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कॉपीराइट अधिनियम संशोधन में हो पारदर्शिता : प्रसारक
आशीष सिन्हा / नई दिल्ली November 30, 2009

मौजूदा कॉपीराइट अधिनियम में संशोधन करने के मामले पर मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय से प्रसारक खासे खफा हैं।

इसकी वजह है कि मंत्रालय ने इस अधिनियम में संशोधन करने के बारे में ज़ी टीवी, स्टार, सोनी समेत दिग्गज प्रसारकों से इस बारे में बातचीत नहीं की। इससे नाराज प्रसारकों ने इस मामले की पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं।

इंडियन ब्रॉडकास्टिंग फाउंडेशन (आईबीएफ) ने बताया कि कॉपीराइट अधिनियम में प्रस्तावित संशोधनों से प्रसारकों को वित्तीय नुकसान उठाना पड़ेगा जबकि इससे संगीत कंपनी और उनके एजेंटों को अधिक फायदा होगा। आईबीएफ के अध्यक्ष जवाहर गोयल ने बताया, 'इस मामले का असर प्रसारकों पर पड़ेगा और मंत्रालय ने इस मामले पर हमारी प्रतिक्रिया लेना भी जरूरी नहीं समझा।'

कॉपीराइट अधिनियम में होने वाले संशोधनों का असर आम मनोरंजन चैनलों, समाचार चैनलों और खेल चैनलों पर भी पड़ेगा। प्रस्तावित संशोधनों के तहत इंडियन आइडल और सारेगामापा जैसे म्यूजिकल टैलेंट हंट कार्यक्रमों में प्रतिभागियों द्वारा गाए गए प्रत्येक गाने के एवज में प्रसारकों को 1-1.5 लाख रुपये खर्च करने पड़ेंगे।

समाचार चैनलों को भी मैंचों का प्रसारण करने और पुरानी क्लिपिंग्स दिखाने के लिए भी इतनी ही रकम खर्च करनी पड़ेगी। फिलहाल प्रसारक किसी भी तरह का भुगतान नहीं करते हैं। आईबीएफ के अनुसार मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में से किसी ने भी अधिनियम में संशोधन करने के बारे में प्रसारकों की प्रतिक्रिया नहीं ली।

इसके तहत धारा 52 फेयर यूज, धारा 33ए में कुछ और जोड़ने और धारा 31 में बदलाव किया जाएगा। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को लिखे गए पत्र में आईबीएफ ने कहा है, 'फेयर यूज प्रावधान के कारण समाचार चैनलों को काफी मुश्किल होगी।'

कॉपीराइट अधिनियम की धारा 52 के फेयर यूज प्रावधान प्रसारकों को बगैर किसी शुल्क के हिट गानों और संगीत को बार बार इस्तेमाल करने की अनुमति देता है। आईबीएफ का कहना है कि अभी होने वाले संशोधनों में इस प्रावधान को हटाया जा सकता है।

एस्सेल समूह के कार्यकारी उपाध्यक्ष और कारोबारी मामलों के प्रमुख्या अवनींद्र मोहन ने बताया, 'एक बार कॉपीराइट अधिनियम में संशोधन हो गए तो म्यूजिक कंपनियां किसी गाने के लिए कितनी भी रकम की मांग कर सकती हैं। यह 75,000 रुपये से लेकर 1.5 लाख रुपये तक हो सकती है। 2-3 मिनट के इस्तेमाल के लिए इतनी बड़ी रकम की मांग करना बिल्कुल गलत है।'

प्रसारक चाहते हैं कि सरकार कॉपीराइट कामों के लिए जरूरी लाइसेंस दे, पीपीएल और आईपीआरएस और पारदर्शिता के साथ काम करें।

नहीं ली राय

संशोधन पर नहीं ली गई प्रसारकों की राय
संशोधनों से प्रसारकों को होगा नुकसान

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