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मिले सुर मेरा तुम्हारा तो मिले अर्थव्यवस्था को सहारा
दिल्ली डायरी
ए. के. भट्टाचार्य /  December 08, 2009

करीब 15 महीने पहले डी. सुब्बाराव ने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर का पद संभाला था।

वित्त मंत्रालय के अनुभवी के आरबीआई का गवर्नर बनने के जाहिर तौर पर क्या फायदे हो सकते हैं, लगता है सरकार को यह बात अब पूरी तरह से समझ में आ गई होगी। 5 सितंबर 2008 को सुब्बाराव को आरबीआई का गवर्नर नियुक्त किया गया था।

नियुक्ति के 10 दिन बाद ही अमेरिका में लीमन ब्रदर्स धराशायी हो गया और वैश्विक वित्तीय व्यवस्था 1930 की महामंदी के बाद के सबसे बुरे दौर में पहुंच गई। सरकार इस बात से चिंतित थी कि ऐसे बुरे समय में आर्थिक गिरावट से निपटने के लिए रिजर्व बैंक के साथ तालमेल की चुनौती से कैसे निपटा जाएगा।

इसलिए आश्चर्य की बात नहीं जो उसे केंद्रीय बैंक में पूर्व वित्त सचिव के कमान संभालने से राहत महसूस हुई। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि अगर एकदम स्वतंत्र प्रतिष्ठा वाला कोई शख्स आरबीआई गवर्नर होता और उसकी काम करने की शैली भी उसी तरह स्वतंत्र होती तो मंत्रालय की दिक्कतें और ज्यादा बढ़ जातीं।

लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि सुब्बाराव स्वतंत्र और खुले दिमाग वाले व्यक्ति नहीं हैं। यहां गौर करने वाली बात यह है कि मंत्रालय में वित्त सचिव के तौर पर काम करने के अनुभव (और वह भी उस मंत्री के साथ जो स्वतंत्र रुप से काम करता रहा हो) से उन्हें यह बात ज्यादा अच्छी तरह से समझ आई कि भारतीय अर्थव्यवस्था केसंकट के दौर में केंद्रीय बैंक और वित्त मंत्रालय के बीच समन्वय कितना अहम है।

वास्तव में संकट के शुरुआती दिनों में सुब्बाराव ने जो कुछ कहा, उसका ध्यान से विश्लेषण करना चाहिए। एक बार भी किसी को यह संदेह नहीं हुआ कि उनका सुर और नॉर्थ ब्लॉक (वित्त मंत्रालय का मुख्यालय) का सुर जरा भी अलग है। निश्चित रूप से इससे मदद मिली। देश का मौद्रिक प्रतिष्ठान और वित्त मंत्रालय (जो राजकोषीय नीति का प्रशासन देखता है) संकट के ऐसे समय में अलग-अलग सुर में बोलने के बारे में सोच भी नहीं सकते।

सुब्बाराव के हक में यह बात थी कि अपने कुछ पूर्ववर्तियों के विपरीत मिंट रोड में बैठने से पहले वे वित्त मंत्रालय में कामकाज का अनुभव ले चुके थे। मिंट रोड पर आरबीआई का मुख्यालय है। इस वजह से उन्हें दोनों नजरियों से मसलों को समझने में मदद मिली।

आरबीआई में ठीक उनसे पहले गवर्नर रहे वाई. वेणुगोपाल रेड्डी भी वित्त मंत्रालय में काम कर चुकेहैं। लेकिन केंद्रीय बैंक का जिम्मा संभालने से पहले वे छह साल तक आरबीआई के डिप्टी गवर्नर थे। यहां तक कि विमल जालान के वित्त मंत्रालय में काम करने और केंद्रीय बैंक का प्रमुख बनने के बीच काफी समय का अंतर था।

इस नजरिये से सुब्बाराव की तुलना एस. वेंकिटरमणन या आर. एन. मल्होत्रा से की जा सकती है। ये दोनों व्यक्ति वित्त मंत्रालय में काम करने के तुरंत बाद आरबीआई पहुंच गए थे। पुराने समय के लोग याद करते हैं कि वेंकिटरमणन और मल्होत्रा ने आरबीआई गवर्नर के तौर पर जितनी आसानी से काम किया, उसकी मुख्य वजह इससे ठीक पहले उनका वित्त मंत्रालय में अनुभव होना है।

वित्त मंत्रालय में तैनात वरिष्ठ अधिकारियों का इस समय विश्वास है कि सुब्बाराव को भी इस सबका फायदा मिला है। हालांकि इससे केंद्रीय बैंक की वास्तविक स्वायत्तता की बाबत असहज सवाल उठ सकते हैं, खास तौर पर वित्त मंत्रालय के साथ इसके संबंधों को लेकर।

हालांकि सरकार में मौजूद किसी भी व्यक्ति ने अभी तक वित्त मंत्रालय में तैनात नौकरशाह को केंद्रीय बैंक का प्रमुख बनने से मिलने वाले फायदों को लेकर कुछ भी नहीं कहा है। 26 नवंबर 2008 को मुंबई में हुए आतंकवादी हमले की वजह से वित्त मंत्री में बदलाव हुआ था। 30 नवंबर को पी. चिदंबरम को गृह मंत्रालय भेज दिया गया और इसके बाद करीब आठ हफ्ते तक वित्त मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार मनमोहन सिंह ने संभाला था।

सुब्बाराव के लिए इस समय का मतलब तब के वित्त मंत्री और वित्त सचिव की करीबी नजर से बचने का हो सकता है। वित्त मंत्रालय से चिदंबरम के बाहर जाने के बाद चार डिप्टी गवर्नरों में से एक वी. लीलाधर के बदले किसी और की नियुक्ति में देरी हुई। दिसंबर में लीलाधर का कार्यकाल समाप्त हो गया। छह महीने बाद राकेश मोहन ने भी केंद्रीय बैंक छोड़ दिया।

जून 2009 में कुछ समय के लिए सुब्बाराव को सिर्फ दो डिप्टी गवर्नर श्यामला गोपीनाथ और ऊषा थोराट के साथ काम करना पड़ा क्योंकि राकेश मोहन ने आरबीआई छोड़ दिया था और लीलाधर का कार्यकाल समाप्त होने के बाद इसके बदले किसी की नियुक्ति नहीं हुई थी।

जून 2009 के मध्य में हालांकि बैंकर के. सी. चक्रवर्ती की नियुक्ति आरबीआई में हो गई - इस नियुक्ति ने एक बार फिर साफ कर दिया कि स्थिति का नियंत्रण नए वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के हाथ में था। मोहन के बदले किसी और की नियुक्ति में पांच महीने का समय लगा, जब सुबीर गोकर्ण को आरबीआई का डिप्टी गवर्नर बनाया गया। इस नियुक्ति के साथ सुब्बाराव की डिप्टी गवर्नरों की टीम पूरी हो गई।

मिंट रोड पर स्थित नई टीम ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि वह और संवाद की खुली नीति में भरोसा करती है। अपने कार्यकाल के शुरुआती दिनों में सुब्बाराव वित्तीय क्षेत्र की गतिविधियों के बारे में जवाब देने के प्रति सतर्क रहते थे।

हालांकि पिछले कुछ हफ्तों में उन्होंने पर्याप्त संकेत दिए हैं कि वे ऐसे गवर्नर होंगे जो सामान्य तौर पर केंद्रीय बैंक के प्रमुख के साथ जुड़ी निरर्थक बातों से मुक्त होगा। लगता है कि डिप्टी गवर्नर भी इसी राह पर चल रहे हैं। गोपीनाथ, थोराट और गोकर्ण मौद्रिक नीति पर बेबाक राय पेश कर रहे हैं। मिंट रोड पर नॉर्थ ब्लॉक की यह एक और मिसाल बन सकती है।

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