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नए साल में उम्मीदें बेहतर, पर बाजार में तेजी रहेगी कमतर
बकौल विश्लेषक वित्त वर्ष 2011 में कंपनियों के मुनाफे में आएगी 25-30 फीसदी की तेजी, लिहाजा वित्त वर्ष 2011 के अंत तक सेंसेक्स करेगा 15 के औसत पीई पर कारोबार
बीजी शिरसाठ और अशोक दिवासे /  December 28, 2009

निवेशकों के लिए वर्ष 2010 बेहतर रहने की उम्मीद है, पर मौजूदा साल में 9 मार्च के बाद बाजार में आई जबरदस्त तेजी के मुकाबले अगला साल थोडा सुस्त रह सकता है।

बढ़त के लिहाज से देखें तो वर्ष 1991 के बाद 2009 अब तक का सबसे बेहतर साल रहा है, जिसमें सेंसेक्स में सौ फीसदी तक की तेजी देखी गई। हालत यह है कि इस समय 17,400 के स्तर पर 30 शेयरों वाला बीएसई सेंसेक्स पिछले 12 महीनों के शुध्द मुनाफे के दम पर 22 से अधिक के प्राइस-टू-अर्निंग अनुपात (पीई) पर कारोबार कर रहा है।

वित्त वर्ष 2009-10 के अनुमानित मुनाफे पर पीई अनुपात फिसलकर 19 के आसपास आ सकता है। वित्त वर्ष 2010-11 के अंत तक सेंसेक्स के 15 के औसत पीई पर कारोबार करने की संभावना है। इसकी वजह यह है कि विदेशी और घरेलू इक्विटी विश्लेषकों का मानना है कि भारतीय कंपनियों के शुध्द मुनाफे में वित्त वर्ष 2011 के अंत में 25-30 फीसदी की बढ़ोतरी हो सकती है।

विश्लेषकों के अनुसार वित्त वर्ष 2010 और वित्त वर्ष 2011 की अनुमानित आय के लिए बाजार का मूल्यांकन क्रमश: 19 और 14.8 गुना के स्तर पर किया जा रहा है। बाजार में आय अर्जित करने की संभावनाएं सीमित नजर आ रही हैं, जिस वजह से मुनाफे के लिए यह पूरी तरह से विदेश से आने वाले पूंजी प्रवाह पर निर्भर रहेगा।

विदेश से आने वाले फंड वैश्विक परिस्थितियों के रुख पर निर्भर करेंगे। मोतीलाल ओसवाल के विश्लेषकों के अनुसार वित्त वर्ष 2011 में सेंसेक्स के 25-30 फीसदी मुनाफा अर्जित करने के बाद भी इस बात की संभावना कम ही है कि अगले 12 महीनों में यह 21,000 अंक के स्तर को पार कर पाने में सफल हो पाएगा।

आय की बेहतरीन संभावनाओं के बावजूद महंगाई से जुड़ी चिंताएं और मौजूदा मूल्यांकन की वजह से बाजार की तेजी पर लगाम लग सकती है। वित्त वर्ष 2009 और 10 के दो सालों की अर्निंग ग्रोथ हॉलिडे के बाद वित्त वर्ष 2011 में सेंसेक्स ईपीएस में 29 फीसदी की बढ़ोतरी हो सकती है। हालांकि, इसके बाद सेंसेक्स वापस अपनी लंबी अवधि की औसत विकास दर 15-20 फीसदी के क रीब आ सकती है।

क्रेडिट सुइस के विश्लेषकों के अनुसार वित्त वर्ष 2011 की पहली तिमाही कमोबेश कमजोर रह सकती है, क्योंकि इसी अवधि के  दौरान राहत पैकेजों की वापसी और वैश्विक स्तर पर नकदी में हुई आवश्यकता से अधिक की बढ़ोतरी निवेशकों का कारोबारी जज्बा प्रभावित कर सकता है। विश्लेषकों के अनुसार इस वित्त वर्ष में सरकार बाजार में कई सुधार की प्रक्रिया लागू कर सकती है।

दिसंबर 2010 में सेंसेक्स का आधार 19,000 माना जा रहा है। अगर आय में और ज्यादा बढ़ोतरी हुई तो वित्त वर्ष 2011 के अंत तक सेंसेक्स 22,000 के स्तर को छू सकता है। मेरिल लिंच के विश्लेषकों की मानें तो इसमें कोई शक नहीं कि मूल्यांकन में काफी बढ़ोतरी हुई है पर अभी भी यह खतरे के निशान से नीचे है।

बाजार एक साल के फॉरवर्ड ट्रेडिंग के 19 गुना पर कारोबार कर रहा है, जो लंबी अवधि के औसत 14.7 गुना से कहीं अधिक है। पत्रों का प्रवाह अधिक रहने की संभावना जताई जा रही है। इससे बाजार में मौजूद अतिरिक्त नकदी को कम करने में मदद मिलेगी, साथ ही सेकंडरी बाजार पर भी नियंत्रण रखा जा सकेगा।

तेल की बढ़ती कीमतें देश की अर्थव्यवस्था के लिए चिंता की वजह हो सकती है। महंगाई, जिसके मार्च 2010 तक 8 फीसदी रहने की संभावना है, बाजार के लिए हमेशा नकारात्मक रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक आगे चलकर राहत पैकेजों के वापस लिए जाने का संकेत दे रहा है और महंगाई के बढ़ने के साथ ही जनवरी में सीआरआर रेपो दरों में कटौती की जा सकती है।

इससे भी कहीं इस बात की प्रबल संभावना है कि सरकार ने अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए इस साल जिन राहत पैकेजों की घोषणा की है, उसमें उत्पाद शुल्क में बढ़ोतरी के रास्ते से कमी कर सकती है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या वर्ष 2010 में बाजार अपने सर्वोच्च स्तर पर पहुंचने में कामयाब होगा?

वैश्विक स्तर पर बाजार में नकदी के आसानी से उपलब्ध होने की वजह से शेयर बाजार अपने पहले के सर्वोच्च स्तर पर पहुंच सकते हैं, लेकिन इस बात की उम्मीद कम ही है कि इस स्तर पर बाजार ज्यादा समय तक टिक पाएगा।

अगर पुराने रिकॉर्ड पर नजर दौडाएं तो ऐसा दो बार हुआ है, जब बाजार में 50 फीसदी से अधिक की गिरावट आई है और अपने पुराने स्तर पर पहुंचने में इसे क्रमश: 294 और 571 दिन लग गए। इसे इस बात के संकेत के तौर पर देखा जा सकता है कि  मई 2010 और जून 2011 के बीच की अवधि में बाजार अपने पुराने सर्वोच्च स्तर पर वापस आ सकता है।

दिलचस्प बात है कि इन दोनों मौकों पर बाजार के प्रतिफल में अगले छह महीनों के लिए 30-40 फीसदी तक की गिरावट आई है। मध्य जुलाई और 7 सितंबर के  बीच की अवधि में 15,100-16,000 के बीच कारोबार करने के बाद बीएसई सेंसेक्स ने अंतत: इसे पार कर ऊपरी दायरे के ऊपर बंद हुआ है।

इस साल 9 मार्च को सबसे निचले स्तर पर पहुंचने के बाद न सिर्फ सेंसेक्स में दोगुनी बढ़ोतरी हुई है, बल्कि पीई अनुपात भी 100 फीसदी की तेजी के साथ इस समय 22 के स्तर पर पहुंच चुका है। नवंबर-दिसंबर 2009 की शोध रिपोर्ट के अनुसार सेंसेक्स में शामिल कंपनियों के शुध्द मुनाफे में मौजूदा वित्त वर्ष में 11 फीसदी की बढ़ोतरी हो सकती है, जो वित्त वर्ष 2009 में अर्जित शुध्द मुनाफे से अधिक होगी।

दूसरी तरफ वित्त वर्ष 2010-11 में शुध्द मुनाफे में 25 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो सकती है। बैंक, पूंजीगत वस्तुओं, निर्माण, त्वरित उपभोक्ता वस्तुओं और तेल शोधक कंपनियों के 2010 फॉरवर्ड अर्निंग में अच्छी-खासी बढ़ोतरी हो सकती है।

दिलचस्प बात यह हो सकती है कि वित्त वर्ष 2011 में सेंसेक्स की आय में बढ़ोतरी में कमोडिटी शेयरों, मसलन हिंडाल्को, स्टरलाइट, टाटा स्टील, रिलायंस और टाटा स्टील की अहम भूमिका होगी और इन सभी के मुनाफे में 30-60 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो सकती है। टाटा मोटर्स और रियल्टी कंपनी डीएलएफ के शुध्द मुनाफे में खासी तेजी आने की संभावना है।

एफएमसीजी और सूचना-प्रौद्योगिकी कंपनियों के शुध्द मुनाफे में वित्त वर्ष 2011 में सामान्य बढ़ोतरी होने की गुंजाइश है। पिछले कुछ महीनों में सेकंडरी बाजार में शुध्द संस्थागत पूंजी प्रवाह के साथ भारतीय बाजार ने काफी हद तक समीपता दिखाई है।

कोटक सिक्योरिटीज के एक विश्लेषक का कहना है कि सेकंडरी मार्केट में शुध्द संस्थागत निवेश का प्रवाह अपने चरम पर होने के समय बाजार ने काफी अच्छा प्रदर्शन किया है।

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