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जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर लग रही वादों की झड़ी
वार्ता के दौरान निष्क्रिय दिख रहे दो देशों चीन और अमेरिका ने आखिरकार अपने रुख में बदलाव का संकेत दिया है। लेकिन क्या इससे तस्वीर बदलेगी, विस्तार से बता रहे हैं
सुरजीत एस. भल्ला /  November 30, 2009

जलवायु परिवर्तन वार्ताओं के लिए बीता सप्ताह काफी गर्म था। वार्ता के दौरान निष्क्रिय रुख दिखा रहे दो देशों, चीन और अमेरिका ने भी आखिरकार कुछ न करने के अपने रुख में बदलाव किया है।

ताजा घोषणा के मुताबिक अमेरिका 2005 के स्तर के आधार पर 17 प्रतिशत उत्जर्सन की कटौती करेगा और चीन तीव्रता (प्रति उत्पादन यूनिट कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जन) में 40 से 45 प्रतिशत तक की कटौती करेगा। यूरोप पहले ही प्रति व्यक्ति उत्सर्जन में 40 प्रतिशत कटौती करने की घोषणा कर चुका है। (इन वादों को पूरा करने की अंतिम तिथि 2020 या 2025 है)।

अमेरिका का वादा उतना कम नहीं है जितना कि दिखाई देता है, जबकि चीन का वादा बहुत बड़ा नहीं है। प्रति व्यक्ति आधार पर अमेरिका का वादा उत्सर्जन में 30 प्रतिशत की कटौती का है (अब से लेकर 2025 तक आबादी में 15 प्रतिशत बढ़ोतरी की उम्मीद है)। उत्पादन की तीव्रता में 50 प्रतिशत कटौती की जानी है (अगले 18 वर्षों के दौरान उत्पादन में 50 प्रतिशत बढ़ोतरी की उम्मीद है)।

समाचार की सुर्खियों से पता चलता है कि अब भारत की बारी है। भारत ने लगातार सीओटू कटौती के बारे में किसी प्रतिबद्धता से इनकार किया है। भारत का विश्वास और दलील है कि उसकी पहली प्राथमिकता गरीबी उन्मूलन है और गरीबी उन्मूलन केवल टिकाऊ आर्थिक विकास के जरिए ही हो सकता है।

टिकाऊ आर्थिक विकास का अर्थ है कि कार्बन उत्सर्जन बढ़ेगा। इसलिए भारत इतना ही वादा कर रहा है कि उसका प्रति व्यक्ति उत्सर्जन हमेशा विकसित देशों के स्तर से कम ही रहेगा। पिछले लेख में मैंने लिखा था कि प्रति व्यक्ति उत्सर्जन का वादा हमारे बहुत हित में नहीं है। वास्तव में भारत के लिए मोलतोल की सबसे अच्छी स्थिति यह होगी कि उसके उत्सजर्न की तीव्रता उस मानक से अधिक नहीं होगी, जिस पर सभी देश सहमत हों।

ऐसे देश जिनके उत्सर्जन की तीव्रता इस मानक से अधिक होगी, उन्हें सबसे पहले अपने उत्सर्जन में कटौती करनी होगी। ऐसी स्थिति में चीन और अमेरिका जैसे बड़े प्रदूषणकर्ताओं के साथ मोलतोल करने का मौका बना रहेगा। इससे भारत की विकास संभावनाओं का संरक्षण होता रहेगा। (इसे जलवायु नीति के तीसरे और अंतिम हिस्से में पूरा किया जाएगा )।

विभिन्न वर्षों के दौरान विभिन्न देशों ने विभिन्न लक्ष्यों की घोषणा की है। इन वादों में कुल कटौतियां, प्रति व्यक्ति कटौती, तीव्रता में कटौती शामिल हैं। इन विभिन्न प्रयासों या विभिन्न दायित्वों या विभिन्न वादों या विभिन्न त्याग की आपस में तुलना कैसे की जाएगी? इसके लिए 'बलिदान' के मानक तय करने होंगे। उदाहरण के लिए मान लीजिए कि मैं एक अत्यधिक विकसित अर्थव्यवस्था से हूं, जो औद्योगीकरण के बाद के युग में जी रहा है।

इस अर्थव्यवस्था में औद्योगीकरण के शुरुआती चरण वाली अर्थव्यवस्था (एलडीसी) के मुकाबले ऊर्जा की आवश्यकता अपेक्षाकृत कम होगी। पहली अर्थव्यवस्था अपने उत्सर्जन में स्वाभाविक रूप से कटौती करेगी। ऐसे में उत्पादन या आय की प्रति इकाई के मुकाबले उत्सर्जन में कमी होगी। दूसरी ओर एलडीसी को पहले चरण के दौरान तीव्रता में बढ़ोतरी करनी होगी।

130 से अधिक देशों के विश्लेषकों ने 1990 से 2007 के दौरान सुझाव दिया है कि:  वर्ष 2007 के आंकड़ों के मुताबिक 2,700 डॉलर प्रति व्यक्ति आय वाले देशों में आय में 1 प्रतिशत बढ़ोतरी के साथ प्रति व्यक्ति उत्सर्जन में 1.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी की अनुमति मिलनी चाहिए। इसके आगे 2,700 से 20,000 डॉलर आय वर्ग के लिए यह आंकड़ा 1.3 प्रतिशत, और 20,000 डॉलर प्रति व्यक्ति आय से ऊपर केवल 0.7 प्रतिशत होना चाहिए।

यह प्रतिक्रियात्मक गुणांक उन देशों के लिए अधिक है जिनकी जीडीपी में उद्योगों की हिस्सेदारी औसत से अधिक है, जैसे चीन। और उन देशों के लिए कम है जहां औद्योगीकरण औसत के मुकाबले कम है, जैसे भारत। (तुलनात्मक रूप से भारत, चीन और अमेरिका में प्रति व्यक्ति आय क्रमश: 4800, 9800 और 47000 थी।) उत्सर्जन की तीव्रता के बारे में एक तथ्य यह भी है कि सभी आय स्तर के देशों में समय के साथ इसमें कटौती हुई है। ऐसा प्रौद्योगिकी बदलाव के कारण है।

पिछले 20 वर्षों के दौरान वैश्विक औसत तीव्रता में करीब 1.5 प्रतिशत प्रति वर्ष की कटौती हुई है। प्रति व्यक्ति विकास दर और उत्सर्जन मॉडल के साथ परंपरागत विकास के साथ तुलना करके कोई भी 2025 में कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जन की तुलना कर सकता है। इसे बिजनेस एज यूजुअल (बीएयू) कहते हैं। इस स्तर की गणना के दौरान पहले से हो चुके तकनीकी बदलावों को छोड़ दिया गया है।

ये बदलाव 1990 से 2007 के दौरान विभिन्न देशों के लिए विभिन्न दरों पर हुए हैं। तकनीकी बदलावों की गणना तीव्रता में प्रतिशत बदलाव के आधार पर की गई है। हालिया अवधि (2000 से 2007) के लिए अधिक भार (.65) है जबकि 1990 से 1999 की अवधि के लिए कम भार (.65) है। अगर प्रौद्योगिकी बदलावों के रुझान 2007-2025 के दौरान बढ़ते हैं तो प्रत्येक देश के लिए बीएयू उम्मीद से बेहतर होगा।

ऐसे में बीएयू पर भी इस तरह विचार किया जा सकता है, जैसे यह 'कोई बलिदान नहीं' हो। (उल्लेखनीय है कि तकनीकी बदलावों की धारणा के साथ सीओटू का कुल उत्सर्जन 48.3 अरब टन है, जो अभी भी 30 अरब टन के लक्ष्य के मुकाबले काफी अधिक है, इस बारे में अगले लेख में और अधिक विचार किया जाएगा।) अब वर्ष 1990, 2007 और 2025 इन तीनों वर्षों में उत्सर्जन की तीव्रता पर विचार करते हैं।

तीव्रता में कमी पर विचार करने के साथ ही तीन तात्कालिक निष्कर्ष सामने निकल कर आते हैं। पहला, भारत की सीओटू उत्सर्जन की तीव्रता दुनिया में सबसे कम है (और 2007 में यूरोप के बराबर थी) और इस लिहाज से चीन सर्वाधिक उत्सर्जन करने वाले देशों में शामिल है। दूसरा तथ्य है कि तीव्रता के लिहाज से वैश्विक औसत के मुकाबले भारत के रुझान लगातार घट रहे हैं।

तीसरा चीन द्वारा उत्सर्जन की तीव्रता में 40 प्रतिशत कटौती करने का वादा अच्छा है, लेकिन वास्तव में यह कटौती उतनी है जितनी कि हम तकनीकी बदलावों के कारण उम्मीद कर सकते हैं। वास्तव में यह कुछ प्रतिशत अंक कम है! इसके लिए कोई बलिदान या विशेष प्रयास नहीं किए जा रहे हैं।

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