प्रभावित होगा।

अब मुझे एक अनुमान जताने का जोखिम उठाने की इजाजत दीजिए। यह माना जा रहा है कि अगले दशक के दौरान 'नॉलेज आउटसोर्सिंग' में विस्तार का एक और बड़ा चरण देखने को मिलेगा। भारत में सभी तरह की सस्ती उपभोक्ता वस्तुओं (जैसे सस्ती कार और कंप्यूटर) के लिए शोध और विकास का एक प्रमुख केंद्र बनने की क्षमता है। ऐसे उत्पादों की अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया मांग होगी।

हम जानते हैं कि यूरोप और जापान में वृद्ध लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। वर्ष 2009 में जापान में वृद्ध निर्भरता अनुपात 35 प्रतिशत था और इसमें तेजी से बढ़ोतरी होगी। दूसरी ओर भारत में यह अनुपात 7 प्रतिशत है। ऐसे में अगर कुछ गैर-तटकर बाधाओं को हटा दिया जाए तो भारत और इन अर्थव्यवस्थाओं के बीच सेवाओं का व्यापार तेजी से बढ़ेगा।

मुझे लगता है कि इन क्षेत्रों के लिए भारत से स्वास्थ्य सेवा उत्पादों के निर्यात में तेजी से बढ़ोतरी होगी। एक साहसी (और शायद अनोखा पूर्वानुमान) पूर्वानुमान यह भी है कि जनसांख्यिकीय संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय श्रम बाजार के नियमनों में बुनियादी बदलाव देखने को मिलेंगे। वर्ष 2019 तक जापान और यूरोप में भारतीय परिचालिकाओं, ड्राइवरों और इलेक्ट्रिशियनों की भारी मांग होगी।

नए दशक में दूसरा व्यापक रुझान 'वैश्विक पुनर्संतुलन' के रूप में देखने को मिलेगा। इसका अर्थ है कि एशिया का फोकस एक निर्यात केंद्र के रूप में घटेगा और वह घरेलू बाजारों के लिए आपूर्ति करता हुआ दिखाई देगा। एशियाई फर्मों द्वारा अमेरिकी उपभोक्ताओं को  रिझाने की जगह अब एशियाई उपभोक्ता वैश्विक मांग को दिशा देते हुए दिखाई देंगे।

चीन और दूसरे पूर्वी एशियाई देश अब अपने बाजारों पर ही फोकस कर रहे हैं। ऐसे में क्षेत्र के भीतर ही उपभोक्ता वस्तुओं के लिए मांग तेजी से बढ़ेगी। ऐसे में इस क्षेत्र में भारत के प्रभाव को देखते हुए भारतीय फर्मों के लिए अवसरों में तेजी से बढ़ोतरी होगी, लेकिन स्थानीय फर्मों के साथ ही अमेरिकी फर्मों से बढ़ी हुई प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा।

अब मैं कुछ ऐसी बातों का जिक्र करना चाहूंगा जिन्होंने पिछले दशक के दौरान बड़े बदलाव किए लेकिन शुरुआत में पूर्वानुमानों के राडार उन्हें पकड़ने में असफल रहे। इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण सेल्युलर दूरसंचार है। किसी भी पूर्वानुमान में इस बात की उम्मीद नहीं जताई गई थी कि दूरसंचार घनत्व में इतनी तेज बढ़ोतरी होगी।

एक दशक में दूरसंचार घनत्व में आश्चर्यजनक वृद्धि (1 करोड़ से 50 करोड़) से हमें पता चलता है कि किसी भी अर्थव्यवस्था में नई प्रौद्योगिकी को हमारी उम्मीद के मुकाबले कहीं अधिक तेजी से अपनाया जा सकता है। हालांकि इसके लिए नियमनों को सही दिशा दी जाए और एक प्रतिस्पर्धी बाजार तैयार किया जाए। इसके मद्देनजर नए दशक में विकास के परिदृश्य को साकार करने के लिए नई प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने जरूरी है।

ऐसे में हम किसका अनुसरण करें? मैं इस क्षेत्र का विशेषज्ञ नहीं हूं, लेकिन मैं इंटरनेट इस्तेमाल करने के रुझानों को बेहद बारीकी से देख रहा हूं। इंटरनेट घनत्व अभी भी कम है। भारत में इंटरनेट घनत्व 6 प्रतिशत है। चीन में यह आंकड़ा करीब 25 प्रतिशत है। नए दशक में इस क्षेत्र में काफी हलचल देखने को मिलेगी।

अंत में, पिछले दो दशक के रुझान हमें बताते हैं कि भारतीय विनिर्माण क्षेत्र को कमतर नहीं आंकना चाहिए। स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना के कुशल इस्तेमाल और ठेका मजदूरी के चलन से साफ है कि नये दशक में भारतीय विनिर्माण क्षेत्र अवरोधक श्रम कानूनों के बावजूद मजबूत होकर उभरेगा।

वर्ष 2005 में मैंने जिन 1500 विनिर्माण फर्मों का सर्वेक्षण किया था, उसके मजदूरी और वेतन तथा बिक्री का अनुपात 1998-99 के 5.3 प्रतिशत के मुकाबले घटकर 4.4 प्रतिशत हो गया है। इसका अर्थ है कि परिचालन लागत में 1 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। हालांकि कुछ चिंताएं भी हैं। इसमें कुशल श्रम और जमीन की कमी शामिल हैं।

भारतीय विनिर्माताओं को इन बाधाओं का सामना कर पड़ता है। हालांकि भारतीय फर्म जल्द ही इसका कोई समाधान तलाश लेंगी। यह एक ऐसी भविष्यवाणी है, जिसके बारे में मुझे पक्का यकीन है।

(लेखक एचडीएफसी बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री हैं। विचार उनके अपने हैं।)

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