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टायर कंपनियां-बढ़ती लागत का दर्द
दिशासूचक
विशाल छाबड़िया और सुनयना वासुदेव /  December 23, 2009

टायर निर्माताओं के लिए यह साल इनपुट लागत में कमी और मार्जिन में बढ़त की वजह से अच्छा ही रहा।

वाहनों की बिक्री में तेजी आने से टायर की मांग भी बढ़ी। टायर कंपनियों के शेयरों का प्रदर्शन बेहतर रहा। सेंसेक्स के 70 फीसदी बढ़ोतरी के मुकाबले पिछले एक साल में टायर निर्माताओं के शेयर में 140-250 फीसदी तक की बढ़त हुई है।

30 सितंबर 2009 को खत्म हुए साल में एमआरएफ के शानदार प्रदर्शन में, कम लागत और मांग में सुधार से मिलने वाली बढ़त नजर आई। एमआरएफ के कर के बाद मुनाफे में सालाना 75 फीसदी तक की बढ़त हुई और यह 250 करोड़ रुपये हो गया। इस बेहतर प्रदर्शन की घोषणा सोमवार को की गई।

इसकी वजह है कि बिक्री में 12 फीसदी तक की उछाल आई और यह 5668 करोड़ रुपये हो गया। रबर की कम कीमतों की वजह से इसके कच्चे माल की लागत में 1.4 फीसदी तक की गिरावट आई जिससे परिचालन लाभ मार्जिन में 4 फीसदी की तेजी आई और यह 13 फीसदी हो गया।

अपोलो टायर के शुद्ध लाभ में तेजी देखी जा रही है। इसमें करीब 249 फीसदी तेजी आई और सितंबर को खत्म हुए 12 महीने में यह 197 करोड़ रुपये हो गया। इसकी वजह यह थी कि इसका परिचालन लाभ मार्जिन दोगुने से ज्यादा होकर 33 फीसदी हो गया और बिक्री में भी 16.7 फीसदी हो गया।

दूसरी ओर इस अवधि के दौरान सिएट में जबरदस्त बदलाव देखा गया और इसका शुद्ध लाभ 122 करोड़ रुपये हो गया। जबकि सितंबर 2008 तक इसके एक साल में 39.5 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था।

नतीजे की घोषणा के बाद एमआरएफ के शेयर में लगभग 7 फीसदी तक की कमी आई। बाजार में इसके भविष्य को लेकर काफी चिंता थी। रबर की कीमतों में तेजी तो आई लेकिन सितंबर 2008 की सबसे ऊंची कीमतों के मुकाबले यह 8 फीसदी कम थीं। 

दूसरी टायर कंपनियों के शेयरों पर भी दबाव देखा गया। इससे यह संकेत मिलता है कि कच्चे माल की ज्यादा लागत का असर मुनाफे पर पड़ सकता है। पिछले महीने एमआरएफ को छोड़कर अपोलो टायर, सिएट और जेके टायर के शेयरों का प्रदर्शन सेंसेक्स के मुकाबले 6.5 फीसदी और बीएसई ऑटो सूचकांक के मुकाबले 12 फीसदी कम रहा।

रबर की कीमतें बहुत राहत देती नजर नहीं आ रही हैं। उद्योग का परिचालन साल की पहली छमाही में लगभग 14 फीसदी एबिटा मार्जिन स्तर पर हो रहा है। हालांकि इसके आधे होने की उम्मीद है अगर टायर कंपनियां बढ़ती हुई लागत का भार ग्राहकों पर न डालें।

हालांकि विश्लेषकों को ऐसा यकीन है कि मांग की वजह से कीमतों में तेजी आ सकती है और इससे कुछ हद तक मार्जिन में रोक लग सकती है। साल के बाकी बचे हुए पल में औसतन परिचालन लाभ मार्जिन करीब 8-10 फीसदी पर रहने की उम्मीद है। कच्चे माल की लागत वैसे तो स्थिर है लेकिन इसमें तेजी आ सकती है।

वर्ष 2007-08 में कुल भारतीय ट्रकों और बस टायर के बाजार में आयात का हिस्सा लगभग 8 फीसदी था और कीमतों के लिहाज से यह सेगमेंट सबसे चिंताजनक स्थिति में है। भारतीय ट्रकों और बसों के टायर के मुकाबले चीनी आयात 10-30 फीसदी सस्ता है। हालांकि मांग ज्यादा होने की वजह से सरकार ने एंटी डंपिंग शुल्क नहीं लगाया है।

उम्मीद है कि वर्ष 2010-11 के अंत में क्षमता लगभग दोगुनी होकर 20-25 लाख टायर हो जाएगी। हालांकि भारतीय टायर निर्माताओं के मार्जिन को बचाने के लिए आयात शुल्क लगाना जरूरी हो जाएगा। अपोलो टायर और जेके टायर ने समय-समय पर विदेशों में अधिग्रहण किया है।

अगर विदेशों की अर्थव्यवस्था में सुधार होता है तो उन्हें ज्यादा फायदा हो सकता है। घरेलू खिलाड़ियों का मुनाफा उनकी इस क्षमता पर निर्भर करता है कि वे कैसे इनपुट लागत की बढ़ोतरी को ग्राहकों पर डालते हैं और कीमतों का बेहतर प्रबंधन कर पाते हैं। 

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