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क्या दवाओं की कीमत पर नियंत्रण जरूरी है?
जिरह
बीएस संवाददाता /  December 24, 2009

सरकार ने बोझ बढ़ाने की कोशिश की है
दारा बी पटेल
महासचिव, इंडियन ड्रग्स मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन

नैशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसंस (एनएलईएम) के तहत जरूरी दवाओं की सूची में विस्तार किए जाने का प्रस्ताव एक प्रतिकूल कदम है। यह उद्योग एकतरफा कीमत नियंत्रण की मार पहले से ही झेल रहा है और शायद यह ऐसा एकमात्र उद्योग है जिसमें उत्पादन लागत और प्रॉफिट मार्जिन दोनों नियंत्रित हैं।

एनएलईएम-2003 की चयन शर्तों में कहा गया है, 'जरूरी दवाओं का चयन बीमारी की प्रबलता, प्रभावोत्पादकता और सुरक्षा पर प्रमाणन, और प्रतिस्पर्धी  तुलनात्मक लागत प्रभावशीलता को ध्यान में रखते हुए किया गया।' इसमें यह सुनिश्चित किया गया कि जरूरी दवाएं हर समय कार्यशील स्वास्थ्य प्रणालियों के दायरे में पर्याप्त मात्रा में मौजूद हों।

हालांकि ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (डीपीसीओ) की स्थापना दवाओं की उपलब्धता और पहुंच सुनिश्चित करने के लिए की गई। डीपीसीओ की वजह से दवाओं की कीमतें काफी नीचे आ गई थीं। इसने कीमतों को उस स्तर तक नीचे ला दिया जिसमें कंपनियां आपूर्ति करने में भी सक्षम नहीं थीं। इसके विपरीत इस अभियान ने मरीजों को नुकसान पहुंचाया।

इसे लेकर पारदर्शिता का अभाव था कि डीपीसीओ के तहत कीमत कितनी तय की गई है। सरकार ने महंगाई, श्रम लागत, कच्चे माल की लागत और बिजली, पानी, फर्नेस ऑयल, पेट्रोल, डीजल आदि की लागत में बढ़ोतरी पर विचार किए बगैर स्वयं ही निर्णय लिया।

रोजमर्रा की जरूरत की वस्तुओं या सेवाओं - भोजन, शरण स्थल, परिधान, परिवहन, संचार, शिक्षा या चिकित्सक की फीस और अस्पताल का शुल्क - की कीमत को नियंत्रित नहीं किया गया है। इसलिए सिर्फ दवाओं पर कीमत नियंत्रण क्यों थोपा जाना चाहिए?

इसके अलावा अत्यधिक नियंत्रण का उपचार के खर्च पर भी विपरीत असर पड़ेगा। कीमत-नियंत्रित उत्पादों में पर्याप्त मार्जिन के अभाव की वजह से नियंत्रण-मुक्त उत्पादों को बढ़ावा मिलेगा। निवेश में कमी आएगी और निर्माता रोजगार को बढ़ावा देने के लिए या प्रतिभाओं को आकर्षित करने में विफल रहेंगे। 

अब सरकार ने और अधिक दवाओं को इस नियंत्रण के तहत लाकर बोझ बढ़ाने की कोशिश की है। वास्तविकता यह है कि महज कुछ दवाओं को छोड़ कर, सभी दवाएं नियंत्रित हैं। नॉन-शिडयूल्ड ड्रग श्रेणी में सालाना तौर पर कीमत बढ़ोतरी में 10 फीसदी की उच्चतम सीमा पहले ही लगाई जा चुकी है।

सरकार द्वारा ऐसे नियंत्रिण से दवा उद्योग के विकास को नुकसान पहुंचेगा और उसी तरह की स्थिति पैदा हो सकती है जैसी कि 70 के दशक में देखी गई थी। उस समय देश अधिक कीमतों पर दवाओं के आयात पर निर्भर हो गया था।

डीपीसीओ की समीक्षा किए जाने की है दरकार
लीना मेंघानी
इंडिया कॉ-आर्डिनेटर, केम्पेन फॉर एक्सेस टु एशेंयिल मेडिसिंस

एसेंशियल ड्रग्स लिस्ट (ईडीएल) सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति का एक महत्वपूर्र्ण औजार है। यह सरकार, खासकर स्वास्थ्य मंत्रालय, द्वारा अपने नागरिकों की स्वास्थ्य समस्याओं और स्वास्थ्य जरूरतों के लिए जरूरी दवाओं और टीकों के चयन में अहम भूमिका निभाता है।

चिकित्सा क्षेत्र- सार्वजनिक एवं निजी- द्वारा दवाओं के सही चयन और इस्तेमाल के लिए नीतियों के कार्यान्वयन, कीमत निर्धारण और खरीद आदि के बारे में सरकार के फैसलों में ईडीएल प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा होता है।

ईडीएल की सूची में शामिल दवा और टीके घरेलू रूप से हर समय और पर्याप्त मात्रा में, उचित खुराक में, और मरीजों एवं सरकार दोनों के लिए किफायती कीमतों पर उपलब्ध होने चाहिए। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) एक मॉडल ईडीएल प्रकाशित करता है जिसमें प्रमुख और पूरक सूची शामिल होती है। यह सूची नियमित तौर पर अद्यतन की जाती है। इससे देशों को अपनी राष्ट्रीय सूचियां बनाने में मदद मिलती है।

कुछ वर्षों से भारत ईडीएल को लेकर कुछ लापरवाही बरत रहा था। इसलिए जरूरी दवाओं के मूल्य निर्धारण से जुड़े एक अदालती मामले में भारत की 2003 की नैशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसंस (एनएलईएम) में संशोधन की मांग की गई। इस पर पालन किए जाने की दिशा में उन उपायों के लिए एनएलईएम से जुड़ना बेहद जरूरी है जो भारत में मरीजों के लिए जरूरी दवाएं और टीके उपलब्ध कराएंगे।

एक महत्वपूर्ण तरीका यह सुनिश्चित करना है कि ये जरूरी दवाएं और टीके सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के जरिये उपलब्ध हों। इसका मतलब सार्वजनिक स्वास्थ्य बजट के लिए पर्याप्त बचत हो सकता है। ईडीएल के इस्तेमाल के जरिये दवाओं के चयन और इन दवाओं की खरीदारी से लाभ होगा। हालांकि भारत में विभिन्न राज्यों द्वारा, तमिलनाडु जैसे कुछ राज्यों को छोड़ कर, दवाओं की खरीद ईडीएल के जरिये अनिवार्य नहीं है।

दूसरा महत्वपूर्ण उपाय भारत की मूल्य निर्धारण नीति के लिए एनएलईएम से जुड़ना है जो निजी स्वास्थ्य क्षेत्र में जरूरी दवाओं की कीमतें नियंत्रित और नियमित करती है। इस संदर्भ में यह जरूरी है कि आवश्यक दवाओं की कीमतें नियंत्रित करने के लिए एसेंशियल कमोडिटीज ऐक्ट, 1955 की धारा 3 के तहत सरकार द्वारा जारी किए गए आदेश 'ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर' (डीपीसीओ) की समीक्षा की जानी चाहिए और इसे कार्यान्वित किया जाना चाहिए।

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