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श्रम कानूनों में व्यापक सुधार से ही बनेगी बात
देश के समग्र विकास और रोजगार के अवसरों में बढ़ोतरी का रास्ता श्रम कानूनों के व्यापक सुधार से होकर गुजरता है। राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो ऐसा किया जा सकता है। बता रहे हैं
शंकर आचार्य /  December 10, 2009

देश में रोजगार की क्या स्थिति है? इस बारे में क्या किया जा रहा है? हम सभी को पता है कि अपने देश की श्रमशक्ति में हर साल 1.3 करोड़ नए लोग शामिल हो जाते हैं।

क्या उन्हें कुछ हद तक भी अच्छा रोजगार मिल पा रहा है? श्रमबल का कितना हिस्सा बेरोजगार है? अल्प-बेरोजगारी कितनी व्यापक है? श्रमिकों को रोजगार सुरक्षा किस हद तक हासिल है? वास्तविक मजदूरी के रुझान क्या हैं? सच्चाई यह है कि इन सवालों का जवाब हमारे पास नहीं है।

कम से कम वर्ष 2004-05 के बाद से तो नहीं है क्योंकि उसी साल राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएस) ने 61वें दौर का सर्वेक्षण पूरा किया था, जो रोजगार के बारे में समुचित जानकारी देने वाला अंतिम सर्वेक्षण था। एनएसएस के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 1999-2000 से 2004-05 के बीच कुल रोजगार में 2.9 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

यह बढ़ोतरी अप्रत्याशित रूप से काफी अधिक और इससे पहले दर्ज की गई वार्षिक दर के मुकाबले एक प्रतिशत अधिक थी। जो लोग इन आंकड़ों के आधार पर गुलाबी तस्वीर खींचना चाहते हैं, उनका यह भी मानना है कि चूंकि 2004-05 से 2007-08 के बीच जीडीपी विकास दर जोरदार रही है, इसलिए निश्चित रूप से इस दौरान रोजगार के रुझान भी काफी तेज रहे होंगे।

यह सही है कि वर्ष 2008-09 में  वैश्विक आर्थिक संकट का प्रभाव उत्पादन और रोजगार पर भी पड़ा है, लेकिन अब लगता है कि हम इस संकट को पीछे छोड़ चुके हैं। आईआईटी और आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के प्लेसमेंट में आया सुधार भी इस बात की गवाही देता है।

लेकिन यह तो कहानी का एक हिस्सा भर है। इस कहानी का एक काला पक्ष भी है। पहली बात यह है कि 1999-2000 और 2004-05 के बीच रोजगार में 2.9 प्रतिशत की वृद्धि के बावजूद सचाई यह है कि रोजगार में हुई बढ़ोतरी कम उत्पादक, असंगठित और प्राय: अनौपचारिक क्षेत्र से संबंधित है। वर्ष 2007 में भारत के ओईसीडी सर्वेक्षण से यह बात जाहिर होती है।

वास्तव में कुल औद्योगिक रोजगार में 6 प्रतिशत की वार्षिक बढ़ोतरी के बावजूद संगठित औद्योगिक क्षेत्र में रोजगार के अवसरों में प्रति वर्ष 1 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। इस तरह कुल औद्योगिक रोजगार में संगठित औद्योगिक क्षेत्र की हिस्सेदारी 1998 के 18 प्रतिशत से घटकर 2004 में महज 10 प्रतिशत रह गई। इस तरह इस दशक के पूर्वार्द्ध में रोजगार बूम के दौरान भारत का औद्योगिक श्रमबल दरअसल 'अस्थायी' हो गया। 

दूसरी बात यह है कि अगर कोई भारत में रोजगार के रुझानों पर गौर करे तो सर्वाधिक उल्लेखनीय तथ्य श्रमबल की बनावट को लेकर है। खासतौर से विकासशील देशों में श्रमबल अधिक तेजी से कृषि गतिविधियों से गैर-कृषि गतिविधियों में नियोजित हुआ है। ऐसे में 1960 से 2006 के बीच चीन और इंडोनेशिया के कुल श्रमबल में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी 75 प्रतिशत से घटकर 42 प्रतिशत रह गई है।

थाईलैंड में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी 84 प्रतिशत से घटकर 42 प्रतिशत रह गई है। भारत में यह गिरावट अपेक्षाकृत कम है। भारत में यह आंकड़ा 73 प्रतिशत से घटकर 56 प्रतिशत है। ऐसा अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी में तेजी से आई गिरावट के बावजूद है। वर्ष 1960 में जीडीपी में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत थी, हालांकि 2006 आते आते यह आंकड़ा घटकर 18 प्रतिशत रह गया।

भारत के श्रमबल में धीमे संरचनात्मक बदलावों की वजह विदेश व्यापार विरोधी नीति (वर्ष 1990 तक) और लघु उद्योगों के लिए आरक्षण की नीति है। दोनों वजहों से श्रम आधारित विनिर्मित निर्यात को बढ़ावा देने की दिशा में बाधा पैदा हुई। इसके साथ ही भारत के अत्यधिक प्रतिबंधात्मक श्रम कानूनों के कारण संगठित उद्योगों में नए रोजगार को बढ़ावा नहीं मिल सका।

व्यापक आंकड़े निश्चित तौर से यह बताते हैं कि बड़ी संख्या में अल्प बेरोजगारी है। सेवा और औद्योगिक क्षेत्र में अच्छे और अर्ध-कुशल रोजगार के सीमित अवसरों के कारण ऐसा है। वास्तविक सबूतों के आधार पर इस बात की पुष्टि होती है। उदाहरण के लिए अप्रैल 2008 में हरियाणा बिजली नियामक आयोग को चपरासी के 3 पदों के लिए 11,000 से अधिक आवेदन मिले।

पिछले महीने श्यामल मजूमदार ने बताया था कि भारतीय स्टेट बैंक में 11,000 लिपिकों की भर्ती के लिए 34 लाख आवेदन किए गए। इन आवेदकों में बड़ी संख्या में ऐसे प्रत्याशी थे जिनके पास इंजीनियरिंग या एमबीए की डिग्री है। मुट्ठी भर प्रतिष्ठित संस्थानों को छोड़ कर ज्यादातर संस्थानों के स्नातकों को योग्यता के मुताबिक रोजगार मुश्किल से ही मिल पाता है।

श्रम बाजार में आपूर्ति और मांग के बीच इस तरह के अंतर के कारण समकालीन भारत में कई सामाजिक और आर्थिक चुनौतियां पैदा हुई हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में निराशा और देश के बड़े हिस्से में नक्सली गतिविधियां बढ़ने से रोजगार के अवसरों में कमी आई है। इसी तरह भारत के शहरों तथा कस्बों के श्रम बाजारों में दोहरे मानदंड बढ़ने के भी संकेत भी मिल रहे हैं।

ऐसे में अतिकुशल स्नातकों के वेतन में लगातार भारी बढ़ोतरी हो रही है जबकि अर्ध-कुशल तथा अकुशल श्रमिक कम और अनिश्चित मजदूरी पाने के लिए मजबूर हैं। इसके सामाजिक और राजनीतिक निहितार्थ खतरनाक हैं। श्रम बाजार में असंतुलन की एक वजह भारत का अधूरा औद्योगिकरण भी है। भारत के जीडीपी में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी केवल 16 प्रतिशत है जबकि चीन में यह आंकड़ा 33 प्रतिशत तक है, जहां जीडीपी लगभग तीन गुना अधिक है।

इसका अर्थ है कि चीन का विनिर्माण क्षेत्र भारत के मुकाबले 6 गुना अधिक बड़ा है। आखिर चीन दुनिया का कारखाना क्यों है? जबकि भारतीय श्रमिक अधिक सस्ते हैं और उनकी उद्यमशीलता का लोहा दुनिया भर में माना जाता है। इसके कई कारण हैं जिनमें से विदेश व्यापार विरोधी नीति तथा लघु उद्योगों के लिए आरक्षण का जिक्र पहले ही किया जा चुका है।

इसके अलावा बिजली, सड़क, पानी और बंदरगाह जैसी ढांचागत सुविधाओं का अभाव भी एक कारण है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण कारण श्रम कानून की बाधा और कुछ अन्य नियमन हैं। इस कारण भारतीय विनिर्माण इकाइयां छोटी ही बनी रहती हैं। अकुशल और अर्ध-कुशल श्रमिकों की कम मांग के कारण सरकार को नरेगा और खाद्य सब्सिडी जैसी सामाजिक सुरक्षा मुहैया करने वाली योजनाओं पर अधिक खर्च करना पड़ता है।

इस तरह सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल अधिक विकास वाले केंद्रीय मदों में नहीं हो पाता है। ऐसे में क्या करना चाहिए? निश्चित तौर से उच्च आर्थिक विकास दर हासिल करने से ही मदद मिलेगी। इसके अलावा ढांचागत अवरोध और अन्य नीतिगत बाधाओं को दूर कर औद्योगिक विकास को बढ़ावा दिया जा सकेगा।

लेकिन विकास को समेकित और रोजगार के अवसरों से पूर्ण बनाने के लिए जरूरी है कि अवरोधक श्रम कानूनों में सुधार किया जाए, जो संगठित क्षेत्र में रोजगार को हतोत्साहित करते हैं। बीते वर्षों के दौरान कई अकादमिक अध्ययनों और आधिकारिक रिपोर्टों में भारत के श्रम कानूनों में व्यापक सुधारों की सिफारिश की गई है। ऐसे में असल समस्या राजनीतिक इच्छाशक्ति की है।

(लेखक इक्रियर के निदेशक मंडल के सदस्य और मानद प्राध्यापक हैं।)

Keyword: employment status, political will, national sample survey, global recession, industrial sector,
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