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हिचकोले खाता जहाजरानी उद्योग
वैश्विक अर्थव्यवस्था में मजबूत सुधार न होने से जहाजरानी क्षेत्र की कंपनियों को खासी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है और उनकी आय पर भी दबाव देखा जा रहा है...
राम प्रसाद साहू /  December 13, 2009

मालवहन की दरों (फ्रेट रेट्स) पर ही जहाजरानी उद्योग का भविष्य टिका होता है।

मंदी के दौरान मांग घटने से किराए में खासी गिरावट दर्ज की गई थी, लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था के पटरी पर आने के संकेत के साथ ही मालवहन में भी बढ़ोतरी देखी जा रही है। जहाजरानी किराए में सितंबर के निम्न स्तर से अब तक खासी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी मालवहन दरों (ड्राई बल्क कार्गो) को मापने वाले बाल्टिक ड्राई सूचकांक में सितंबर के निम्न स्तर से करीब 70 फीसदी की बढ़ोतरी देखी गई। मालवहन में भले ही इजाफा हो रहा हो, लेकिन बाल्टिक सूचकांक अब भी पिछले साल मई के उच्च स्तर से करीब 69 फीसदी नीचे है।

मई 2008 में बाल्टिक ड्राई सूचकांक 10,000 के स्तर पर कारोबार कर रहा था। इसी तरह, कच्चे तेल के मालवहन को मापने वाला सूचकांक बाल्टिक ड्राई टैंकर सूचकांक भी अगस्त के निम्न स्तर से 56 फीसदी बढ़ चुका है। लेकिन पिछले साल जुलाई के उच्च स्तर से यह अब भी 69 फीसदी कम है। जहाजरानी उद्योग सबसे बुरे दौर से उबर चुका है, लेकिन मुनाफा सामान्य होने के लिए अभी  इंतजार करना पड़ सकता है।

शुरुआती सुधार

विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुधार के साथ ही बाल्टिक शिपिंग सूचकांक में खासा उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है और इसमें अनिश्चितता बरकरार है। आईएमएफ के अनुमान के मुताबिक, वर्ष 2010 में वैश्विक जीडीपी विकास दर 3 फीसदी रह सकती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक सुधार शुरुआती चरण में है और कई जगहों पर अब भी विकास को लेकर अनिश्चितता कायम है। सूचकांक इस तरह के संकेत दे रहे हैं। उदाहरण के तौर पर देखें तो बीडीआई नवंबर में 9 फीसदी बढ़ा है, जबकि दिसंबर में उसमें खासा उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है।

कमजोर मांग के चलते भविष्य को देखते हुए शिपिंग कंपनियों के शेयरों की कीमतों पर भी दबाव देखा जा रहा है। हालांकि वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुधार को देखते हुए शिपिंग कंपनियों की मांग में इजाफा होने की भी उम्मीद है। आपूर्ति पक्ष और ऑर्डर को रद्द कराने और कंपनियों की ऑर्डर बुक को देखते हुए शिपिंग कंपनियों के मुनाफे पर सवालिया निशान लग रहा है।

आपूर्ति की स्थिति

जब मांग में खासी तेजी थी, तब शिपिंग कंपनियों के पास ढेरों ऑर्डर थे और उनका यार्ड पूरी क्षमता के साथ काम कर रहा था। लेकिन मंदी की दस्तक के साथ ही स्थितियां प्रतिकूल होती चली गईं। कंपनियों की ऑर्डर बुक में औसतन 50 फीसदी की गिरावट देखी गई।

नवंबर 2009 तक ड्राई बल्क सेगमेंट की ऑर्डर बुक ही सबसे अच्छा 63 फीसदी जान पड़ता है, जबकि टैंकर और कंटेनर सेगमेंट की आर्डर बुक क्रमश: 32 फीसदी और 39 फीसदी है। हालांकि आईसीआरए के अनुमान के मुताबिक, विभिन्न किस्म के टैंकरों की आपूर्ति में वित्त वर्ष 2009-10 और 2010-11 में 10 से 15 फीसदी इजाफा होने की उम्मीद है।

ड्राई बल्क सेगमेंट के बेड़े में वित्त वर्ष 2009-10 और 2010-11 में करीब 10 से 30 फीसदी की बढ़ोतरी होने का अनुमान है। जहां तक ऑर्डर रद्द कराने की बात है तो साल की शुरुआत में इसकी दर करीब 25 फीसदी थी, लेकिन जानकारों का कहना है कि अब इसमें और गिरावट की आशंका नहीं है।

आईसीआरए के उद्योग रिसर्च की प्रमुख रेवती कस्तूरी का कहना है कि वैश्विक स्तर पर ऑर्डर रद्द कराने की दर में गिरावट आई है। वहीं शिपिंग कंपनियां माल की आपूर्ति की तिथि आगे बढ़ाने की योजना बना रही है। शिपिंग कंपनियों का भविष्य चीन और अन्य विकसित देशों में विनिर्माण गतिविधियों में तेजी पर टिका हुआ है।

तेल की मांग और चीन की स्थिति

समुद्र के रास्ते कारोबार में टैंकर कारोबार के मालवहन का योगदान करीब 36 फीसदी है। जानकारों का कहना है कि शीतकालीन महीनों में इसमें सितंबर तिमाही की तुलना में तेजी आने की उम्मीद है। हालांकि इसमें तेजी तेल की मांग पर निर्भर करेगी।

उद्योग संगठन इंटरनैशनल एनर्जी एजेंसी के अनुमान के मुताबिक, वित्त वर्ष 2009-10 में कच्चे तेल की मांग में 1.6 फीसदी का इजाफा हो सकता है। इससे कच्चे तेल की आपूर्ति से जुड़ी टैंकर कंपनियों को फायदा हो सकता है, जिनके परिचालन मुनाफे पर दबाव देखा जा रहा है। वहीं रिफाइंड ईंधन की आपूर्ति करने वाले प्रोडक्ट टैंकरों के मार्जिन पर दबाव देखा जा सकता है।

मौजूदा मालवहन की दरों को देखते हुए ड्राई बल्क सेगमेंट की स्थिति थोड़ी बेहतर प्रतीत हो रही है। इस सेगमेंट में कारोबार करने वाली शिपिंग कंपनियां मुनाफा बना रही हैं। इसके साथ ही चीन में विनिर्माण गतिविधियों का भी मालवहन पर असर पड़ता है।

लौह-अयस्क के कुल कारोबार में चीन की हिस्सेदारी करीब 50 फीसदी है। इसके साथ ही ड्राई बल्क सूचकांक में कोयले के कुल कारोबार में भी इसका योगदान करीब आधा है। विशेषज्ञों का कहना है कि बाल्टिक ड्राई सूचकांक में हालिया तेजी चीन में लौह-अयस्क और कोकिंग कोयले की मांग बढ़ना है। विशेषज्ञ मध्यम अवधि को ध्यान में रखकर मालवहन का अनुमान लगा रहे हैं।

क्रिसिल के शोध प्रमुख सुधीर के नायर का कहना है कि मांग में सुस्ती को देखते हुए सभी सेगमेंट में कारोबार कम होने की आशंका है, जिससे मध्यम अवधि में मालवहन दरों पर दबाव देखा जा सकता है। आइए जानते हैं भारत की 7 प्रमुख शिपिंग और शिपबिल्डिंग कंपनियों की कैसी है स्थिति और आगे क्या संभावनएं हैं...

ग्रेट ईस्टर्न शिपिंग

ग्र्रेट ईस्टर्न शिंपिग निजी क्षेत्र की सबसे बड़ी शिंपिग कंपनी है, जिसके पास 38 जहाजों का बेड़ा है। सभी सेगमेंट के मालवहन में गिरावट आने से कंपनी की आय पर दबाव देखा जा रहा है।

संचयी स्तर पर देखें तो चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में कंपनी की आय और शुद्ध मुनाफे में क्रमश: 40 और 81 फीसदी की गिरावट आई है। कंपनी के निराशाजनक प्रदर्शन के पीछे टीसीवाई की भूमिका रही। कच्चे तेल और ड्राई बल्क सेगमेंट का टीसीवाई रोजाना 65 फीसदी घटा है। इसी तरह प्रोडक्ट टैंकरों का टीसीवाई 34 फीसदी गिरा।

कंपनी चालू वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में कच्चा तेल और प्रोडक्ट टैंकर कारोबार में क्रमश: 54 और 70 फीसदी बुकिंग की उम्मीद की जा रही है। इससे उसे करीब 442 करोड़ रुपये की आय की उम्मीद है। गैस वहन क्षमता शेष साल के लिए पूरी तरह से बुक है। दूसरी छमाही में ऑफशोर कारोबार से करीब 381 करोड़ रुपये आय की उम्मीद है।

ऐनाम के अनुमान के मुताबिक, कंपनी का ऑफशोर कारोबार तेजी से विकास कर सकता है और वित्त वर्ष 2010-11 में इससे 690 करोड़ रुपये के मुनाफे की उम्मीद है। गौरतलब है कि चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में शिपिंग कारोबार से कंपनी को 323 करोड़ रुपये और ऑफशोर कारोबार से 91 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ है। कंपनी मौजूदा शेयर की कीमत (272 रुपये) पर यह 30 फीसदी रिटर्न देने में सक्षम है।

मर्केटर लाइन्स

कंपनी के पास 21 जहाजों का बेड़ा है। इसके साथ ही कंपनी का रिग्स और ड्रैजर में भी निवेश है। कुल मिलाकार कहें तो कंपनी विविध कारोबार से जुड़ी है। कंपनी अपने चार में से तीन ड्रैजरों को पहले ही ड्रैजिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया को दे चुकी है।

कंपनी ने हाल ही में अपने बेड़े में 1993 में निर्मित 42,235 टन क्षमता वाले एम आर टैंकर को शामिल किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि संचयी आधार पर कंपनी को वित्त वर्ष 2010-11 में 275-300 करोड़ रुपये का मुनाफा हो सकता है। इनमें से 25 से 30 फीसदी मुनाफा गैर-शिपिंग कारोबार से आने की उम्मीद है।

चालू वित्त वर्ष की आय के अनुमान के आधार पर कंपनी के शेयर 25 गुना ज्यादा कारोबार कर रहे हैं। हालांकि दूसरी तिमाही में कंपनी को 29.19 करोड़ रुपये का शुद्ध घाटा हुआ है, जबकि पिछले साल की समान अवधि में उसे 12.75 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा हुआ था। कंपनी की कुल बिक्री भी 60 फीसदी घटकर 130.48 करोड़ रुपये रह गई।

शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया

देश की सबसे बड़ी शिपिंग कंपनी के पास 79 जहाजों का बेड़ा है, जिनमें से 70 फीसदी कच्चे तेल के वहन के हैं। तेल की मांग घटने और क्रूड कैरियर की संख्या बढ़ने के चलते कंपनी की वित्तीय स्थिति पर प्रतिकूल असर पड़ा है।

सितंबर तिमाही में कंपनी की आय 20 फीसदी घटकर 845 करोड़ रुपये रह गई, वहीं शुद्ध मुनाफे में 88 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। इसके साथ ही महंगे ब्याज दरों का भी कंपनी के मुनाफे पर असर पड़ा है। टैंकर सेगमेंट की आय में 30 फीसदी की गिरावट आई और यह 587 करोड़ रुपये रहा, वहीं कंटेनर शिप्स और ब्रेक बल्क से होने वाली आय करीब 215 करोड़ रुपये रही।

टैंकर सेगमेंट में कंपनी को 50 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ, वहीं लाइनर्स में 62 करोड़ रुपये का घाटा उठाना पड़ा है। कच्चे तेल की मांग अब धीरे-धीरे बढ़ रही है, ऐसे में मालवहन में भी इजाफा होने की उम्मीद है, जिसका फायदा कंपनी को मिल सकता है।

लेकिन क्रूड टैंकरों का किराया पिछले साल के उच्च स्तर से अब भी कम है। विश्लेषकों का कहना है कि कंपनी के शेयर 145 रुपये पर कारोबार कर रहे हैं, ऐसे में इसमें बढ़त की गुंजाइश ज्यादा नहीं है।

वरुण शिंपिंग

वरुण शिपिंग की कुल आय में एलपीजी टैंकर कारोबार की हिस्सेदारी करीब 60 फीसदी है। लेकिन मंदी के चलते इसकी मांग पर भी असर पड़ा है। कंपनी के पास 20 जहाजों का बेड़ा है, जिनमें से 10 गैस कैरियर हैं और 7 ऑफशोर जहाज हैं।

अंतिम तिमाही में वरुण शिपिंग का शुद्ध मुनाफा 70 फीसदी घटकर 13 करोड़ रुपये रहा, वहीं कंपनी की आय 40 फीसदी घटकर 157 करोड़ रुपये रही। कारोबार के लिहाज से कंपनी की स्थिति में खास सुधार नहीं हुआ है। यही वजह है कि वरुण शिपिंग ने जहाजों को खरीदने की योजना को सुस्त गति से बढ़ाने की सोची है।

कंपनी ने शुरुआत में कहा था कि जहाजों को खरीदने के लिए 450 करोड़ रुपये की पूंजी है। लेकिन कई देशों में कच्चे तेल की मांग घटने से कंपनी ने प्रोडक्ट टैंकरों और अन्य सेगमेंट पर ध्यान देने की योजना बनाई है। कंपनी की कुल आय में पांचवां हिस्सा एलपीजी, क्र्रूड और प्रोडक्ट सेगमेंट से आता है, जिस पर दबाव देखा जा रहा है।

कंपनी के प्रबंध निदेशक युधिष्ठिर खाटू ने उम्मीद जताई कि चीन और भारत में कच्चे तेल की मांग बढ़ रही है, लेकिन इसमें वास्तविक तेजी विकसित देशों में मांग बढ़ने के बाद ही आएगी। 12 महीने के ईपीएस पर कंपनी के शेयर 7 गुना पर कारोबार कर रहे हैं।

एबीजी शिपयार्ड

एबीजी शिपयार्ड के पास 12,000 करोड़ रुपये की मजबूत ऑर्डर बुक है, जो चालू वित्त वर्ष के आय के अनुमान से करीब 6 गुना ज्यादा है। इनमें से 50 फीसदी ऑर्डर ड्राई बल्क शिप के निर्माण के हैं और 40 फीसदी ऑफशोर जहाजों के निर्माण के ऑर्डर हैं।

कंपनी जहाजों की मरम्मत में भी उतर रही है। कंपनी वेस्टर्न शिपयार्ड के अधिग्रहण की प्रक्रिया में है। इससे जहाज मरम्मत की क्षमता में इजाफा होगा। अधिग्रहण के बाद कंपनी बड़ी क्षमता वाले जहाजों की मरम्मत करने में सक्षम होगी। कंपनी दाहेज और सूरत में भी नए संयंत्र लगा रही है, जो चालू वित्त वर्ष के अंत तक पूरे हो जाएंगे। इस संयंत्र के बन जाने से कंपनी बड़े जहाजों का निर्माण कर सकेगी।

ग्रेट ऑफशोर के अधिग्रहण सौदों से हटने और इसके शेयरों को बेचने से कंपनी को करीब 54 करोड़ रुपये का फायदा होने का अनुमान है। इससे कंपनी डेट-इक्विटी अनुपात दुरुस्त कर सकती है। मौजूदा बाजार भाव के हिसाब से अगले वित्त वर्ष की आय के अनुमान के आधार पर कंपनी के शेयर 5.4 गुना पर कारोबार कर रहे हैं। गिरावट पर कंपनी के शेयरों में निवेश किया जा सकता है।

भारती शिपयार्ड

कच्चे तेल की कीमतों, उत्खनन में पूंजी बढ़ने या ऑफशोर गतिविधियों में इजाफा होने से भारती शिपयार्ड को फायदा मिलने की उम्मीद है। कंपनी के पास 5,100 करोड़ रुपये का ऑर्डर बुक है, जो पिछले साल की आय से करीब 5.5 फीसदी ज्यादा है।

कंपनी के ऑर्डर बुक में ऑफशोर सेगमेंट की भागीदारी करीब 68 फीसदी है। यही वजह है कि भारती ग्रेट ऑफशोर में नियंत्रण योग्य हिस्सेदारी खरीदने की योजना बना रही है। इससे कंपनी की क्षमता में इजाफा हो सकेगा। कंपनी ग्र्रेट ऑफशोर के लिए पहले ही दो नए जहाज बना चुकी है।

इस कंपनी के अधिग्रहण से भारती शिपयार्ड की क्षमता में इजाफा तो होगा ही, कंपनी के शेयरधारकों को भी लाभ मिलने की उम्मीद है। कंपनी को ड्राई बल्क सेगमेंट और रक्षा क्षेत्र से भी अच्छा ऑर्डर मिला है। 223 रुपये पर कंपनी के शेयर का भाव वाजिब हैं और अगले वित्त वर्ष की आय के अनुमान के आधार पर यह 3.4 गुना पर कारोबार कर रहे हैं।

पिपावाव शिपयार्ड

कंपनी हाल ही में सूचीबद्ध हुई है, लेकिन बाजार में इसके शेयरों का प्रदर्शन  अच्छा नहीं है।

वैसे, कंपनी के पास 5,200 करोड़ रुपये का ऑर्डर बुक है। बीते वित्त वर्ष में कंपनी की आय 6.17 करोड़ रुपये थी और मुनाफा 4.72 करोड़ रुपये था। कंपनी का शिपयार्ड संयंत्र पूरी तरह से शुरू नहीं हुआ है। कंपनी पहले जहाज की आपूर्ति अप्रैल 2010 तक कर सकती है।

इस बीच, कंपनी व्यावसायिक शिपबिल्डिंग, जहाजों की मरम्मत, ऑफशोर फेब्रिकेशन और नेवी के शिप निर्माण में भी हाथ आजमाने की तैयारी कर रही है। कंपनी घरेलू रक्षा क्षेत्र में भी बड़े अवसर तलाश रही है। अगले वित्त वर्ष की आय के अनुमान के आधार पर कंपनी के शेयर 10 गुना ज्यादा पर कारोबार कर रहे हैं।

(साथ में जितेंद्र कुमार गुप्ता और शरत चेल्लुरी)

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