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बाजार में तेजी के बावजूद निवेशक उठा रहे हैं सुरक्षात्मक कदम
सवाल-जवाब : निपुण मेहता, कार्यकारी निदेशक, एसजी प्राइवेट बैंकिंग इंडिया
सुदीप जैन और अभिजीत लेले /  December 04, 2009

लीमन ब्रदर्स के धराशायी होने के बाद वित्तीय संकट और गहरा गया था लेकिन पिछले एक साल में इक्विटी बाजारों में काफी तेजी आई है।

लेकिन, धनाढय लोग बाजार में निवेश करने को लेकर अभी भी चिंतित हैं। एसजी प्राइवेट बैंकिंग इंडिया के कार्यकारी निदेशक निपुण मेहता ने सुदीप जैन और अभिजीत लेले को निवेश परिस्थितियों के बारे में बताया। पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश:

वैश्विक आर्थिक संकट की तीव्रता को लगभग एक साल हो गए। 12-18 महीने पहले की तुलना में अब निवेशकों का रुझान कैसा है?

पिछले 18 से 24 महीनों में निश्चित रुप से निवेशकों ने सुरक्षात्मक रुख अपनाया है। हममें से हर किसी के पास नकदी पड़ी हुई है जो 36 से 37 प्रतिशत की उच्च जमा दर से स्पष्ट होती है।

बताना चाहूंगा कि साल 2006 में नकदी जमा की दर 22 से 23 प्रतिशत थी। यद्यपि निवेशकों का विश्वास बढ़ा है लेकिन निवेशक बाजार में प्रवेश करने से कतरा रहे हैं। यह भरोसा तो है कि भारतीय विकास की कहानी जारी रहेगी लेकिन इससे बाजार में प्रतिभागिता में इजाफा नहीं हो रहा है।

लोग निवेश के किन विकल्पों में रुचि दिखा रहे हैं?

मुद्रा का प्रवाह ज्यादातर फिक्स्ड रिटर्न योजनाओं, लिक्विड फंड, अल्पावधि के फंड ओर हाइब्रिड योजनाओं में हो रहा है। ये योजनाएं फिक्स्ड इनकम में निवेश अधिक करती हैं और इक्विटी में कम। इसके अतिरिक्त अधिकांश लोग सोने में निवेश को तरजीह दे रहे हैं।

क्या आप अब भी लोगों को सोने में निवेश की सलाह दे रहे हैं?

कीमतों के इस स्तर पर हम सोने में निवेश की सलाह नहीं दे रहे हैं। लेकिन, कई लोग 3 महने और छह महीने बाद के कीमतों के अपने आकलन के आधार पर अभी भी सोने में निवेश करना चाहते हैं। फिक्स्ड इनकम योजनाओं और सोने में निवेश के प्रति रुझान देखा जा रहा है लेकिन निवेशक अभी भी इक्विटी से परहेज कर रहे हैं।

फिक्स्ड इनकम से इक्विटी में निवेश को लेने के लिए किन चीजों की जरूरत है?

एक खास समय तक बाजार का एक उचित स्तर पर बने रहना और नकारात्मक खबरें नहीं आने से निवेशकों में विश्वास जगेगा कि अब बाजार के टूटने की संभावना कम है।

समय गुजरने के साथ ही मूल्य बढ़ेंगे और हम तिमाही परिणाम देख ही रहे हैं। लेकिन, निवेश के लिए बाजार का एक खास स्तर पर आना जरूरी है। बाजार की स्थिरता और एक दायरे में बने रहने से निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा।

ऐसी परिस्थिति पर विभिन्न प्रोफाइल वाले निवेशकों की प्रतिक्रियाएं क्या भिन्न-भिन्न रही हैं?

ज्यादा फर्क नहीं होगा। जोखिम से परहेज करने जैसी बात लगभग एक जैसी है। एक फर्क धनाढय श्रेणी में है जहां अतिरिक्त फंड की संभावना बनेगी।

जरुरी नहीं है कि ऐसा खुदरा या बड़े पैमान पर ही हो क्योंकि हो सकता है उनकी नौकरी चली गई हो या फिर कोई अपने पोर्टफोलियो की कमाई पर निर्भर हो। इइसलिए अगर उन्हें पोर्टफोलियो पर हानि हो रही है तो उसमें लाभ दर्ज होने तक वे बाजार में फिर से प्रवेश नहीं करेंगे।

क्या वैकल्पिक परिसंपत्ति वर्गों में ज्यादा दिलचस्पी दिख रही है?

वैकल्पिक परिसंपत्ति वर्गों पर निगाह डालें तो साल 2006-07 में जब बाजार शीर्ष पर था तो रियल एस्टेट फंड आए थे। उनमें से कुछ अभी हानि में चल रहे हैं। हमने आर्ट फंड आते देखा है। वर्तमान में वे कहीं के नहीं हैं। हमने कई संरचित योजनाएं देखीं और उनमें से अधिकांश साल 2009 या 2010 में परिपक्व होंगे।

उनकी पूंजी वापस आ रही है क्योंकि वे पूंजी-सुरक्षा के लिहाज से आए थे लेकिन उनके प्रतिफल अच्छे नहीं रहे। इसके अलावा, इन सभी वैकल्पिक वर्गों ने ज्यादा प्रतिफल अर्जित नहीं किया। जिंसों में प्रवेश अपेक्षाकृत सीमित रहा है। जिंस से लाभ कमाने के दो तरीके हो सकते थे।

पहला कमोडिटीज म्युचुअल फंडों के जरिए जिनके तहत कमोडिटी कंपनियों में निवेश किया जाता है। और दूसरा तरीका, कमोडिटी एक्सचेंजों के माध्यम से निवेश करने का है। लेकिन, डिलिवरी अनिवार्य होने से और कमोडिटी कीमतों की अस्थिरता की वजह से धनाढय वर्ग सीमित लाभ ही उठा पाया।

विदेश में निवेश की सीमा बढ़ा कर 2,00,000 डॉलर प्रति वर्ष कर दिए जाने के बाद विदेश में निवेश करने में क्या निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ी है?

जब रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हो रहा था तब इसका फायदा बेहतर तरीके से उठाया जा सकता था। लेकिन अब डॉल्र के मुकाबले रुपया मजबूत हो रहा है और निवेशक कमजोर होती मुद्रा की खरीदारी नहीं करना चाहते क्योंकि मुद्रा-घाटा को पाटने के लिए पर्याप्त प्रतिफल अर्जित करना जरुरी होगा।

आपकी टीम कितनी बड़ी है और इसे बढ़ाने की आपकी क्या योजना है?

अभी मुंबई और दिल्ली में हमारे 45 कर्मचारी हैं। धीरे-धीरे हम इसमें विस्तार करेंगे।

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