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भारती शिपयार्ड की मुश्किल होती डगर
अभिनीत कुमार / मुंबई December 22, 2009

विश्लेषकों की मानें तो भारती शिपयार्ड को अब अगले छह महीनों तक कार्यशील पूंजी के मामले में दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है।

दरअसल, वह अपनी प्रतिद्वंद्वी ग्रेट ऑफशोर के अधिग्रहण करने वाली है। इस कंपनी के अधिग्रहण के लिए भारती शिपयार्ड को काफी मशक्कत करनी पड़ी थी। छह महीनों तक चली इस जंग में भारती शुरुआत में प्रति शेयर 344 रुपये का ओपन ऑफर लेकर आई थी।

हालांकि, बाद में इसे अपने ओपन ऑफर को 590 रुपये प्रति शेयर के स्तर तक लेकर आना पड़ा था। इससे कंपनी पर लागत का बोझ 200 करोड़ रुपये तक बढ़ गया है। इस जंग में मुंह की खाने के बाद भारती की प्रतिद्वंद्वी एबीजी शिपयार्ड ने ग्रेट ऑफशोर में अपनी 8.2 फीसदी हिस्सेदारी बेच दी थी।

भारती ग्रेट ऑफशोर में पहले ही 22.4 फीसदी की हिस्सेदारी हासिल कर चुकी है। बाकी की 20 फीसदी की हिस्सेदारी हासिल करने के लिए भारती शिपयार्ड अपने अंदरुनी स्रोतों और कर्ज से रकम जुटाएगी। ऐंजल ब्रोकिंग में विश्लेषक परम देसाई ने बताया कि, 'इस ओपन ऑफर के पूरा होने के बाद उसके ऊपर मौजूद कर्ज का बोझ उसकी इक्विटी के मुकाबले दोगुना हो जाएगा।'

बीते वित्त वर्ष की बैलेंस शीट के मुताबिक कंपनी के ऊपर तब 1,003.4 रुपये का कर्ज था, जबकि उसके पास मौजूद इक्विटी 702.6 करोड़ रुपये की थी। बाकी की 20 फीसदी की हिस्सेदारी हासिल करने के लिए कंपनी 440 करोड़ रुपये की जरूरत होगी। इक्विटी के मुकाबले कर्ज दोगुना होने पर कंपनी के लिए और कर्ज इकट्ठा करना मुश्किल हो जाएगा।

आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज़ में विश्लेषक जहांगीर आदि मास्टर ने बताया कि, 'इससे कंपनी का ब्याज पर होने खर्च और बढ़ जाएगा। इस कारण कंपनी की कार्यशील पूंजी की जरूरत बढ़ सकती है।' शुक्रवार तक भारती शिपयार्ड की बाजार पूंजी 599 करोड़ रुपये की थी, जबकि ग्रेट ऑफशोर की बाजार पूंजी 1,891 करोड़ रुपये की थी।

Keyword: Bharti Shipyard, great offshore, acquisition, open offer, angel broking,
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