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तेलंगाना के बाद गरमाई विदर्भ की मांग
आमची मुंबई
सुशील मिश्र और अरुण यादव /  12 20, 2009

अलग तेलंगाना राज्य बनाए जाने की तैयारी के साथ ही विदर्भ में भी राज्य की मांग तेज हो गई है।

अलग विदर्भ राज्य बनने को लेकर राजनीतिक दलों और राजनेताओं में मतभेद है क्योंकि सबके अपने अपने फायदे और नुकसान जुड़े हुए हैं। अलगाववाद की यह आवाज कोई नई नहीं है लेकिन इस समय मांग जोर पकड़ने की मुख्य वजह विदर्भ का पिछड़ापन है।

देश के नक्शे में कभी सबसे संपन्न खेतिहार पट्टी के रूप में मशहूर विदर्भ आज अन्नदाताओं की आत्महत्या के लिए जाना जाता है। जिसकी वजह गरीबी और कर्ज में किसानों का डूबा होना माना जा रहा है। कपास, गन्ना, अंगूर और सोयाबीन जैसी कीमती फसलों के होने के बाद भी इस क्षेत्र के किसान मौत को गले लगा रहे हैं।

इसकी मुख्य वजह पिछले कुछ सालों से सूखे की वजह से फसल की सही तरीके से पैदावार न होना है। सबसे ज्यादा फायदे का सौदा मानी जाने वाली कपास की फसल आज घाटे का सौदा बन गई है क्योंकि विदर्भ के किसानों को सीधे अमेरिका जैसे विकसित देशों के किसानों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है।

अमेरिकी सरकार द्वारा दी जा रही सुविधाओं की वजह से वहां के किसान सस्ती दर पर कपास की बिक्री करते हैं जबकि सुविधाओं के अभाव में विदर्भ के किसानों को लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है। अच्छे भविष्य की चाह में यहां के किसानों ने साहूकारों और सहकारी बैंकों से कर्ज लिया जिसको समय पर न दे पाने की वजह से वह साल दर साल कर्ज के दलदल में फंसते गए।

कर्ज और गरीबी से छुटकारा पाने के लिए किसानों को सबसे से आसान तरीका आत्महत्या ही लगता है। किसानों की इस मनोदशा को देखते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तीन साल पहले इस इलाके का दौरा किया था और विदर्भ को 3750 करोड़ रुपये का राहत पैकेज दिया था। इस राहत पैकेज के अलावा कर्ज माफी के लिए 712 करोड़ रुपये और दिये गए थे।

केन्द्र सरकार के राहत पैकेज के साथ राज्य सरकार ने भी यहां के विकास के लिए 1200 करोड़ रुपये के विशेष राहत पैकेज की घोषणा की थी। इसके बाद भी किसानों की आत्महत्या करने की प्रवृत्ति में विराम नहीं लग सका है।विदर्भ को अलग राज्य बनाने की मांग पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण कहते हैं कि अलग राज्य समस्या का हल नहीं है।

विदर्भ के विकास के लिए पर्याप्त धन की व्यवस्था की गई है जिसका असर थोड़े दिनों में दिखाई देने लगेगा। दूसरी तरफ अलग विदर्भ राज्य के लिए आंदोलन कर रहे लोगों का आरोप है कि विदर्भ के साथ सौतेला व्यवहार होता रहा है जिससे इस क्षेत्र का विकास नहीं हो सका है।

विदर्भ जनांदोलन समिति के अध्यक्ष अशोक तिवारी कहते हैं कि केन्द्र और राज्य सरकार ने जो पैकेज दिया था वह किसानों के लिए नहीं बल्कि डूबते बैंकों को बचाने के लिए था। किसानों को धन मिला ही नहीं है, सरकार ने जो पैसा दिया उसको बैंकों ने अपने पास रख लिया जिससे उनका डूबता हुआ पैसा उन्हें मिल गया और किसान जहां था वहीं आज भी खडा है।

तिवारी के अनुसार विदर्भ के अलग राज्य की मांग सबसे पुरानी है और यहां हिंदी एवं मराठी बोलने वाले लोग हैं। इसीलिए इससे क्षेत्र के विकास के लिए विदर्भ को अलग राज्य बनाना ही होगा। भारतीय जनता पार्टी विदर्भ को अलग राज्य बनाने के पक्ष में खड़ी दिखाई दे रही है।

नागपुर से भाजपा विधायक देवेन्द्र फड़नवीस कहते हैं कि उनकी पार्टी विदर्भ का मुद्दा लम्बे समय से उठाती रही है और तेलंगाना के बाद अब विदर्भ राज्य के गठन को लेकर अपनी लड़ाई और तेज करेगी। दूसरी ओर राज्य में भाजपा की सहयोगी पार्टी शिवसेना अलग विदर्भ को सिरे से नकार रही है।

शिवसेना के वरिष्ठ नेता सुभाष देसाई के अनुसार विदर्भ का विकास तभी संभव है जब वह महाराष्ट्र का हिस्सा बना रहे। देसाई कहते हैं जो लोग विदर्भ को अलग राज्य बनाने की मांग कर रहे हैं उन्हें यह याद रखना चाहिए कि संयुक्त महाराष्ट्र के स्वप्न को पूरा करने के लिए 105 शहीदों ने कुर्बानी दी थी।

शिवसेना की कुर्बानी के जवाब में विदर्भ के रास्ते होकर सात बार संसद पहुंचने वाले वरिष्ठ कांग्रेसी सांसद विलास मुत्तेमवार कहते हैं कि नेतृत्व का एक तबका बंटवारे की मांग को गलत बता रहा है लेकिन किसी ने इस बारे में सोचा है कि पिछले पांच सालों में विदर्भ में सात हजार किसान आत्महत्या कर चुके हैं और 105 लोगों की कुर्बानी का हवाला देकर लोगों को कब तक ब्लैकमेल किया जाता रहेगा।

उनके अनुसार इस इलाके का पिछड़ेपन राज्य के विकास में बाधा डाल रहा है और इस क्षेत्र का विकास तभी संभव है जब अलग विदर्भ का गठन किया जाए। राज ठाकरे की पार्टी मनसे अलग विदर्भ के मुद्दे पर शिवसेना के सुर में सुर मिला रही है। जबकि कांग्रेसी नेता इस मुद्दे पर बंटे हुए हैं।

अलग विदर्भ पर मचे घमासान पर वरिष्ठ पत्रकार इंदर जैन कहते हैं, 'विदर्भ का मुद्दा उतना ही पुराना है जितना महाराष्ट्र के राज्य गठन का इतिहास है। उस समय महाराष्ट्र के नेताओं ने विदर्भ को विकसित करने का प्रलोभन देकर महाराष्ट्र में मिला लिया लेकिन हुआ उसका उल्टा। इस समय विदर्भ आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए कोई बड़ा नेता नहीं है इसीलिए यह आवाज एक बार फिर दब सकती है।'

जैन के अनुसार अगर विदर्भ बनाया जाता है तो कोई बड़ी दिक्कत नहीं आने वाली है क्योंकि नागपुर में मंत्रालय, विधानसभा और विधान परिषद भवन हैं जो कि विदर्भ में ही आता है।

विदर्भ परिचय

क्षेत्रफल - 97,321 वर्ग किलोमीटर
जिले - 11 जिले
विधानसभा सीट - 62
लोकसभा सीट - 10
मुख्य भाषा :  वरहाडी (मराठी की उपभाषा), मराठी, और हिंदी
जनसंख्या -  करीब 3 करोड़
धर्म : हिंदू-76.90 फीसदी, बौध्द-13.07फीसदी, मुस्लिम- 8.3 फीसदी व अन्य
मुख्य फसलें - कपास, संतरा, अंगूर, गन्ना और सोयाबीन
पारंपरिक फसल - ज्वार, बाज़रा और चावल
खनिज - कोयले,मैगनीज, लौह-अयस्क और कंकड़

Keyword: telangana, vidarbha, political parties, farmers, loan waiver, cotton corps,
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