बिजनेस स?टैंडर?ड - त्रासदी की चौथाई सदी
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त्रासदी की चौथाई सदी
आज से 25 साल पहले भोपाल में हुए दुनिया के सबसे बड़े गैस हादसे के जख्म अब भी रिस रहे हैं।
शशिकांत त्रिवेदी /  December 02, 2009

लच्छो बाई अभी महज 51 साल की है, लेकिन उस पर मिथाइल आइसोसायनेट (मिक) का असर साफ झलकता है।

मनोवैज्ञानिक समस्याएं, मानसिक तनाव और रोशनी खोती आंखों के बाद अब वह बोलने के लायक भी नहीं बची है। उस पर एक नजर डालें तो लगता है कि 80 साल की किसी महिला से बात कर रहे हैं, जो एक कोने में पड़ी रहती है।

2 दिसंबर 1984 को भोपाल पर जो खौफनाक रासायनिक आफत टूटी थी, उसने लच्छो की किस्मत भी फोड़ दी वरना उससे पहले यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड के कारखाने के करीब जेपी नगर की संकरी गलियों में सब उसे एक खुशमिजाज महिला मानते थे।

16 साल की उम्र में उसका ब्याह लक्ष्मी नारायण से हुआ था, जो एक होटल में वेटर का काम करता था। लच्छो बीड़ी बनाकर घर चलाने में अपने पति की मदद भी करती थी। लच्छो की चार संतानें गुजर चुकी थीं और पांचवीं बेटी थी, जो उस कहर भरी रात महज दो साल की थी, जब वह हादसा हुआ और उसके बाद उस इलाके के तमाम वाशिंदों की दुनिया इतनी अंधेरी हो गई कि अब उसमें उजाला लौटने की कोई सूरत ही नहीं है।

उस त्रासदी से बची सामाजिक कार्यकर्ता हजीरा बी बताती हैं, 'वह बोल नहीं पाती, हां, कभी मुस्कराती है और कभी रोती है। उसका दिमाग तो 15 साल पहले ही उसका साथ छोड़ चुका है।' गरीबी और जिंदगी की जद्दोजहद में लच्छो के लिए उसका पति ही अब उम्मीद की आखिरी किरण है। वह अब मजदूरी करता है, पर खुद भी कई बीमारियों का शिकार है।

लच्छो बाई के उलट उसका पड़ोसी जगदीश अहिरवार सेहतमंद किशोर दिखता है, लेकिन असल में उसका पूरा विकास ही नहीं हो पाया है और इस वजह से उसे 22 साल की उम्र में ही डायबिटीज हो गई है। रक्त शर्करा का स्तर बरकरार रखने के लिए वह रोज इंसुलिन का इंजेक्शन लेता है। कोई दवा उसका कद लंबा नहीं कर सकी।

जगदीश तल्ख लहजे में पूछता है, 'आप ही बताइए, अपना सूजा हुआ हाथ और चेहरा लेकर मैं किस डॉक्टर के पास जाऊं?' जगदीश की साढ़े तीन फुट ऊंची बहन रेणु भी किशोरी ही लगती है। लेकिन असल में उसकी उम्र 27 साल है और वह दो बच्चों की मां है। अब तो उसने दवाएं भी छोड़ दी हैं और उसे बस भगवान से उम्मीद है।

वह कहती है, 'मैं इतनी दवाएं खा चुकी हूं, अब और कितनी खाऊं? हम बहुत गरीब हैं। दवा का खर्च और अस्पतालों की बदमिजाजी नहीं झेल सकते। मैं तो बच्चे को अपना दूध भी नहीं पिलाती वरना वह भी बीमार हो जाएगा।' भोपाल के 6 सरकारी अस्पतालों में 1985 से 2008 के दरम्यान 25 लाख मरीजों का इलाज किया गया, लेकिन उनमें लच्छो बाई का नाम नहीं था।

उसकी तरह तमाम लोगों ने यह कहर झेला, जो यूनियन कार्बाइड की बंद पड़ी इकाई के आसपास 20 मोहल्लों में रहते हैं, लेकिन उन्हें कोई नहीं जानता। ये लोग मजबूर हैं रसायन से गंदा पानी पीने और जहरीली हवा में सांस लेने के लिए। ऐसे सैकड़ों लोगों में तो इस हादसे के कई साल बाद गंभीर बीमारियां झलकने लगीं।

ऐसा ही है 60 साल का बशीर खान, जिसके पैर में अनजानी बीमारी हो गई है। वह ट्रक चलाने में माहिर था, लेकिन कुछ साल पहले उसने नौकरी छोड़ दी। वह पूछता है, 'जब आंख से दिखता नहीं, तो ट्रक चलाकर क्या किसी की जान लेता?' अब वह अपने बेटों का मोहताज है, जो खुद भी बीमार और बेरोजगार हैं।

वह इतना गरीब है कि पास ही के संभावना मेडिकल ट्रस्ट क्लिनिक और जवाहर लाल नेहरू हॉस्पिटल ऐंड रिसर्च सेंटर पर मिलने वाली मुफ्त चिकित्सा सुविधाएं ले सकता है, लेकिन वहां तक आने-जाने का किराया ही उसके पास नहीं है। साथ ही वह बेरोजगार और बीमार बेटों की दया पर जी रहा है।

एक तरफ ये दिक्कतें हैं, दूसरी तरफ प्रशासन है जो केवल जबानी फसल काट रहा है। कमला नेहरू हॉस्पिटल के डॉयरेक्टर के के दुबे कहते हैं,'जवाहरलाल नेहरू कैंसर अस्पताल को गैस त्रासदी पीड़ितों केमुफ्त इलाज केलिए हम करोड़ों रुपये देते हैं। 634 शैया वाले छह अस्पतालों को सालाना 45 करोड़ रुपये दिए जाते हैं।

ये अस्पताल अत्याधुनिक इलाज की सुविधाओं से पूरी तरह लैस हैं। यहां हम बाहर के 4,000 मरीजों और भर्ती किए गए 30,000 मरीजों को रोजाना इलाज मुहैया कराते हैं। इससे ज्यादा मरीजों के लिए हम क्या कर सकते हैं?'

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