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ढाका के 'थान' से दिल्ली हलकान
किफायती उत्पादन और शून्य शुल्क का फायदा उठाकर कपड़ा निर्यात में भारत को पछाड़ गया बांग्लादेश
देविका बनर्जी / नई दिल्ली December 28, 2009

आखिरकार इस साल कपड़ा निर्यात के मामले में बांग्लादेश ने भारत को पटखनी दे ही दी।

साल के पहले 9 महीनों में भारत से 227 करोड़ डॉलर का कपड़ा निर्यात हुआ हैं वहीं इस दौरान बांग्लादेश से 266 करोड़ डॉलर मूल्य के कपड़ों का निर्यात हुआ। पिछले साल दोनों देशों ने तकरीबन 109 करोड़ डॉलर के कपड़ों का निर्यात किया था। पिछले साल तक दोनों देशों की कपड़ों के कुल वैश्विक बाजार में 3-3 फीसदी हिस्सेदारी थी।

जहां तक भारत की बात है तो इस साल मात्रा के हिसाब से निर्यात में 80 फीसदी की गिरावट आई है। इसकी दो प्रमुख वजह रही हैं। पहली तो रही आर्थिक मंदी। मंदी के दौर में खरीदारों ने सस्ते सौदों को तरजीह दी और इस मामले में भारतीय निर्यातक पिछड़ गए और बांग्लादेश, वियतनाम तथा श्रीलंका बाजी मार गए।

बांग्लादेश में कपड़ा निर्यातकों को मिल रही सहूलियतें इसकी दूसरी वजह रहीं। इन रियायतों से आकर्षित होकर कई भारतीय कंपनियों ने बांग्लादेश में भी परिचालन शुरू कर दिया है। इनमें कई दिग्गज वस्त्र निर्माता भी शामिल हैं। जिनमें आप पर्ल फैशन्स और रेमंड का नाम ले सकते हैं। पर्ल की यहां पर दो इकाई और रेमंड की एक इकाई हैं। कई और देसी कंपनियों की यहां मौजूदगी है।

ओरिएंट क्राफ्ट्स एक्सपोट्र्स के प्रबंध निदेशक सुधीर ढींगरा का कहना है, 'बांग्लादेश में ज्यादातर उत्पादों की लागत 9 से 29 फीसदी कम बैठती है। यहां से यूरोपीय देशों को निर्यात करने पर कुछ भी शुल्क नहीं लगता और मजदूरी भी सस्ती है। ऐसे में किसी को भी भारत के बजाय बांग्लादेश से निर्यात करना ज्यादा फायदेमंद साबित होगा।'

हाउस ऑफ पर्ल फैशन्स के अध्यक्ष दीपक सेठ कहते हैं, 'कंपनी की बांग्लादेश इकाई बढ़िया प्रदर्शन कर रही है। कंपनी अगले वित्तीय वर्ष से बांग्लादेश में अपनी गतिविधियां और बढ़ाएगी।' सेठ का कहना है कि भारत की तुलना में बांग्लादेश में मजदूरी 50 फीसदी तक सस्ती है। बांग्लादेश सरकार इस क्षेत्र पर बहुत ध्यान दे रही है।

बांग्लादेश के अलावा पर्ल की इंडोनेशिया और वियतनाम में भी उत्पादन इकाइयां मौजूद हैं। हालांकि जानकारों के मुताबिक ऐसा भी नहीं है कि बांग्लादेश में देसी कंपनियों की मौजूदगी बहुत आम हो गई है। सलाहकार संस्था टेक्नोपार्क के अध्यक्ष प्रकाश अग्रवाल कहते हैं, 'बांग्लादेश में इकाई लगाने के कुछ फायदे जरूर हैं लेकिन कुछ बड़ी कंपनियों ने ही ऐसा किया है। बहुत ज्यादा छोटी कंपनियां ऐसा नहीं कर रही हैं।'

भारतीय कपड़ा उद्योग परिसंघ (सिटी) के महासचिव डी के नायर कहते हैं कि कुछ भारतीय कंपनियों ने जरूर बांग्लादेश में शुरुआत की है लेकिन ऐसे बहुत ज्यादा मामले नहीं हैं। मझोली और छोटी कंपनियों को यह विचार नहीं लुभा रहा है।

भारत में कपड़ा उद्योग के सामने कई मुश्किलें हैं। इनमें एक है कपड़े की कीमत जिसके भाव लगभग 51 फीसदी तक चढ़ चुके हैं। साथ ही देश से कपास निर्यात में हो रही तेजी से भी कपड़ा उत्पादकों की राह मुश्किल हो रही है।

कपड़े पर छूटी पकड़

कपड़ा निर्यात में पहली बार भारत से आगे निकला बांग्लादेश
मंदी में किफायत के मोर्चे पर पिछड़े देसी निर्यातक
बांग्लादेश में सस्ती लागत और निर्यात पर शुल्क नहीं
कई देसी कंपनियों ने भी बना लिया बांग्लादेश को अपना नया अड्डा

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