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ऐसी खबर से तो बेखबर रहना बेहतर
शेयर : वर्तमान घटनाओं के आधार पर लिया गया निवेश निर्णय भारी घाटा दे सकता है। अनुशासित तरीका है बेहतर।
अमर पंडित /  December 06, 2009

पिछले हफ्ते दुबई के ऋण चुकाने की अवधि का पुनर्निधारण की खबर लगभग सभी अखबारों में सुर्खियों में थी।

इस खबर ने लीमन ब्रदर्स के अक्टूबर 2008 में धराशायी होने की खबर एक बार फिर से ताजा कर दी और लोग तुरंत ही इस निष्कर्ष पर पहुंच गए कि दुनिया भर के शेयर बाजारों पर इसका गंभीर प्रभाव पड़ेगा।

दुनिया भर के बाजारों ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया दिखाई और हमेशा की तरह भारतीय बाजार पर भी इसका असर देखा गया। दूसरे दिन (शुक्रवार को) सेंसेक्स दिन भर के कारोबार के दौरान 16,200 के निचले स्तर पर आ गया था। हालांकि, कारोबार के दौरान बाजार संभला लेकिन फिर भी पिछले शिखर की तुलना में 3.5 प्रतिशत की गिरावट के साथ बंद हुआ।

इइसके तुरंत बाद ही कई विशेषज्ञ यह भविष्यवाणी करने लगे कि लंबी अवधि से जिस गिरावट की उम्मीद की जा रही थी वह आने ही वाली है। विशेषज्ञ कहने लगे कि सेंसेक्स 12,000 से 14,000 के स्तर की तरफ बढ़ रहा है। निकासी की होड़ लग गई। कुछ ने तो यहां तक कहा, 'देखिए, मैं कह रहा था ना, मेरी भविष्यवाणी सही निकली।'

अधिकांश लाग जो सेंसेक्स के 8,000 से 12,000 के स्तर पर बाजार में प्रवेश करने से चूक गए थे, उन्हें थोड़ी राहत मिली। कुछ निवेशक यह भी सोचने लगे कि बाजार में प्रवेश का एक दूसरा अवसर मिलने ही वाला है। लेकिन बाजार का मूड तो दो दिनों में बदलने वाला था। सोमवार आया, और जीडीपी वृध्दि के आंकड़े जारी किए गए। यह 7.9 प्रतिशत का था।

बाजार ने इस खबर के तुरंत बाद अपनी दिशा बदली और दो-तीन दिन में ही 17,000 के पार पहुंच गया। इससे बाजार के प्रति हर किसी का नजरिया बदल गया और अब लोग 18,000 के स्तर पर पहुंचने की बात करने लगे हैं। इन शोर-शराबों में आम तौर पर लोग बाजार में निवेश का अवसर खो देते हैं। पिछले सालों में हमलोगों ने ऐसी कई परिस्थितियां देखी हैं।

पहला, आम चुनाव के दौरान, सब ने सोचा कि तीसरा मोर्चा सरकार बना सकता है और सेंसेक्स 6,000 के स्तर तक लुढ़क कर जा सकता है। चुनाव परिणाम को देख कर लगभग सभी हतप्रभ रह गए। कुछ सेकंडों में भी 20 प्रतिशत का सर्किट लगाना पड़ा। फिर, बजट के दिन, 6 जुलाई को सेंसेक्स में 800 अंक की गिरावट आई और अगले दो दिनों में बाजार और टूटा था।

हालांकि, बाजार जल्द ही संभल कर एक नई ऊंचाई पर पहुंच गया था। दिवाली में बाजार में 17,300 के स्तर पर कारोबार किया जा रहा था, और अगले कुछ कारोबारी सत्रों में इसमें तेज गिरावट देखी गई। 3 नवंबर को बाजार 15,404 के स्तर पर आ गया था। एक आम धारणा यह थी कि बाजार में और गिरावट आ सकती है।

लेकिन, सकारात्मक वैश्विक संकेतों और जीडीपी के अच्छे आंकड़ों से बाजार को आगे बढ़ने में मदद मिली। बाजार में आई 11 प्रतिशत की गिरावट के अवसर से चूक जाना निश्चय ही निवेशकों के दुख की वजह हो सकती है लेकिन भविष्य में होने वाली गिरावट का इंतजार करते रहने से उन्हें नुकसान हो सकता है।

अब हम मुख्य बिंदु पर आते हैं। वास्तविकता यह है कि इस दुनिया और वित्तीय प्रणाली में कब क्या होगा कहना मुश्किल है। कोई नहीं जानता कि अगली बड़ी खबर कहां से आएगी। लेकिन, आंकड़े कह रहे हैं कि आने वाले दिन अच्छे हैं। क्या कोई इस बात की गारंटी ले सकता है कि अगले साल बाजार 21,000 के स्तर पर नहीं पहुंच सकता है?

अगले साल को छोड़िए, कोई यह भी नहीं बता सकता कि आने वाले कुछ पल या दिनों में क्या होने वाला है। वित्तीय प्रणाली एक दूसरे से कुछ इस प्रकार जुड़ा हुआ है कि अगर एक को छींक आती है तो दूसरे को जुकाम हो जाता है। मुख्य बात यह है कि कोई भी व्यक्ति निचले स्तर पर खरीदारी कर शीर्ष स्तर पर निकासी नहीं कर सकता। समय-समय पर निवेश करना सबसे बेहतर तरीका है।

इसके अतिरिक्त, विदेशी बाजारों की बुरी खबरों से लेकर स्थानीय घोटालों, महंगाई, भू-राजनीतिक जोखिम, डॉलर कारोबार, ब्याज दरों में बढ़ोतरी, तेल कीमतों में बढ़ोतरी और तमाम तरह के इतने आंकड़े होते हैं कि अगले पल में क्या होने वाला है इसकी भविष्यवाणी करना कठिन होता है।

अधिकांश लोग भविष्य जानने में काफी दिलचस्पी रखते हैं और यही वजह है कि इतनी सारी भविष्यवाणियां देखी जाती है। ज्योतिष अब बाजारों तक अपना पांव पसार चुका है और आप देख ही रहे होंगे कि कितने सारे आर्थिक ज्योतिषी देखने को मिल रहे हैं।

निवेश सरल होना चाहिए। प्रत्येक गिरावट पर खरीदारी करिए और धैर्य रखिए। दूसरे शब्दों में कहें तो बाजार का वक्त अच्छा हो या बुरा निवेश की अनुशासित नीति अपनाइए, जो योजनाबध्द निवेश योजनाओं (सिप) के जरिए किया जा सकता है। या फिर अगर आपके पास ब्लू चिप कंपनियों केशेयर हैं तो उनमें दीर्घावधि तक के लिए निवेशित रहिए।

लेखक माईफाइनैंशियल एडवाइजर के निदेशक हैं।

Keyword: dubai financial crisis, global recession, lehman brothers, sensex, political scenario,
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